मंगलवार, 10 मार्च 2026

ज़िंदगी तो पलभर का है

कविता 

ज़िंदगी तो पलभर का है 
कभी ख़ुशी का तो कभी दुखी का है 
कब बीत जाये पता ही नहीं 
क्या हो जाये खबर ही नहीं 
खो जये कब क्या ये पता ही नहीं 
ज़िंदगी तो पलभर का है 
कभी खुशी तो कभी कभी दुखी का है 
कभी गिरन तो कभी उठना है 
यही तो ज़िंदगी का सफर है 
    कभी ख़ुशी तो कभी दुखी का है 
ज़िंदगी तो पलभर का है
 कभी ख़ुशी तो कभी दुखी का है 
कवि -शिवा कुमार 
( अपना घर ) 
  



 

कविता: "इंतजार"

"इंतजार"
 न जाने मेरी इन नजरो को,
कैसी किशोरी लुभा गई
जो पलकों को झपका भर मानो 
इसारे से मुझे हका गई 
पगली मुझे ये क्यों इस तरह तुम 
पागल मुझे बनानी हो 
नहीं अपनाती हो मुझे 
न तुम खुद मेरी बन जाती हो 
अरे ! निदर्य - कुटील सी मेरी सनम 
ऐसे बिच समुन्द्र में क्यों 
अकेले तड़पने छोड़ गई हो 
गुलमोहर की दुनिया इस हल में पाना 
तेरे बिना आसान नहीं 
बिहार हुआ हूँ तेरी कभी से 
बंजारा बन हाँ कभी कभी रे 
जाता हूँ में जोगिया सा 
खो मैं खुद को चाहता की तेरी दुनिया में 
हार कर फिर जीत मैं पाउँगा 
सब सच मैं कर दिखलाऊंगा 
हाँ सब आसान हो जाएगा
होगा जब मिलान का इंतजार खत्म। 
कवि: पिंटू कुमार कक्षा: 10th, 
अपना घर।  
 

रविवार, 8 मार्च 2026

हर गली में हर डगर में

 कविता 

हर गली में हर डगर में 

कहीं किसी राह के कोने में 

मिलती  नई ज़िंदगी पड़ी यूँ उलझे चौराहों  में 

जल गयीं क्या सारी कीताबें 

या खो गयी किसी शहर में 

बिखरे हुए लगते है सारे मदरसे 

समुन्द्रों कि गहराई में छुपे लगते है स्कूल सारे 

गलियां भी अब रूठ गयी है 

बेसहारा को देख कर टूट गयी है 

बेज़ुबान है इंसान यहाँ 

हारा हुआ है ये जहाँ 

कतरा कतरा बस जल उठता है 

हश्र ये देखकर जी रो उठता है

कबतक यूँ ही बिखरा रहेगा 

ये जहाँ कब तक शांत रहेगा 

 गलियां कहाँ तक शांत रहेगी 

गीली मिटटी में क्या सब गल जायेगा 

गलतिया न होते हुए भी उनकी क्या उनका स्कूल छिन जायेगा 

क्यों भिखरी हुई है ज़िंदगी यूँ राहों में 

क्या खो गयी है किताब कहीं दूर  शहरों में 

कवि - साहिल

कक्षा -9  

(अपना घर  )

 

 

 



अब हो गया ठंडी ख़त्म

कविता 
अब हो  गया ठंडी  ख़त्म 
अब बस गर्मी ही गर्मी 
रज़ाई हो गयी अब अंदर 
अब कोहरा का नाम नहीं 
सब हर तरफ खुला आसमा 
अब ठंडी हो गया ख़त्म 
अब बस गर्मी ही गर्मी 
अब रोज़ रोज़ गरम कपडे 
पहनने का काम ख़त्म 
अब बस एक ही टी- शर्ट से काम जायेगा 
अब ठंडी हो बजाय है ख़त्म 
अब बस गर्मी ही गर्मी 
कवि - अमित कुमार
(अपना घर  )
 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

शांति

कविता 

शांति 
मेरे नजरों के सामने 
फसलों  घेरे में 
उसके आगे थोड़े 
थोड़े से पीछे भी 
मशीनों की ा रही बेसुर आवाज़ 
जिससे चली गयी कोसो दूर 
मेरे नज़रो  में जो शांति थी 
गाड़ी थोड़े अलग शोर से 
जोर-जोर खींचे जा रही मेरे कान 
पेंच हथोड़ी चीनी करते तब तब आवाज़ 
मेरे दाहिने पटीने और ठहरी जो शांति थी 
पीछे लड़ते कुत्तों के झुण्ड 
है बड़ी  बेरहम 
जिसके भोकने के मारे 
मर गयी शन्ति 
जो मौजूद थी पीठ  के पीछे  
कवि -पिंटू 
कक्षा -10 
(अपना घर) 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

