गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

कविता:"मेहनत की कमाई का एक रुपया "

"मेहनत की कमाई का एक रुपया  "

मेहनत की कमाई का  एक रुपया ,

सौ रूपए की कीमत को चुकता  है।

आपकी हर जरूरतों को पूरा करता  है।

मेहनत से कमाया  गया रुपया ,

आपके  हर अरमानों को पूरा करता  है।

 कमाए गए रुपयों पर  किसी का दबाव नहीं रहता,

मेहनत की कमाई का  एक रुपया ,

सौ रूपए की कीमत को चुकता  है।


जो आपको गरीब से अमीर बना देता है।  

मेहनत की कमाई का  एक रुपया ,

सौ रूपए की कीमत को चुकता  है। ।  

कवी: अमित कुमार ,कक्षा: 8वीं 

अपना घर 


शनिवार, 3 दिसंबर 2022

कविता: "रोशनी"

"रोशनी"
इस रोशनी में भी मुझे ,
अँधेरा सा लगने लगा है।
ये ढालता सूरज भी मुझे अब ,
साथ देने लगा है।
कम्बख्त भी मेरे साथ,
क्या खेल खेला है।
जहाँ मुझे खड़ा होना था,
वहां मुझे गिरा दिया है ।
जिस तरह सूरज शाम को,
ढल जाने का इन्तजार करता है।
उसी तरह ढल जाने की राह में हूँ ।

कवी: सनी कुमार , कक्षा : 11वीं
अपना घर

रविवार, 27 नवंबर 2022

कविता: "आखिर कब तक"

 "आखिर कब तक"
आखिर कब तक हम इन जंजीरों में 
इस प्रकार बंधे रहेंगे 
और क्यों इनकी गोलियां सहेंगे 
मेरा भी हक़ है देश में रहने का 
इन आसमानों में उड़ने का 
आखिर कब तक हमपर अत्याचार 
करेंगे ये सब । 
मेरा भी हक़ है स्वतन्त्र होकर घूमने का 
अपनी मंजिलों को पाने का 
आखिर कब तक ये भूँखा रखेंगे हमें 
कोई फसल उगने को 
अपना नहीं तो गरीबों को ही सही 
आखिर कब तक हम इन जंजीरों में 
इस प्रकार बंधे रहेंगे 
मेरा भी हक़ है शिक्षा पाने का 
स्वच्छंद होकर लहराने का 
आखिर कब तक हम इन जंजीरों में 
इस प्रकार बंधे रहेंगे ।
कवी: सुल्तान कुमार , कक्षा: 8th 
अपना घर
 

शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

कविता :"मौसम ने बदल लिया मोड़ "

"मौसम ने बदल लिया मोड़ "

मौसम ने बदल लिया मोड़ ,

गर्मी से सर्दी कर दिया जोर।

सर्दी से बचकर है रहना ,

सर्दी को सहते है रहना।

गर्मी से सर्दी कर दिया जोर,

टाइम का पता नहीं चलता।

कब हुआ सबेरा कब हुआ अँधेरा,

मौसम ने बदल लिया मोड़।

पौलुसन  से और बढ़ रहा है सर्दी,

मौसम ने बदल लिया मोड़। ।

कवी: राहुल कुमार ,कक्षा 9th 

अपना घर

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

कविता :"वो तुम्हें नहीं भूली है"

"वो तुम्हें नहीं भूली है"

उसको छोड़कर ,

दोस्तों से गपसप सही  है। 

क्या तुम्हारे पास ,

माँ खातिर एक पल नहीं है। 

जिसने तुम्हे खुद से भी ज्यादा चाहा,

तुम तो उसे भूल गए।

पर उनके दिल में तुम्हारी जगह वहीँ है,

क्या तुम्हे नहीं लगता की।

माँ खातिर दोस्त छोड़ना सही है। 

उसे भूल चाहे याद कर पर ,

एक बात जरूर जान लेना तुम उसे भूल गए हो पर ,

वो तुम्हें नहीं भूली है। । 

कवी: महेश कुमार ' कक्षा:8th 

अपना घर

बुधवार, 23 नवंबर 2022

कवित: " जिंदगी है बहते सागर जैसा "

" जिंदगी है बहते सागर जैसी "

