गुरुवार, 5 मार्च 2026

 होली का ये महीना है रंगो का का त्यौहार आया 

झूम - झूम  कर खेलेंगे खूब गुलाल लगाकर 

मजा तो आएगा  होली में सभी को रंग लागने से 

पर वो दिन क्या ही था जब जब हम नहा भी लिया करते थे 

गुजिया तो खाते ही है सबको खिलते भी है बाटते भी है 

मन को खुश कर देती है ये तरह तरह के रंग को दिखा कर 

महीना का  अपना ही अंदाज है रंगो का राज है 

"पहले देखा था माँ ने वो दिन "

"कविता" 
पहले देखा था माँ ने वो दिन 
जब दुनिया लगती थी पूरी हरी भरी 
जब से बढ गए लोग 
तब से लगी दुनिया ख़तम पेडो से पूरी
पहले देखा था मेने वो दिन 
जब दुनिया पूरी लगती हरी भरी 
अब लोग बनाते पेड़ों को काटकर लकड़ी 
काट काटकर लकड़ी 
काट काटकर पेड़ों से लकड़ी ख़तम होने लगे पेड़ ही पुरे 
पहले देखा था माँ  ने वो दिन 
जब दुनिया लगती पूरी हरी भरी  
                                                                                                       
 
 कवी अभिषेक कुमार
                                                                                                      कक्षा : 7 

सोमवार, 2 मार्च 2026

कविता: "क्या आपने जिंदगी देखी है"

"क्या आपने जिंदगी देखी है"
थक कर चूर हो गए। 
शरीर  भी झुलस गए अब ।। 
आँखों में समुन्दर था । 
वो भी बह गए सब ।। 
आशा तो बहुत थी उनसे पर बर्सी नहीं है । 
झुलस गए सारे फसल ।।  
जो पेट में घसती नहीं है । 
एक टुकड़ा भी नहीं बचा निवाले का ।। 
जो संतुस्ट कर दे । 
क्यों नहीं बचाया मेरे लिए ।। 
जगह इस जग में । 
बस इतना कह के ।। 
 नालियों के किनारे बसा दिया। 
अब किया इसी में मर ले ।। 
क्या नफरत है हमसे बस इतना कह दे । 
कवि; सुल्तान कुमार, कक्षा: 12th,
आशा ट्रस्ट कांनपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 1 मार्च 2026

कविता: "उड़ने दो परिंदो को आसमान में"

"उड़ने दो परिंदो को आसमान में"
 उड़ने दो इन परिंदो को आसमान में। 
पंख फैलाने दो उनको जहाँन में ।। 
मेहनत से कब तक भागेंगे ये । 
इनको उड़ना तो पड़ेगा एकदिन ।। 
जीने के सफर में । 
फैलती इस बेसहारा दुनिया में ।। 
कबतक साथ चलेंगे इनके । 
कभी तो फ़ैलाने दो पंक उनको ।। 
उड़ने के लिए उँचे आसमान में । 
कद्र करना सीख पाऐंगे ।। 
मेहनत से खुद की अपनी । 
हर मेहनत का मतलब समझ जाऐगे ।। 
हाथ छोड़ दो इनका यहाँ पर । 
उड़ने दो इन परिंदो को आसमान में ।। 
पंख फ़ैलाने दो इनको जहाँन में ।
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 10th, 
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

कविता: "एग्जाम के दिन"

"एग्जाम के दिन"
आया है एग्जाम के दिन। 
गुजर रहे है एक - एक दिन ।। 
सुबह से शाम तक कुछ पता नहीं है चलता । 
पुरे दिन किताबे पढ़ने में गुजरता । 
सपने आते राज एग्जाम के ही ।। 
दिन बचे है काम अभी अपने पास । 
पढ़ने है सारे विषय कभी - कभी ।। 
मन करता पढ़ने को  कभी कभी  । 
वैसे तो पूरा दिन सोते ही गुजरते है ।। 
पेपर के बाद वैसे भी कौन पढता है । 
आ गया है एग्जाम के दिन । 
गुजर रहे है एक - एक दिन ।। 
कवि: नसीब कुमार, कक्षा: 3rd,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

कविता: "लक्ष्य"

"लक्ष्य" 
इरादे छोटे है हमारे।  
छोटे - छोटे डेग को जब हम बढ़ाते है ।। 
हम कुल जैसे भरते जान है । 
भले ही नाजुक सोच हमारी है।।  
लक्ष्य को हमारे गले लगाने का विचार गहरे है । 
पहुँचेंगे मुकाम पर अपने ।। 
यह हमने भी किया है तय । 
रहना है हरहाल में पाकर ।। 
इस विषय पर हमें विजय। 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

