कविता
बहुत अनजान है ये आसमां
दिन में लोगों को अपनी रौशनी से है दिया जला
न जाने क्यों बेखबर है ये आसमां
न दे दिन में चलने हवा
न दे रात में थोड़ी सी भी राहत
क्यों गर्मी जला देती है लोगों को
बहुत अनजान है ये आसमान
न जीने का ठिकाना
न राहत देने को है हवा
अब बस चाहत यही है गर्मी न दुबारा वापस आना
अपने संग न इतनी गर्मी लाना
बहुत अनजान है ये आसमान
दिन में लोगों को अपनी रौशनी से है दिया जला
न जाने क्यों बेखबर है ये आसमां
न दे दिन में चलने हवा
न दे रात में थोड़ी सी भी राहत
क्यों गर्मी जला देती है लोगों को
बहुत अनजान है ये आसमान
न जीने का ठिकाना
न राहत देने को है हवा
अब बस चाहत यही है गर्मी न दुबारा वापस आना
अपने संग न इतनी गर्मी लाना
बहुत अनजान है ये आसमान
नाम- अभिषेक
कक्षा- 8