बुधवार, 29 जून 2022

कविता : "मेरा चाह"

"मेरा चाह"

 मेरा चाह है कि मैं जेई क्लियर करू | 

पर समझ न आए इसके लिए क्या करू ,

चक्कर खा जाता है इतना बड़ा सिलेबस देखकर | 

सोच में पड़ जाता हूँ उन सब को फेककर ,

टाइम मैनेज करना हो जाता है मुश्किल | 

सोच में पड़ जाता है क्या कर पाऊंगा लक्ष्य हाशिल ,

घण्टों विताना पड़ता है पढ़ने में | 

खूब दिमाग लगाना पड़ता है कुछ करने में ,

कविता : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 12th 

अपना घर 



मंगलवार, 28 जून 2022

कविता : " चाह है दूर जाने की "

" चाह है दूर  जाने की  "

चाह है दूर  जाने की  | 

पास से टिमटिमाते तारे को देखने की ,

महकते फूलो की बगिया में बह जाने की | 

लहराते झरनों की लहर में बह जाने की ,

चाह है दूर जाने की | 

अपनी अभिलाषा को पूरा करने की ,

कदमो -कदमो से मिलाकर |

सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ने की ,

महकते फूलो की बगिया में खो जाने की | 

चाह है दूर जाने की  ,

कविता : अमित कुमार , कक्षा :8th 

अपना घर  

शुक्रवार, 20 मई 2022

कविता : 26 जनवरी

26 जनवरी

 जान हथेली में लेकर वो चल दिए | 

बीन सोचे वह घर से  निकल लिए ,

चाह भी इस देश को आजाद कराऊ | 

इस भारत को एक स्वतंत्र देश बनाऊ ,

कोई खाया गोली तो कोई लगाया फासी | 

पर दी उन्होने हमें आजादी ,

26 जनवरी को उन्होंने बनाया अपना खास दिन |

याद रखा अपना हर रात -दिन ,

कुछ उनमें  सबके प्यारे |

पर कुछ छुपे हुए है बेचारे ,

कवि : कुल्दीप कुमार , कक्षा : 10th 

अपना घर


 

शुक्रवार, 13 मई 2022

कविता : " आंधी"

" आंधी"

 किस ओर चली ये आंधी |  

ठण्ड हवाओ का झोखा अपने संग बांधी ,

थोड़ी वर्षा यहाँ भी गिरा जाओ |  

इस भीषड़ गर्मी में हमको न तड़पाओ ,

सारे पेड़ों में मारी है आम की झोली | 

तुम देखका डर गई हमारी पेड़ भोली ,

थोड़ा हमपर रहम है करना | 

सारे आम को तुम मत झोरना ,

खटटे  -मिट्ठे  पके  आम हमारे | 

तेरे आते डर जाते हम सारे ,

झोपड़ियों को तुम मत उड़ा ले  जाना | 

पड़ता है उन्हें फिर दुबारा बनवाना ,

किस ओर चली ये आधी | 

कवि : कुल्दीप कुमार , कक्षा : 10th 

अपना घर

 

मंगलवार, 10 मई 2022

कविता : "माँ "

"माँ  "

नहीं चाहता धन और दौलत | 

न चाँदी न सोना ,

मुझे चाहिए मेरी माँ का | 

कभी न हो ,

जीवन को त्यागना | 

नहीं चाहता धन और दौलत ,

न चाँदी न सोना | 

क्योकि मेरी माँ है सब से प्यारी ,

माँ की ममता भी अनमोल होता है | 

जिसको नहीं चाहिए खोना ,

ये  भी नहीं चाहता कि |

मेरी वजह  से मेरी माँ को ,

पड़ जाए रोना | 

नहीं चाहता धन और दौलत ,

न  चाँदी न सोना | 

कवि : महेश कुमार , कक्षा : 8th 

अपना घर

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

कविता : " दोस्ती उसे बनाओ "

" दोस्ती उसे बनाओ "