Poem: "A Step out from the World"

"A Step out from the World"
 Don't walk with crowd,
make a path which fallow others,
do whatever you deserve, 
everything is possible,
just make a step out from the world .
trouble come always in year way,
problem never move side away,
losing hope doesn't matter,
fall of yours's don't matter,
but it matters you wasn't try.
No, one is perfect, 
everyone has some defects,
don't become like others,
be a role for others.
to gain something, have to lose something,
which always remembers you,
who you are?
never forget our past,
to improve the past, 
make a step out from the world.
Poet: Allies Group, 
Asha Trust, Kanpur Kendra, "Apna Ghar"

कविता: "एग्जाम"

"एग्जाम" 
आ गया वो दिन जिसका महीनों से इंतजार था। 
दिन और रात को अब एक करना होगा ।। 
बंद कमरे में अकेले पढ़ना होगा । 
बहुत हो गए मजे अब हमें अब पढ़ना होगा।।  
१ - २ घंटा ही सही पर मन लगाकर पढ़ना है । 
कोई  काम नहीं करना है ।। 
किताबी कीड़ा अब बनना है । 
खेलना तो बंद हो ही गया है ।। 
अब तो उलटी गिनती भी गिनना सुरु हो गया है । 
इंतजार की घड़ी आ चली है ।। 
 आज ही हमारा अंग्रेजी का एग्जाम है । 
टारगेट तो 75 + का है । 
जिसका सदियों से थे इंतजार अब वो दिन आ गया है ।। 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"


बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

कविता: "परीक्षा"

"परीक्षा"
 समय के साथ जिंदगी चल रही है। 
अब सूरज कि तरह यह ढल रही है ।।
दिन का कोई अब अता - पता नहीं ।
फिर भी ये दिन आगे बढ़ने लगी है ।।
बस समय के साथ जिंदगी चल रही है ।
परीक्षा के दिन है आने वाले ।।
वही है हमारा मेहनत का राज बताने वाले ।
कौन किस हालत में रहा ।।
यही है सबको दिखने वाले ।
समय पर समय दिन घट रहा है ।।
वो पास आता जा रहा है ।
डरने वाली बात है उस दिन ।।
पर वो कुछ खास लाए रहा है ।
समय के साथ साथ वो पास आ रहा है ।।
और हमारे लिए कुछ खास ला रहा है ।
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर" 

कविता: "कठिन परिश्रम"

"कठिन परिश्रम"
पड़ने लगे हाथो में छाले इनके। 
 हाथो की रेखाए भी मिटने लगे ।।
काम इतना करते है, की अब काम भी इनसे डरने लगे है ।
पसीना से नहा लेते है यह, न ही कूलर नसीब हुए ।।
गर्मी बरसात या हो सर्दी, अब ये भी सब भी दलने लगे ।
सूरज की धुप इतना सहते है की सूरज भी इनसे डरने लगे है ।।
फसल तो बो दिए अब इनसे, पर डर है कही ख़राब न हो जाए ।
सुबह से लेकर अब शाम तक निगरानी करने लगे है ।।
फसल कही खराब न हो जाये, अब ये जगने लगे है ।
बीसो साल लगा के अब पहाड़ भी काटने लगे ।।
हिम्मत तो बहुत है इसमें अब पर्वत भी इनसे डरने लगे। 
मजदूर है हम, मजदूरी में हम मरने लगे है ।।
कवि: सुल्तान, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

कविता: "माँ तेरी याद आज आ रही है"

"माँ तेरी याद आज आ रही है"
 माँ तेरी याद आज आ रही है। 
ना जाने क्यों आँखो से आसु आने लगे है ।। 
तेरी ममता याद आ रही है । 
    वो बचपन भी याद आ रहा है ।। 
जब मैं बालू में खेला करता था और आप डाटती थी।  
जब तेरे हाथों के बना खाना खाता था।। 
तेरे बनाए पकवान दोस्तों के बाट कर खाया  करता था।  
होली के दिन भर पेट खता था गुजिया और पकोड़ी ।। 
दिन भर तो घूमना होता था  । 
बिन बताए बाहार भाग अक्सर जाय करता था ।। 
मार तो हमेश तुमसे कहता था । 
पर मैं नहीं मानता था ।। 
बिन बताए बाहार भाग अक्सर जाय करता था। 
तुमसे आज बात होगी न, जाने मेरी माँ कैसी होगी  ।। 
तुझसे न जाने कब मिलूँगा । 
 माँ तेरी याद आज आ रही है। 
ना जाने क्यों आँखो से आसु आने लगे है ।। 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"