जिंदगी यह बहता सागर की तरह है ।

जिंदगी का कोई तो छोर होगा ,

सागर के बहते लहरों में ,

अपने हौसलों को बनाया है ।

इन नन्ही चीटियों को देखकर,

हर विपत्ति से लड़ने का हौसला आया है ।

अपने लक्ष्य की ओऱ बढ़ते क़म,

मुशीबतों को देखकर पीछे न होगा।

जिंदगी एक बहता सागर की तरह है,

इस जिंदगी का कोई तो छोर होगा ।

कवी: संजय कुमार ,कक्षा 12TH 

अपना घर 

 


मंगलवार, 22 नवंबर 2022

कविता : "रूठ गई वह डाली"

"रूठ गयीं वह डाली"

रूठ गई वह डाली,

जिस पर फूल खिले थे वह निराले ।

सुबह की वह किरण जो ,

पेड़ के मन को कर देती हरियाली ।

वह आज दिख नहीं रही है ,

कौन सी मौसम बन गई उसके लिए पराई ।

पूंछ  रही है वह सबसे ,

क्या हमने कोई गड़बड़ कर दी भाई ।

जिंदगी हो या फिर मौत ,

पलंग बनकर निभाता हूँ ।

जिंदगी में आखिरी समय भी ,

  तुम्हारे शरीर को पावन कर आता हूँ ।

फिर भी मेरी जिंदगी की ऐसी मजाल ,

उखाड़ने के लिए लोग हैं बेक़रार ।

कब पहुंचेगी मेरी लफ्जों की गुहार ,

एक सांस में है मेरे जीवन का संचार ।

फिर भी क्यों रूठ गई वह डाली ,

जिस पर फूल खिले थे वह निराले ।

कवी: विक्रम कुमार, कक्षा 12th 

अपना घर

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

कविता: " दोस्त "

 " दोस्त "
दोस्त जा रहा है दूर,

पता नहीं कब लौटेगा।

कभी न कभी मुझे,

 उसकी याद सताएगी ।

पढ़ाया, लिखाया,खिलाया, पिलाया,

अच्छे गानों में नाच नचाया ,

पता नहीं कब आएगा उसका साया,

दोस्त न सही एक अच्छा इंसान है ।

वही मेरे लिए गुरु सामान है ।

दोस्त जा रहा है दूर ,

पता नहीं कब लौटेगा,

कभी न कभी मुझे उसकी याद आएगी ।

कवी : मंगल कुमार , कक्षा: 6th 

अपना घर

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

कविता : "पूरी दुनिया देखनी है तुमको "

"पूरी  दुनिया देखनी है तुमको "

अभी तो सिर्फ घर परिवार और गाँव देखा है ।

अभी तो पूरी दुनिया देखनी है  तुमको,

उसमे क्या गलत हो रहा है।

सुधारना है तुमको ,

अभी तो खुद के हक़ के लिए लड़े  हो ,

दूसरों के खातिर लड़ना है तुमको ।

लिंग जाती का भेद हटाकर ,

इस दुनिया को बदलना है तुमको ।

लड़के तो वैसे ही आगे हैं पर ,

लड़कियों के खातिर काढ़ना है तुमको ।

अभी तो सिर्फ घर परिवार गाँव देखा है ,

अभी तो पूरी दुनिया देखनी है  तुमको ।

कवी : महेश कुमार , कक्षा : 8th

अपना घर  

सोमवार, 19 सितंबर 2022

कविता : " डल के ये जो शाम आई है "

" डल के ये जो शाम आई है "

 डल के ये जो शाम आई है |

देख कितने रंग लाई है ,

जगमगा उठा सारा आँगन |

लगता जैसे आया सावन ,

मन मोह लेता  है दृश्य |

मुरझाये फूल भी ,

महकेंगे अवश्य |

एक नया उमंग आई है ,

डल के ये जो शाम  आई है | 

कवि : देवराज कुमार , कक्षा : 12th 

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रविवार, 18 सितंबर 2022

कविता : " शुरू हुआ त्यौहारों का महीना "

" शुरू हुआ त्यौहारों का महीना "

शुरू हुआ त्यौहारों का महीना  | 

शोर गूंजता  चारों ओर ,

ढोल पीटते मस्त मगन में |

मेले की वह चाट -बतासा ,

शुरू हुआ त्यौहारों का महीना  |

कुछ दिन बात दहशहरा के मेले में जाना है ,

भिन -भिन चीजों को गोर से देखना है |

मजे से मेले में आनंद उठाना है ,

शुरू हुआ त्यौहारों का महीना |

कवि : अमित कुमार , कक्षा : 8th 

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