 दोस्ती उसे बनाओ | 

जिनमें दोस्ती की लायक हो ,

अच्छे बुरे वक्त में काम आये | 

सफलता को एक राह बन जाए ,

मुसीबतों में पहाड़ बन जाए |  

बुलंद हौसले का त्यौहाररौनक  कराए ,

तारो की तरह टिम तिमाएँ | 

जुगुनू की तरह दोस्ती में फैलाए ,

दोस्ती उसे बनाओ | 

जिसमे दोस्ती का भरोसा हो ,

सूरज की तरह हर जिन्दगी में रौशनी बन जाए | 

विशाल दोस्ती का पहचान बनाए,

कवि : सार्थक कुमार , कक्षा : 11th 

अपना घर

बुधवार, 9 मार्च 2022

कविता : " होली का त्यौहार"

" होली का त्यौहार" 

 होली का त्यौहार ही | 

कुछ ऐसा है ,

जिसमे सब के चेहरे खिले होते है | 

और रंगलगाने का तरीका तो देखो ,

पहले अबीर फिर रंग लगाते है | 

होली का त्यौहार ही कुछ ऐसा है ,

जिस में बुरा मानने का त्यौहार नहीं | 

सब लोग मिल जुल कर खेलते है ,

होली का त्यौहार ही कुछ ऐसा है| 

कवि : महेश कुमार , कक्षा : 7th 

अपना घर

 

सोमवार, 7 मार्च 2022

कविता : "कितना याद गार होगा "

"कितना याद गार होगा "

 ये बिताये हुए पल क्लॉस में | 

कितना याद गार होगा ,

छोटी -छोटी शरारतें करते | 

क्लॉस के बीच में खाना खाते ,

तो कभी पीरियड बेकार करता | 

और दोस्तों के संग मौज मस्ती करता ,

ये सब जाने के बाद याद आएगी | 

वे गुजारे हुए एक पल ,

जीवन मैं नया सीखा जाते है | 

ये बिताये हुए पल क्लॉस में ,

कितना याद गार होगा | 

कवि : सार्थक कुमार , कक्षा : 11th 

अपना घर

 

रविवार, 6 मार्च 2022

कविता : " काश मैं पेड़ होता"

" काश मैं पेड़ होता"

 काश मैं पेड़ होता तो | 

अपनी बात सबको बताता ,

जो हो रहा हम पर अत्याचार | 

उन सबका कोई तो हल निकालता ,

काश मैं पेड़ होता तो | 

अपनी महत्व के बारे में बताता ,

और खुशहाल जिंदगी गुजरता | 

हर समय साथ निभाता ,

काश मैं पेड़ होता तो | 

अपनी बात सबको बताता,

कवि : सार्थक कुमार , कक्षा : 11th 

अपना घर

शनिवार, 5 मार्च 2022

कविता : " सूरज की ओर कड़कती किरण "

" सूरज की ओर कड़कती किरण "

 सूरज की ओर कड़कती किरण | 

हर जगह को अनजान बना देती है ,

पेड़ -पौधे को सुखा डालता है | 

जीना बेहाल कर देती है ,

जब उस जगह पर पहला बूंद गिरता है |

एक अनजान जगह से हरियाली में बदल जाता है ,

सूरज की ओ कड़कती किरण | 

हर जगह को अनजान बना देता है ,

मन का मनोबल डाउन कर देता है | 

सूरज की ओ कड़कती किरण,

कवि : अमित कुमार , कक्षा : 7th 

अपना घर 

मंगलवार, 1 मार्च 2022

कविता : "वायु प्रवाह "

"वायु प्रवाह "

 जन्म लेते ही हमसे मिल जाए | 

साथ वो छोड़े मरने पर ,

न देखें वो राज महल को | 

और न जाने निर्धन -घर ,

कभी ममता मयी स्पर्श देती | 

कभी चूमे सबके मन को ,

सब को यह एहसास कराये | 

सुख न केवल है दुनियाँ में ,

कष्ट भी मिलता है तन को |

हिन्दू -मुस्लिम को न जाने सब जाने इंसान ,

उसी के दम से दुनियाँ सारी वरना है श्मशान | 

कवि : राहुल कुमार , कक्षा : 8th 

अपना घर