शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

कविता: "बच्चे काम जा रहे है"

"बच्चे काम जा रहे है" 
बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये। 
वही मैले कपड़े पहने रहते है ।। 
काम करने पर कुछ खाने को दे देते है । 
दिन भर मेहनत करा के शाम को छुटी कर देते है ।। 
एक बार उनके हाथो को देखो तो, उनकी लकीरे शायद ही हो,
उनसे पूछो तो उनके दिल में किस चीज की चाह है ।। 
कभी स्कूल के लिए पूछो । 
शायद एक उगता सूरज बन सकता हो।। 
अंधेरो मार भगा सकता हो । 
एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।  
ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।  
 बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।। 
 कवि: नरेंद्र कुमार, कक्षा: 3rd,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

कविता: " क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?"

 " क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?"
क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?
 बच्चे सही सो नहीं पाते है। 
हम जैसे बच्चे को अभी सोने की जरूरत है ।।
आपके आने से उठ जाते है हम ।
कुछ लोग काम पर भी चले जाते है ।।
जरा देखो तो सूरज जी चँद दीदी कितनी दिन बाद है ।
12 बजे से पहले आ नहीं पाती है।। 
और आप 7 बजे से पहले आ जाते है ।
आते हो पर मत जाया करो ।
लोगो का काम रुक जाता है आपके जाने से ।।
 क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?
कवि: रौशन कुमार, कक्षा: 3rd,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र."अपना घर" 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

कविता: "उदास बैठा मेरा यार"

"उदास बैठा मेरा यार"
 न जाने मेरा आज मुझसे क्यों उदास अलग बैठा है। 
आज कल मेरा दोस्त बात भी करना बंद कर दिया है।। 
बात करो तो आँखे बचाता है पता नहीं वो क्या चाहता है । 
उसका हर उदासी मेरी है उसका बहता हर एक आँसू मेरे है ।। 
पूछने पर इंकार करता है पता नहीं वो क्या चाहता है । 
कही न कही मेरे लिए तो जगह होगा उसके दिल में ।। 
उसे भी बुरा लगता होगा जब मैं उदास हो जाउ। 
उसके उदास हो जाने ऐसा लगता है जैसा । । 
आज सूरज आसमा में न हो ।
बीते समय है याद आते, ये सोच कर दिल मेरा रोता है । । 
पर आँखों से आँसू निकल न आ पाते नहीं । 
आखिर क्या चाहता है वो।। 
गाँव की गलियों में क्रिकेट अक्सर खेला करते थे । 
खेत खलियानो में घूमा करते थे एक दूसरे को चिढ़ाया करते थे । । 
हसी खुशी नहर में नहाया करते थे घर पे हो तो । 
माँ एक ही प्लेट खाना परोस देती थी दोनों भाई की तरह खा लिया करते थे । । 
बीते समय है याद आते, ये सोच कर दिल मेरा रोता है ।
 न जाने मेरा आज मुझसे क्यों उदास अलग बैठा है। । 
आज कल मेरा दोस्त बात भी करना बंद कर दिया है।। 
कवि: नीरज II, कक्षा: 5th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

कविता: "काले बादल"

"काले बादल"
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
गरज रहे है बादल आसमा में 
बिजली भी चमक रही है जोर - जोर से 
छाता का इस्तेमाल होने लगे एक तरफ से से 
बरसा रहे है अब पानी की बुँदे 
हर गली हर गाँव नया दिखने लगा अब 
नाच रहे है अब मोर कर के खूब सोर 
सब कुछ धूल गया हो मानो 
आँखे खुल गई हो मनो 
बारिश हो रही है खूब 
आते जा रहे है काले बादल 
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"




सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

कविता: "क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है"

"क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है
लिख दूँ तो क्या समझ लोगे। 
बोलूँ अगर तो क्या सुन लोगे । 
बनाए उनके रास्ते से तो गुजरेंगे । 
पर मेहनत की अहमियत नहीं समझेंगे । 
हर मज़दूर खुद से यह सवाल पूछता है । 
क्यों खुद अमीर - गरीब में फर्क रखता है । 
इमारते ईटो और पत्थरो से सजाता है । 
हर खतरा सहकर एक महल खड़ा करता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
टूटती उम्मीद और बिखरता साहस । 
ये सारी खामियाँ लेकर चलता है । 
गुजरा कल और आता भविष्य, भूल जाता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
उनकी बनाए हुए माकन पर हम रहते है । 
आते - जाते रास्ते में एक नहीं हजार बार मिलते है । 
पर कोई उनका इज्ज़त नहीं करना जनता है । 
न जाने क्यों इमारते ईटो और पत्थरो से एक मज़दूर ही क्यों सजता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

कविता: "अँधेरी रात हो रही है"

