कविता
गाँव की गलियों से निकलकर
शहरों की गलियों में
भटक क्यों रहा हूँ इन अनजान गलियों में
गलियारे ही बचे है क्या
क्यों खो गए खेत कहाँ
कहाँ खो गयी वो बूढ़ी नजरे
जो रात रात भर जागकर हाल पूछती थी
सब बदल सा गया है
है लगता है की गाँव गलियों से निकलकर
मई खो गया हूँ
या फिर मैं गाओ को भूल सा गया हूँ
नाम - साहिल कुमार
कक्षा -10