 होली का ये महीना है रंगो का का त्यौहार आया 

झूम - झूम  कर खेलेंगे खूब गुलाल लगाकर 

मजा तो आएगा  होली में सभी को रंग लागने से 

पर वो दिन क्या ही था जब जब हम नहा भी लिया करते थे 

गुजिया तो खाते ही है सबको खिलते भी है बाटते भी है 

मन को खुश कर देती है ये तरह तरह के रंग को दिखा कर 

महीना का  अपना ही अंदाज है रंगो का राज है 

"पहले देखा था माँ ने वो दिन "

"कविता" 
पहले देखा था माँ ने वो दिन 
जब दुनिया लगती थी पूरी हरी भरी 
जब से बढ गए लोग 
तब से लगी दुनिया ख़तम पेडो से पूरी
पहले देखा था मेने वो दिन 
जब दुनिया पूरी लगती हरी भरी 
अब लोग बनाते पेड़ों को काटकर लकड़ी 
काट काटकर लकड़ी 
काट काटकर पेड़ों से लकड़ी ख़तम होने लगे पेड़ ही पुरे 
पहले देखा था माँ  ने वो दिन 
जब दुनिया लगती पूरी हरी भरी  
                                                                                                       
 
 कवी अभिषेक कुमार
                                                                                                      कक्षा : 7 

सोमवार, 2 मार्च 2026

कविता: "क्या आपने जिंदगी देखी है"

"क्या आपने जिंदगी देखी है"
थक कर चूर हो गए। 
शरीर  भी झुलस गए अब ।। 
आँखों में समुन्दर था । 
वो भी बह गए सब ।। 
आशा तो बहुत थी उनसे पर बर्सी नहीं है । 
झुलस गए सारे फसल ।।  
जो पेट में घसती नहीं है । 
एक टुकड़ा भी नहीं बचा निवाले का ।। 
जो संतुस्ट कर दे । 
क्यों नहीं बचाया मेरे लिए ।। 
जगह इस जग में । 
बस इतना कह के ।। 
 नालियों के किनारे बसा दिया। 
अब किया इसी में मर ले ।। 
क्या नफरत है हमसे बस इतना कह दे । 
कवि; सुल्तान कुमार, कक्षा: 12th,
आशा ट्रस्ट कांनपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 1 मार्च 2026

कविता: "उड़ने दो परिंदो को आसमान में"

"उड़ने दो परिंदो को आसमान में"
 उड़ने दो इन परिंदो को आसमान में। 
पंख फैलाने दो उनको जहाँन में ।। 
मेहनत से कब तक भागेंगे ये । 
इनको उड़ना तो पड़ेगा एकदिन ।। 
जीने के सफर में । 
फैलती इस बेसहारा दुनिया में ।। 
कबतक साथ चलेंगे इनके । 
कभी तो फ़ैलाने दो पंक उनको ।। 
उड़ने के लिए उँचे आसमान में । 
कद्र करना सीख पाऐंगे ।। 
मेहनत से खुद की अपनी । 
हर मेहनत का मतलब समझ जाऐगे ।। 
हाथ छोड़ दो इनका यहाँ पर । 
उड़ने दो इन परिंदो को आसमान में ।। 
पंख फ़ैलाने दो इनको जहाँन में ।
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 10th, 
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

कविता: "एग्जाम के दिन"

"एग्जाम के दिन"
आया है एग्जाम के दिन। 
गुजर रहे है एक - एक दिन ।। 
सुबह से शाम तक कुछ पता नहीं है चलता । 
पुरे दिन किताबे पढ़ने में गुजरता । 
सपने आते राज एग्जाम के ही ।। 
दिन बचे है काम अभी अपने पास । 
पढ़ने है सारे विषय कभी - कभी ।। 
मन करता पढ़ने को  कभी कभी  । 
वैसे तो पूरा दिन सोते ही गुजरते है ।। 
पेपर के बाद वैसे भी कौन पढता है । 
आ गया है एग्जाम के दिन । 
गुजर रहे है एक - एक दिन ।। 
कवि: नसीब कुमार, कक्षा: 3rd,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

कविता: "लक्ष्य"

"लक्ष्य" 
इरादे छोटे है हमारे।  
छोटे - छोटे डेग को जब हम बढ़ाते है ।। 
हम कुल जैसे भरते जान है । 
भले ही नाजुक सोच हमारी है।।  
लक्ष्य को हमारे गले लगाने का विचार गहरे है । 
पहुँचेंगे मुकाम पर अपने ।। 
यह हमने भी किया है तय । 
रहना है हरहाल में पाकर ।। 
इस विषय पर हमें विजय। 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"