सोमवार, 20 मई 2024

कविता:"अलग और बीरान "

"अलग और बीरान  "
कुछ चाहिए जो अनजाना है ,
सबसे अलग और बीरान  है | 
अकेला रहा करता था हमेशा वह ,
दुःख का बाधा न बना करता किसी का |  
हर वक्त चाहता कुछ अनोखा ,
पर मुशीबत न करने देता ऐसा | 
समुद्र की लहरों की तरह ,
बार -बार मुशीबतों से जूझता | 
और उम्मीद की चिंगारी हमेशा जगाए रहता ,
उसे उम्मीदों की माले की तरह | 
वक्त मिलने पर  गुथा करता , 
यह सब सुनकर मर जाना क़ुबूल करता वह | 
कुछ चाहिए जो अनजाना है,
सबसे अलग और बीरान है | 
कवि :पिंटू कुमार ,कक्षा :9th 
अपना घर 

रविवार, 19 मई 2024

कविता :" नजरे "

" नजरे "
ये नजरे नसीहतों को पार कर रही है ,
मस्ती के रंग में रंगीन हो नाच रही है| 
कितने ही शिकवों और शिकायतों से झुक रही है ,
ये नजरे नसीहतों को पार कर रही है | 
अश्कों को छुपाकर बातों को भुलाकर ,
अपने को रुलाकर किसी को हंसाकर | 
खुद से जुदा हो के लोगो से मिल रही है ,
ये नजरे नसीहतों को पार कर रही है | 
ख्वाबो में डूबकर सबकुछ भूलकर ,
ये नजरे नसीहतों को पार कर रही है | 
कवि :साहिल कुमार ,=कक्षा :8th 
अपना घर 

शनिवार, 18 मई 2024

कविता :"मैंने सीखा "

"मैंने सीखा "
छोटी -छोटी गलतियों से ,
मैंने आगे बढ़ना सीखा है | 
दूसरो को देख -देखकर ,
मैंने पढ़ना सीखा है | 
जब बचपन में पापा ने ,
मेरे उंगलिंया छोड़ी तो | 
मैंने अकेला ही चलना सीखा है ,
मैंने इन हाथों से लिखना सीखा है | 
छोटी -छोटी गलितयों से ,
मैंने आगे बढ़ना सीखा है | 
कवि :रमेश कुमार ,कक्षा :4th 
अपना घर 

शुक्रवार, 17 मई 2024

कविता :"लोग "

"लोग "
धरती पर लोग गुमसुम क्यों है ,
आस -पास खुश और दुखियों से | 
और या आपसी सम्बन्ध में तालमेल न होने से ,
धरती पर लोग एक- दूसरे से दूर क्यों है | 
आपसी रिश्ते में कुछ कमी होने से ,
या फिर लोगो को देखकर | 
एक दूसरे के प्रति घृणा प्रकट करने से , 
धरती पर लोग एक -दूसरे का मदद क्यों नहीं करते | 
अपने -अपने कामो में लगे रहने के कारण से , 
धरती पर लोग गुमसुम क्यों है | 
कवि :अमित कुमार ,कक्षा :10th 
अपना घर 
 

गुरुवार, 16 मई 2024

कविता :"हाँ सीखा मैंने "

"हाँ सीखा मैंने "
गिर -गिर कर मैंने चलना सीख लिया,
गलती कर-कर के वो चीज करना सीख लिया | 
छोटी -छोटी प्रयासों से ही मैंने ,
कठिनाइओं से लड़ना  सीख लिया | 
कठिनाईओ से लड़ -लड़ कर मैंने ,
जिंदगी को जीना सीख लिया | 
आगे बढ़ -बढ़ के रास्तों पर ,
कैसे चलना है मैंने वो भी सीख लिया | 
गिर -गिर कर मैंने चलना सीख लिया ,
मेरे जिंदगी ने और कुछ भी सिखाया | 
मैंने वो भी सीख लिया ,
गलती कर-कर के वो चीज करना सीख लिया | 
कवि :गोविंदा कुमार ,कक्षा :8th 
अपना घर 

बुधवार, 15 मई 2024

कविता :"खुशी बाटी है "

