कविता
बचपना छोड़ बड़ा होना है
अपनी अपनी मंजिल ढूंढ़ना है
मंजिल के लिए आगे बढ़ना है
कुछ बढ़ने के चक्कर में पड़कर
जीना भूल गए
अपना बचपना छोड़ जल्दी ही बड़े हो गए
खुद को आगे निकलना है
यही सोचकर लोग एकदूसरे से भिड़ गए
जीतने के लिए
सब एक दूसरे को हारने में लग गए
बचपना छोड़ बड़े हो गए
कविता हमारे कवीसाहिल द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 2018 में आये थे साहिल इस समय कक्षा 10 में पढ़ते है | अपना घर में 8 साल से रह रहे है | ये बड़े होनहार छात्र है यहाँ के ये बहुत छोटे ही उम्र में कवितायेँ लिखने लगे है |