कविता
(बच्चों का आकाश .... बच्चों के लिए)
कविता
कविता
हर गली में हर डगर में
कहीं किसी राह के कोने में
मिलती नई ज़िंदगी पड़ी यूँ उलझे चौराहों में
जल गयीं क्या सारी कीताबें
या खो गयी किसी शहर में
बिखरे हुए लगते है सारे मदरसे
समुन्द्रों कि गहराई में छुपे लगते है स्कूल सारे
गलियां भी अब रूठ गयी है
बेसहारा को देख कर टूट गयी है
बेज़ुबान है इंसान यहाँ
हारा हुआ है ये जहाँ
कतरा कतरा बस जल उठता है
हश्र ये देखकर जी रो उठता है
कबतक यूँ ही बिखरा रहेगा
ये जहाँ कब तक शांत रहेगा
गलियां कहाँ तक शांत रहेगी
गीली मिटटी में क्या सब गल जायेगा
गलतिया न होते हुए भी उनकी क्या उनका स्कूल छिन जायेगा
क्यों भिखरी हुई है ज़िंदगी यूँ राहों में
क्या खो गयी है किताब कहीं दूर शहरों में
कवि - साहिल
कक्षा -9
(अपना घर )
कविता
होली का ये महीना है रंगो का का त्यौहार आया
झूम - झूम कर खेलेंगे खूब गुलाल लगाकर
मजा तो आएगा होली में सभी को रंग लागने से
पर वो दिन क्या ही था जब जब हम नहा भी लिया करते थे
गुजिया तो खाते ही है सबको खिलते भी है बाटते भी है
मन को खुश कर देती है ये तरह तरह के रंग को दिखा कर
महीना का अपना ही अंदाज है रंगो का राज है