"खुशी बाटी है "
क्या तुमने भी किसी को खुश किया है ?
या फिर दो पल हंसाया है | 
क्या तुमने भी गिरे लोगो को उठाया है ?
या फिर रूठे हुए को मनाया है | 
क्या कभी शांत वातावरण में जिया है ?
या फिर शोर- शराबे में रोया है | 
क्या तुमने किसी को धमकाया है ?
या फिर किसी को मारा है | 
मेरे तो दिन बुरे है आज ,
पर क्या तुमने इसे कभी आजमाया है ?
कवि :पंकज कुमार ,कक्षा :9th 
अपना घर 
 

मंगलवार, 14 मई 2024

कविता:"वह लड़का "

"वह लड़का "
कड़क धूप में भी गुनगुनाता है ,
बरसती बरसात में भी चलता है | 
हर बार फिसलता है ,हर बार घिसटता है | 
हिम्मत हर कर भी नहीं रूकता है ,
वह लड़का है जो सारे आसूं पी जाता है | 
सबके ताने सह जाता है ,
हर गम झेल जाता है 
हर पल धोखा दे जाता है | 
हिम्मत हर कर भी नहीं रूकता है ,
वह लड़का जो सरे आंसू पी जाता है | 
कभी जब फेल होता है ,
सब कहते है तू करेगा जिंदगी में 
ये सब सुनकर भी हँसता रहता है | 
हिम्मत हार कर भी नहीं रूकता है ,
वह लड़का है जो सारे आंसू पी जाता है | 
कवि :सुल्तान ,कक्षा :10th 
अपना घर 

सोमवार, 13 मई 2024

कविता :"नया करे "

"नया करे "
चल आज कुछ नया करते है ,
हाथ में हाथ मिलाकर 
एक विश्वाश बनाते है| 
अपने सोच विचार को बदलते हुए ,
एक नए विश्वाश के साथ 
उम्मीद की आस जगाते है | 
चल आज कुछ नया करते है ,
हाथ में हाथ मिलाकर 
एक दूसरे को साथ देते है 
चल आज कुछ नया करते है| 
हाथ में हाथ मिलाकर 
अपने विचार को बदलते है | 
कवि :गोपाल कुमार ,कक्षा :7th 
अपना घर 

रविवार, 12 मई 2024

कविता :"वक्त का जख्म "

 "वक्त का जख्म "
कर देते है बर्बाद अपने वक्त को जब हम ,
चाहकर भी वो वक्त कुछ नहीं कह पाता है  | 
जब रुलाकर दे जाते जख्म उसे हम ,
चुपचाप वक्त उसे सह जाता है | 
हर मुश्किलों को झेलकर ,
अपने आप को समझाता है | 
होते देख बर्बाद खुद को ,
रोते हुए भी नहीं रो पता है | 
जो जख्म देते है वक्त को हम,
चुपचाप उसे वह सह जाता है | 
लेकिन मै वक्त हूँ जो अपना सही समय तरसता हूँ ,
अपने को बर्बाद होते देख खुद को समझाता हूँ | 
वक्त को फिजूल जया करने वालों को ,
जब वक्त का जख्म लगता है | 
वो इंसान चाहकर भी जिंदगी में ,
कुछ कर नहीं पाता है | 
कवि :साहिल कुमार ,कक्षा :8th 
अपना घर 

शुक्रवार, 10 मई 2024

कविता: "संघर्ष "

 "संघर्ष "
दो पल की छांव है ,
और दो पल की धूप है | 
यह संघर्ष की सफर में ,
अनेक रूप है कई शुकून की लम्हे नहीं | 
बस हर पल डर है और है नमी ,
यह संघर्ष की सफर में | 
रूठी है मुझसे यह जमी ,
हर पल ढूंढ़ता हूँ | 
शुकून की जिंदगी ,
अब तो दुवा  यही करता हूँ | 
ना रहे कोई कमी ,
यह संघर्ष की सफर में | 
कवि :अमित कुमार ,कक्षा :10th 
अपना घर 

बुधवार, 8 मई 2024

कविता:"सोच "

"सोच "
अपनी सोच को सुधारो लोगो ,
क्यों इतना जीवन में भाग रहे हो | 
इनसे डर कर क्यों जीवन काट रहे हो ,
अपनी हिम्मत पर रखो विश्वास | 
हर पल न होगा इनका विकाश ,
याद करलेंगे सारे वादे | 
जितना इन्होने हम पर  बांधे ,
खुद पर रखना संयम | 
आगे बनेगा अपना नियम ,
अपनी सोच को सुधारो लोगो |
 क्यों इतना जीवन में भाग रहे हो,
कवि :अवधेश ,कक्षा :11th 
अपना घर 

