कविता
इस बदलते मौसम के दिन
चल रही है पसीने के बिन
रज़ाई है कम्बल है
फिर भी ठंडी है
मुश्किल हो गया है लोगो का नहाना
सब ठंडी का नाम लेकर करेंगे बहाना
बदलते मौसम के दिन
अब कैसे रहे कम्बल के दिन
हो रही है आजकल जल्दी शाम
सुबह का नहीं ले रहा है नाम
इस ठंडी के मौसम में
ये कविता हमारे कवी नीरू के द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 2018 में आये थे | इनको कविता लिखना बहुत पसंद है, ये इस वक्त कक्षा 10 के छात्र है | ये यहाँ के बहुत होनहार छात्र है | इनको अपना घर में रहते हुए 8 साल हो गए है | ये हर काम में यहाँ के मदद करते है और इनका चरित्र बहुत अच्छा है |