मंगलवार, 23 जून 2026

कविता: "बहस"

"बहस"
क्या अंत भी है ऐसी बात चीज का । 
सही जो लगता हो एक को । । 
तो दूसरे को गलत । 
क्या लगता है । । 
ऐसी बातो में । 
छिपा है कैसी रहस्य । । 
घंटो -घंटो रहते अड़े । 
करते रहते जिसपे बहस । । 
 निकलता है क्या सही समाधान। 
टाले गए सवालों का । । 
जिस बात चीत में । 
पूरी बात भी होती कहाँ?। । 
कर देते जिस तहस - नहस । 
क्या यही अधूरी बाते । । 
इंसानो में है एक बहस। । 
कवि
कवि: पिंटू कुमार, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"


 

बुधवार, 17 जून 2026

गाँव की गलियों से निकलकर

कविता 

गाँव की गलियों से निकलकर 
शहरों की गलियों में 
भटक क्यों रहा हूँ इन अनजान गलियों में 
गलियारे ही बचे है क्या 
क्यों खो गए खेत कहाँ 
कहाँ खो गयी वो बूढ़ी नजरे 
जो रात रात भर जागकर हाल पूछती थी 
सब बदल सा गया है 
है लगता है की गाँव गलियों से निकलकर 
मई खो गया हूँ 
या फिर मैं गाओ को  भूल सा गया हूँ 
नाम - साहिल कुमार 
कक्षा -10 


गुरुवार, 11 जून 2026

भूल जाते है कदमो का आस

 कविता 

भूल जाते है कदमो का आस 
जो मेहनत से होता है पास  
वे करते है रोज़ प्रयास 
आकर फिर भी न जाने क्यों 
खुद से  दूर चला जाता है  
ठुकरा देता है ये समय 
भूल जाते है कदमो का आस 
जो मेहनत से होता है पास 
वे करते है रोज़ प्रयास 
नाम - रवि 

(अपना घर )

मंगलवार, 9 जून 2026

हर मौसम का अपना अंदाज है

 कविता 

हर मौसम का अपना अंदाज है 
इस अंदाज में खुद की घुली हुई अपनी पहचान है 
गर्मी हो या सर्दी या हो वसंत 
 सबकी अपनी अदा है 
हर मौसम खुद के संग घुली हुई तशरीफ़ लाता है 
सबका अपना पसंदीदा मौसम  होता है 
हर मौसम का अपना अंदाज है 
नाम - नरेंद्र     
( अपना घर )

मंगलवार, 2 जून 2026

अकेला ही चलना है रास्ते पर

कविता 

 अकेला ही चलना है रास्ते पर 
तय खुद करना है 
कैसे जीना है इस बेमतलबी दुनिया मे 
हर अवसर खास होगा पर 
 खुद तय करना है 
कबतक लड़ना है यहाँ पर 
हर लड़ाई अपनी न हो फिर भी 
लड़ना है लोगों के लिए
इन रास्तो में मुश्किलें यूँ खड़ी होगी 
जैसे कोई नामुराद पत्थर 
राह का पत्थर हटाना है 
अकेला ही चलना है रस्ते पर 
 नाम - साहिल 
कक्षा -10 


शनिवार, 30 मई 2026

दूर कहीं गाव के कोने में

 कविता 

दूर कहीं गाव के कोने में 
अधूरा सपना लिये जी रहा है एक घर 
जो अँधेरे में रहकर शायद खोज रहा है 
उजाले का पल 
कच्ची चौखट पे पड़ी दरारों में 
भीतर से ही खुद उनसे पूुँछता है 
की खो न जाये इस घर का वज़ूद इस अंधियारे में 
जो इतना शांत होकर जीता है 
क्या तबाह न हो जाये इस समाज के धमकाने से 
सूख रही है इसकी दीवारे  
पूछ रही है चटकते हुए खपरैलों से 
 कबतलक इनको यूँ ही जीना है 
कितना और ज़माने से लड़ना है 
हश्र लिए कहाँ जाये ये शहरों में 
 कहीं खो न जाये अंधियारे में 

 