सोमवार, 6 मई 2024

कविता :"मज़दूर "

 "मज़दूर "
मजदूर है हम ,कोई चोर नहीं | 
मेहनत करते है ,पसीना भाते है | 
एक वक्त का पेट भरने के लिए ,
पहाड़ो से टकराते है हम | 
मजदूर है हम ,
किसी का छीनकर नहीं खाते | 
खेती करते है फसल उगाते है ,
जरूरत पड़ने पर हम ही बताते है | 
हर अमीरों तक अनाज पहुँचते है हम,
महदूर है हम | 
कवि :सुल्तान ,कक्षा :10th 
अपना घर 

शनिवार, 4 मई 2024

कविता:"दुनिया "

"दुनिया " 
अब अंत आ रहा है,
न जाने ये दुनिया किस ओर जा रहा है | 
सारी  चीजों को कर दिया बर्बाद ,
अब करते है इनको बचाने का फरियाद | 
अब अंत आ रहा है,
सूरज की किरणे भी जहर बरसा रहा है | 
अब जीवन बनता जा रहा है जिन्दा लाश ,
अब अंत आ रहा है | 
कवि :गोपाल कुमार ,कक्षा :7th 
अपना घर 

शुक्रवार, 3 मई 2024

कविता "बड़े होना "

 "बड़े होना "
क्या कभी हम बड़े हुए हो ?
अपने पैरों पर खड़े हुए हो ?
क्या कभी अपने आप को तुम ने बदला है ?
क्या तुम्हारी जिंदगी कभी गिरके सम्भला है ?
हाँ मै जनता हूँ ,
क्योंकि ये हर किसी की जिंदगी की बात है | 
कभी दिन है तो कभी रात है ,
क्या तुमने अपने से छोटे की माफ़ी दी है ?
क्या तुमने सच में कोई इंसाफ़ी दी है ?
क्या तुम्हारे कोई निर्णय दिल ,
से है या दिमाग से | 
या फिर तुम्हारी हार के रोटी की मजबूरी है ,
हमेशा जिंदगी में हसीन शाम नहीं होता 
बड़े होना आम नहीं होता | 
कवि :अमित कुमार ,कक्षा :10th 
अपना घर 

गुरुवार, 2 मई 2024

कवि ता:"प्रकृति "

"प्रकृति " 
ये जंहा है मुझको प्यारा ,
जहा पनपती है जीवन सारा | 
यंहा हर प्रकार की बहार है ,
जंहा सूरज के उगने से जगमगाता संसार है | 
कितना प्यारा और सुन्दर जंहा है ,
जंहा बस्ती हर तिनको पर जान है | 
हर रीतियुओ की यंहा बौछार है ,
जंहा चमचमाता हमारा ब्रह्माण्ड है | 
ये जहान है मुझको प्यारा ,
जंहा पनपती है जीवन सारा | 
कवि :संतोष कुमार ,कक्षा :9th 
अपना घर

बुधवार, 1 मई 2024

कविता :"आजादी"

"आजादी"
आजादी यूँ ही नहीं मिलती ,
इसमें कुछ खोना पड़ता है | 
कई जंग लड़ना पड़ता है,
और मुस्किलो से गुजरना पड़ता है | 
आजादी हमें यूँ ही नहीं  मिलती  है,
कई कुर्बानिया लेनी  पड़ती है | 
तो कई कुर्बानिया देनी पड़ती है ,
न जाने कितनो ने अपना खून बहाया होगा | 
और कितनो शूली पर चढ़ा होगा ,
आजादी यूँ ही नहीं मिलती | 
न जाने कितना कष्ट सहा होगा,
और जाने कितना कोड़े खाये होंगे | 
तब जाके ये आजादी मिली होगी ,
आजादी यूँ ही नहीं मिलती | 
कवि :सुल्तान ,कक्षा :10th 
अपना घर 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2024

कविता:"वक्त"

