कविता
बाल सजग
(बच्चों का आकाश .... बच्चों के लिए)
शुक्रवार, 13 मार्च 2026
दिन ढलने को चला नहीं की
मंगलवार, 10 मार्च 2026
ज़िंदगी तो पलभर का है
कविता
कविता: "इंतजार"
रविवार, 8 मार्च 2026
हर गली में हर डगर में
कविता
हर गली में हर डगर में
कहीं किसी राह के कोने में
मिलती नई ज़िंदगी पड़ी यूँ उलझे चौराहों में
जल गयीं क्या सारी कीताबें
या खो गयी किसी शहर में
बिखरे हुए लगते है सारे मदरसे
समुन्द्रों कि गहराई में छुपे लगते है स्कूल सारे
गलियां भी अब रूठ गयी है
बेसहारा को देख कर टूट गयी है
बेज़ुबान है इंसान यहाँ
हारा हुआ है ये जहाँ
कतरा कतरा बस जल उठता है
हश्र ये देखकर जी रो उठता है
कबतक यूँ ही बिखरा रहेगा
ये जहाँ कब तक शांत रहेगा
गलियां कहाँ तक शांत रहेगी
गीली मिटटी में क्या सब गल जायेगा
गलतिया न होते हुए भी उनकी क्या उनका स्कूल छिन जायेगा
क्यों भिखरी हुई है ज़िंदगी यूँ राहों में
क्या खो गयी है किताब कहीं दूर शहरों में
कवि - साहिल
कक्षा -9
(अपना घर )
अब हो गया ठंडी ख़त्म
शुक्रवार, 6 मार्च 2026
शांति
कविता
फसलों घेरे में
उसके आगे थोड़े
थोड़े से पीछे भी
मशीनों की ा रही बेसुर आवाज़
जिससे चली गयी कोसो दूर
मेरे नज़रो में जो शांति थी
गाड़ी थोड़े अलग शोर से
जोर-जोर खींचे जा रही मेरे कान
पेंच हथोड़ी चीनी करते तब तब आवाज़
मेरे दाहिने पटीने और ठहरी जो शांति थी
पीछे लड़ते कुत्तों के झुण्ड
है बड़ी बेरहम
जिसके भोकने के मारे
मर गयी शन्ति
जो मौजूद थी पीठ के पीछे
गुरुवार, 5 मार्च 2026
होली का ये महीना है रंगो का का त्यौहार आया
झूम - झूम कर खेलेंगे खूब गुलाल लगाकर
मजा तो आएगा होली में सभी को रंग लागने से
पर वो दिन क्या ही था जब जब हम नहा भी लिया करते थे
गुजिया तो खाते ही है सबको खिलते भी है बाटते भी है
मन को खुश कर देती है ये तरह तरह के रंग को दिखा कर
महीना का अपना ही अंदाज है रंगो का राज है
"पहले देखा था माँ ने वो दिन "
पहले देखा था माँ ने वो दिन
जब दुनिया लगती थी पूरी हरी भरी
जब से बढ गए लोग
तब से लगी दुनिया ख़तम पेडो से पूरी
पहले देखा था मेने वो दिन
जब दुनिया पूरी लगती हरी भरी
अब लोग बनाते पेड़ों को काटकर लकड़ी
काट काटकर लकड़ी
काट काटकर पेड़ों से लकड़ी ख़तम होने लगे पेड़ ही पुरे
पहले देखा था माँ ने वो दिन
जब दुनिया लगती पूरी हरी भरी
कक्षा : 7