"अँधेरी रात हो रही है"
अँधेरी रात हो रही है।  
न जुगनू है न तारे है आसमा में । 
ऐसा क्यों लगता है की चाँद का मुखड़ा नराज़ सा है ?
 सब तरफ सन्नाटा और दर्द से भरे हुए है । 
आशा की उम्मीद मानो जैसे बस कम हो। 
मन चाहत की कब सवेरा हो । 
सूरज की किरणे एक बार फिर आसमा का हो । 
आते रहते है इन्सेक्ट की आवाजे । 
बड़े ही खतरनाक लगता है सुनने में । 
 दर का माहौल बना देता है रातो में । 
 अँधेरी रात हो रही है । 
न जुगनू है न तारे है । 
 दूर - दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता है । 
काली परछाई का राज चलता हो 
हर रात बस उनका हो ।  
कब एक बार फिर से सूरज आसमा में होगा  
आशा की उम्मीद अपना होगा।। 
चमकता सूरज हमारा हो ।  
कवि: निरंजन कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"


शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

कविता: "महात्मा गाँधी"

"महात्मा गाँधी"
हमें एक आज़ाद परिन्दा कह कर चले गए है। 
हर साल हमें याद दिलाता है 
सच बोलना भी सिखाया है 
हिन्सा राह पर चलना सिखाया है 
एक लाठी की दम पर ब्रिटिश को मार भगाया 
खून तो सबने बहाया था 
एक आज़ाद भारत को देखने के लिए 
आज़ाद परिन्दे के जैसा अब खुले आसमा में ये उड़ता है 
हर जगह अपना ही नाम लेता है 
हम आज़ाद है ये हर बार याद दिलाता 
फिर चाहे वो 15 August  हो या  26 January 
हर बार तो उन सब  को याद करते है 
हर साल हमें याद दिलाता है 
सच बोलना भी सिखाया है 
 प्यार से बापू उन्हें कहते थे 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

कविता: "समय आ गया है"

"समय आ गया है"
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा। 
मन को संभालना है 
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा 
अब पढ़ाई में मन लगाना है 
हर परेशनी में याद करना है 
दिन - रात अब लड़ना है 
आसमा और जमी एक करना है 
हर परिस्थितयों में अब पढ़ना है 
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा 
युद्ध के समान लगता है ये 
रातो को जगाता है ये 
पढ़ाई में मन लगाना है अब 
खेल - कूद बंद पड़ जाएंगे 
90% के हिसाब से तयारी हो रही है  
 कही नींद न आ जाए , पेपर में हम फैल न हो जाए 
इस दर की वजह से हमने तो अभी से ही पढ़ना शुरू कर दिए है 
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा। 
मन को संभालना है 
कवि: नीरज II, कक्षा: 5th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

कविता: "लड़को की जिम्मेदारी"

"लड़को की जिम्मेदारी"
घर में बड़े हो या छोटे। 
वे अपनी जिम्मेदारी समझते । 
नकारते नहीं कभी न कभी पीछे हटते है । 
जितना हम समझते है । 
लड़के की जिंदगी आसान नहीं होती । 
अपने ही आँसू पी जाते है । 
रोने पर भी वो रो नहीं पाते है। 
अंदर ही अंदर गम सह जाते है । 
ख्वाइस तो है उनकी भी । 
पर कभी वो बता नहीं पाते । 
जितना हम समझते है । 
लड़को की जिंदगी आसान नहीं होती । 
fail हो जाए तो उन्हें भी दुख होता है । 
कही depression में न चला जाए इसलिए खुश रहता है। 
आँसू तो गिरते है उनके भी। 
पर कभी अंदर से टूटते नहीं है।  
 जितना हम समझते है । 
लड़को जिंदगी आसान नहीं होती।। .......
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपूर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "बड़ा भाई"

"बड़ा भाई"
पिता का प्यार देता है वो। 
सारी परेशनियाँ झेलता है वो।। 
घर का बड़ा है। 
इसलिए सारी जिम्मेदारियाँ सम्भालता है वो। 
कभी - कभी तो अपनी खुशियाँ कुबीन कर देता है । 
 छोटे भाई के लिए तो ,
बड़ा भाई एक पिता भी बन जाता है । 
बुझते दीपक का सहारा बनता है । 
खुशियाँ जहाँन की बटोरकर देता है वो । 
बड़ा भाई होकर, एक पिता का साया देता है वो । 
अक्सर लड़ जाता हूँ मैं । 
बच्चा समझ रखा है कहकर,
रुठ जाता हूँ मैं । 
अपना फर्ज वो निभाता है । 
मनाने खुद चला आता है । 
बड़ा भाई ही माँ - पिता का प्यार साथ देता है वो । 
मेरी नासमझी को माफ करता है । 
हर डॉट पीछे प्यार छुपा देता है । 
बड़ा भाई ही माँ - बाप का प्यार देता है । 
कवि:  साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 25 जनवरी 2026

कविता: "मेरी भी जिम्मेदारी है"

"मेरी भी जिम्मेदारी है"
मेरी भी जीवन कि एक कहानी है। 
उनमे से एक भाग जिम्मेदारी है।
पढ़ाई करना या लापवाही करना,
ये मुझे खुद निभानी है 
ये उम्र में पढ़कर ही कुछ कर पाएंगे,
 ये बात मुझे खुद को बतानी है 
मेरी भी जीवन कि कहानी है 
 उनमे से एक भाग जिम्मेदारी है  
समस्या आएगी पर खुद को समझानी है 
हार तो नहीं मानना है 
ये जिम्मेदारी अपने दिमाग बैठानी है 
मेरी  जीवन कि एक कहानी है 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"