"वक्त"
वक्त के साथ -साथ इंसान भी बदल जाता है ,
गरीब को सहारा देना | 
कोई नजर ही कान्हा आता है  , 
मरते गिड़गिड़ाते दूप में तपते| 
है वो नादान मानव ,
मगर सब नजरअंदाज कर देते है | 
जैसे कोई दानव ,
वो गरीब बच्चा दिन भर रोता है | 
मगर हर बुरे इंसान के पास भी,
अच्छा दिल होता है| 
आज कल दौलत ही सब कुछ बन गया है ,
यही पर उनका वक्त ही थम गया है | 
कवि :मंगल कुमार , कक्षा :8th 
अपना घर 


सोमवार, 29 अप्रैल 2024

कविता: "विशवास "

 "विशवास "
मै क्यों हर पल रुक जाता हूँ ,
न चाहकर भी मै डर जाता हूँ | 
सारी चीजे मालूम है मुझको ,
पर अंदर से हिचकिचाता हूँ | 
हर वक्त सोचा है उनको ,
पर क्यों कुछ कह नहीं पाता हूँ | 
मै क्यों हर पल रुक जाता हूँ ,
मरती आशाओ में डूब जाता हूँ | 
मै क्यों हर पल रुक जाता हूँ | 
न चाहकर भी मै डर जाता हूँ,
कवि :बिट्टू कुमार ,कक्षा :8th 
अपना घर 

रविवार, 28 अप्रैल 2024

कविता: "आज़ाद देश "

"आज़ाद देश "
कौन कहता है भहरात देश आजाद है?
लोगो के जीवन में खुद का सहारा है | 
बच्चों के लिए न ही अच्छी शिक्षा ,
और न ही बराबर अधिकार है | 
कौन कहता है ये देश आजाद है?
अमीरों से भी ज्यादा ,
जंहा तक गरीबों की संख्या ज्यादा है | 
उन लोगो को मिलता सम्मान है ,
मेहनत तो कर के देखो | 
मेहनत करना भी न आसान है ,
तो कौन कहता है, भारत देश आजाद है?
अभी भी जाती के प्रति छुवा -छूत होता है | 
निचले जाती के लोगो को,
न मिलता बराबर अधिकार है|    
कौन कहता है भारत देश आजाद है?
कवि: नवलेश कुमार ,कक्षा :10th 
अपना घर 

शनिवार, 27 अप्रैल 2024

कविता:"मौसम "

"मौसम "
सुनहरे मौसम ये बता रहा है ,
बारिश में भीगना जो आनंद है | 
बादलों में चिड़ियों को उड़ना आजादी है ,
हवनों में इधर से उधर बात करना | 
सुनहरे मौसम ये बता रहा है,
रिमझिम बारिश में नहाना | 
सभी लोग के साथ नाचना, 
आनंद से यूँ रहना | 
सुनहरे मौसम ये बता रहा है,
कवि: शिवा कुमार , कक्षा :8th 
अपना घर 

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

कविता :"मौसम "

"मौसम "
अब मौसम को क्या बताना ,
कभी कड़क गर्मी और धूप से मंडराना | 
कभी काले बदलो से सूर्य  ढक ले जाना ,
बारिश की मौसम का अब न कोई ढिकाना | 
अब मौसम को क्या कहना ,
चलती और बहती झरनो को सुखा देना | 
प्रकृति में गर्मी से उथल -पुथल  होना ,
बारिश मौसम का अब न कोई ढिकाना | 
अब मौसम को क्या कहना ,
कभी कड़क गर्मी और धूप से मंडराना 
| कवि :गोविंदा कुमार ,कक्षा :8th 
अपना घर 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

कविता:"खेल "

"खेल " 
खेल के मैदान में ,
हार -जीत का फासला बना रहता है | 
जो मंजिल बुना  है तूने ,
उस कोशिश में लगा रहना पड़ता है | 
आत्मा और अपने ये धीरज रखो ,
संघर्ष का रास्ता बहुत लम्बी होती है| 
उस पर कदम से  कदम मिलकर चलना उचित है ,
तूने तो अब बुनियाद रचना शुरू किया है | 
अब तो दूर सागर पार जाओगे ,
खेल के मैदान में | 
हर -जीत का फासला बना रहता है,
कवि :नीरू कुमार , कक्षा :8th 
अपना घर 

बुधवार, 24 अप्रैल 2024

कविता :"नींद "