नाम- साहिल 

कक्षा-10 

ये मौसम है कितना अच्छा

कविता 

ये मौसम है कितना अच्छा 
कितना है ये सुहाना है ये मौसम 
अश्मा में में पछि इतराते है 
पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहाती है 
उगता हुआ सूरज को  देखकर 
चिड़िया चहचाने लगती है 
और फूल झूम उठते है 
कितना सुहाना है इ मौसम 
ये मौसम है कितना सुहाना
नाम - अमरबाबू 
कक्षा- 8  

गुरुवार, 21 मई 2026

गर्मी से क्या हो जाता है

 कविता 

गर्मी से क्या हो जाता है 
जो पंखा भी काम सही से  नहीं करता 
और गर्मी में पानी भी नहीं बरसता 
ख़त्म  हुए पेडों की वजह  ये बढ़ती गर्मी 
आगे जाकर क्या हो जाये 
ये तो किसी को नहीं पता है 
इसलिए पेड़ों को बचाओ
और इस धरती में जीने के लिए 
पानी भी बचाओ 
इनको बर्बाद मत करो इस्तेमाल उतना ही करो 
जितने में इंसान अपनी जरूरते पूरी कर ले 
गर्मी 
गर्मी से क्या हो जाता है 
जो पंखा भी काम सही से  नहीं करता
नाम- गया कुमार 
 कक्षा-7 
(अपना घर )

बुधवार, 20 मई 2026

क्या है ये ?

 कविता 

क्या है ये ?
मन नहीं कहीं 
क्या है 
करना नहीं कुछ ?
भांग हो गया सब 
क्यों इतना तू तंग हो गया ?
बेताब है बे 
गुस्सा है तू ?
क्या कर लेगा तू ?
हैट बे चोंगु ?
चल चल चलता बन
तू ही वो कुत्ता है ये सब 
 मुंह मत खोल 
फिर तूने बका 
ओके बाये चल बोल ना 
क्या बोलेगा ?
ज्यादा नहीं ?
 ठीक है न ?
गीदड़ है 
 गीदड़ ही रह 
अच्छा  होगा 
है या न ?
फिर से तेरा ओवर हो रहा है 
बात अभी अभी बताया 
समझा बैल तू क्यों नहीं ?
ऐसे क्या घूरता है
 क्या है ये ?
  नाम - पिंटू कुमार 
कक्षा -11 


सोमवार, 18 मई 2026

तबाही मचा रही है ये गर्मी

 कविता 

तबाही मचा रही है ये गर्मी 
चल रही हैक केवल गर्मी की मर्जी 
सब सोच रहे होंगे की 
की कब आएगा ये सर्दी 
क्योंकि तबाही मचा रहा है ये गर्मी 
क्योंकि फेल हो गया है पंखा और कूलर 
धुप का चल रहा है ये गर्मी 
और फेला दिया है ये गर्मी 
बड्स इंतज़ार है की कब आएगा सर्दी 
क्योंकि तबाही मचा रहा है ये गर्मी 
नाम- नवलेश 
कक्षा -12
(अपना घर ) 


शनिवार, 16 मई 2026

चल अपनी मंजिल को ढूंढ

 कविता 

चल अपनी मंजिल को ढूंढ 
खोई हुई अपनी किस्मत को ढूंढ 
कोई साथ नहीं होगा फिर भी 
पीछे छूटे वक्त को ढूंढ 
चल अपनी मंजिल को ढूंढ
पानी -पानी हो जाएगा जमाना 
ठहरा हुआ वक्त भी बढ़ेगा जहाँ 
तेरी ऊंचाइयों को देख ये आसमान भी झुकेगा यहां 
कबतक यूँ खड़ा पछतायेगा 
कितने आंसू बहायेगा 
गमो का ये साया भी उठेगा देखना 
एक दिन मंजिल तुम्हे भी मिलेगी देखना 
जो हुआ उसे छोड़ो अब 
जो बीत गया उसे भूलो अब 
बेहतरीन पलों को ढूंढ 
चल अपनी मंज़िल को ढूंढ 
नाम-साहिल कुमार 
कक्षा -10 
(अपना घर )