 "नींद "
सोया था मैं न जाने कहाँ ,
सपना खोया था मेरा जंहा | 
सबकुछ छूटता जा रहा है,
मेरा लक्ष्य मुझसे रूठता जा रहा है | 
मै ढूंढ रहा हूँ अपने आप को ,
वही फूर्ति और ऐहसास को | 
मै पूरा जोर लगा दूंगा ,
अपने सपने को अपना बना लूंगा | 
सोया था मै न जाने कंहा ,
सपना खोया था मेरा जंहा | 
कवि :कुलदीप कुमार , कक्षा :12th 
अपना घर 

रविवार, 21 अप्रैल 2024

कविता :"अकेला "

"अकेला "
शुक्र है की मैं अकेला मुस्कुराता हूँ ,
हर वक्त हर समय ख्यालो में खोया रहता हूँ | 
नहीं है कोई खौफ किसी का ,
अकेला हूँ अकेला रह लेता हूँ | 
जीने को नहीं चाहिए कुछ इस जंहा से ,
सोच की बस एक राह में रहता हूँ | 
अकेला हूँ अकेला रह लेता हूँ ,
खुद से कोई खता नहीं मुझे | 
दूसरों से कोई गिला नहीं मुझे ,
अकेला हूँ अकेला रह लेता हूँ | 
कवि :साहिल कुमार , कक्षा :8th 
अपना घर 

शनिवार, 20 अप्रैल 2024

कविता:"छुट्टी "

"छुट्टी "
हाय दिन भर सोना हो गया ,
यह छुट्टी नहीं अब रोना हो गया | 
सुबह शाम बस खुद में खो गया ,
न जाने किसने जगाया और सो गया | 
मेरा मन हर सपने में मचलता गया ,
न  जाने कब सूरज भी ढलता गया | 
जो सोया फिर सबकुछ खोया ,
पाने के लालच में मन को ढोया | 
हाय दिन भर सोना हो गया ,
यह छुट्टी नहीं अब रोना हो गया | 
                                                                                                                        कवि :कुलदीप कुमार ,कक्षा :12th
                                                                                                                                                          अपना घर  

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

कविता:" आंबेडकर जयंती "

" आंबेडकर जयंती "
आज बात कर रहे है उनका ,
जिसने भारत देश को स्वतंत्र बनाया | 
गरीबों के हक़ के लिए आवाज उठाया ,
और उन लोगो को सही सम्मान दिलाया | 
दलितों के लिए नवदीप जलाया ,
समाज में नया परिवर्तन लाया | 
और नीच जाती के लोगो को उच्च जाती तक पहुँचाया ,
लोकतंत्र देश के लिए बड़ा योगदान निभाया | 
                                                                                                                         कवि :नवलेश कुमार ,कक्षा :10th
                                                                                                                                                          अपना घर  

गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

कविता :"आंबेडकर जयंती "

"आंबेडकर जयंती "
जिस जगह से मैं  गुजरूं ,
वह जगह अपवित्र हो जाता | 
जिस कुंआ का पानी मैं पिया ,
वह कुंआ का पानी अपवित्र हो जाता | 
हर कदम और हर जगह पर ,
छुवा -छूत से लड़ना पड़ता | 
इस समाज  में हर कठिनाइयों  को सहना पड़ता ,
जब एक ने आवाज इस पर उठाई | 
हजारो की संख्या के साथ लोग है आए ,
हर एक चीजों से हम सब को आजाद है कराया | 
छुवा -छूत और जात -पात से ,
इस समाज से छुटकारा है दिलाया | 
जिस जगह से मैं गुजारूं ,
उस जगह पर चैन से सो सकूं | 
                                                                                                                       कवि :संजय कुमार , कक्षा:12th
                                                                                                                                                      अपना घर 
  
                                                                                    






 

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

कविता : "मुसाफ़िर "

 "मुसाफ़िर "
हम मिसफ़िर बनकर | 
निकल पड़े अनोखी राह की तलाश में,
न तपती धूप की परवाह | 
न आंधी और तूफान की ,
और न वह डरावनी रातों की | 
 हम सब निकल पड़े ,
ढलते सूरज की ओर | 
चमकते लालिमा को देखकर ,
टिमटिमाते तारो को देखकर| 
बहती शीतल हवाओं में ,
 हम सब निकल पड़े| 
                                                                                                                     कवि : अमित कुमार , कक्षा :10th 
                                                                                                                                                      अपना घर