शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

कविता: "लक्ष्य"

"लक्ष्य" 
इरादे छोटे है हमारे।  
छोटे - छोटे डेग को जब हम बढ़ाते है ।। 
हम कुल जैसे भरते जान है । 
भले ही नाजुक सोच हमारी है।।  
लक्ष्य को हमारे गले लगाने का विचार गहरे है । 
पहुँचेंगे मुकाम पर अपने ।। 
यह हमने भी किया है तय । 
रहना है हरहाल में पाकर ।। 
इस विषय पर हमें विजय। 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

Poem: "A Step out from the World"

"A Step out from the World"
 Don't walk with crowd,
make a path which fallow others,
do whatever you deserve, 
everything is possible,
just make a step out from the world .
trouble come always in year way,
problem never move side away,
losing hope doesn't matter,
fall of yours's don't matter,
but it matters you wasn't try.
No, one is perfect, 
everyone has some defects,
don't become like others,
be a role for others.
to gain something, have to lose something,
which always remembers you,
who you are?
never forget our past,
to improve the past, 
make a step out from the world.
Poet: Allies Group, 
Asha Trust, Kanpur Kendra, "Apna Ghar"

कविता: "एग्जाम"

"एग्जाम" 
आ गया वो दिन जिसका महीनों से इंतजार था। 
दिन और रात को अब एक करना होगा ।। 
बंद कमरे में अकेले पढ़ना होगा । 
बहुत हो गए मजे अब हमें अब पढ़ना होगा।।  
१ - २ घंटा ही सही पर मन लगाकर पढ़ना है । 
कोई  काम नहीं करना है ।। 
किताबी कीड़ा अब बनना है । 
खेलना तो बंद हो ही गया है ।। 
अब तो उलटी गिनती भी गिनना सुरु हो गया है । 
इंतजार की घड़ी आ चली है ।। 
 आज ही हमारा अंग्रेजी का एग्जाम है । 
टारगेट तो 75 + का है । 
जिसका सदियों से थे इंतजार अब वो दिन आ गया है ।। 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"


बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

कविता: "परीक्षा"

"परीक्षा"
 समय के साथ जिंदगी चल रही है। 
अब सूरज कि तरह यह ढल रही है ।।
दिन का कोई अब अता - पता नहीं ।
फिर भी ये दिन आगे बढ़ने लगी है ।।
बस समय के साथ जिंदगी चल रही है ।
परीक्षा के दिन है आने वाले ।।
वही है हमारा मेहनत का राज बताने वाले ।
कौन किस हालत में रहा ।।
यही है सबको दिखने वाले ।
समय पर समय दिन घट रहा है ।।
वो पास आता जा रहा है ।
डरने वाली बात है उस दिन ।।
पर वो कुछ खास लाए रहा है ।
समय के साथ साथ वो पास आ रहा है ।।
और हमारे लिए कुछ खास ला रहा है ।
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर" 

कविता: "कठिन परिश्रम"

"कठिन परिश्रम"
पड़ने लगे हाथो में छाले इनके। 
 हाथो की रेखाए भी मिटने लगे ।।
काम इतना करते है, की अब काम भी इनसे डरने लगे है ।
पसीना से नहा लेते है यह, न ही कूलर नसीब हुए ।।
गर्मी बरसात या हो सर्दी, अब ये भी सब भी दलने लगे ।
सूरज की धुप इतना सहते है की सूरज भी इनसे डरने लगे है ।।
फसल तो बो दिए अब इनसे, पर डर है कही ख़राब न हो जाए ।
सुबह से लेकर अब शाम तक निगरानी करने लगे है ।।
फसल कही खराब न हो जाये, अब ये जगने लगे है ।
बीसो साल लगा के अब पहाड़ भी काटने लगे ।।
हिम्मत तो बहुत है इसमें अब पर्वत भी इनसे डरने लगे। 
मजदूर है हम, मजदूरी में हम मरने लगे है ।।
कवि: सुल्तान, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

कविता: "माँ तेरी याद आज आ रही है"

"माँ तेरी याद आज आ रही है"
 माँ तेरी याद आज आ रही है। 
ना जाने क्यों आँखो से आसु आने लगे है ।। 
तेरी ममता याद आ रही है । 
    वो बचपन भी याद आ रहा है ।। 
जब मैं बालू में खेला करता था और आप डाटती थी।  
जब तेरे हाथों के बना खाना खाता था।। 
तेरे बनाए पकवान दोस्तों के बाट कर खाया  करता था।  
होली के दिन भर पेट खता था गुजिया और पकोड़ी ।। 
दिन भर तो घूमना होता था  । 
बिन बताए बाहार भाग अक्सर जाय करता था ।। 
मार तो हमेश तुमसे कहता था । 
पर मैं नहीं मानता था ।। 
बिन बताए बाहार भाग अक्सर जाय करता था। 
तुमसे आज बात होगी न, जाने मेरी माँ कैसी होगी  ।। 
तुझसे न जाने कब मिलूँगा । 
 माँ तेरी याद आज आ रही है। 
ना जाने क्यों आँखो से आसु आने लगे है ।। 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

कविता: "बच्चे काम पर जा रहे है"

"बच्चे काम पर जा रहे है" 
बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये। 
वही मैले कपड़े पहने रहते है ।। 
काम करने पर कुछ खाने को दे देते है । 
दिन भर मेहनत करा के शाम को छुटी कर देते है ।। 
एक बार उनके हाथो को देखो तो, उनकी लकीरे शायद ही हो,
उनसे पूछो तो उनके दिल में किस चीज की चाह है ।। 
कभी स्कूल के लिए पूछो । 
शायद एक उगता सूरज बन सकता हो।। 
अंधेरो मार भगा सकता हो । 
एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।  
ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।  
 बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।। 
 कवि: नरेंद्र कुमार, कक्षा: 3rd,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

कविता: " क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?"

 " क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?"
क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?
 बच्चे सही सो नहीं पाते है। 
हम जैसे बच्चे को अभी सोने की जरूरत है ।।
आपके आने से उठ जाते है हम ।
कुछ लोग काम पर भी चले जाते है ।।
जरा देखो तो सूरज जी चँद दीदी कितनी दिन बाद है ।
12 बजे से पहले आ नहीं पाती है।। 
और आप 7 बजे से पहले आ जाते है ।
आते हो पर मत जाया करो ।
लोगो का काम रुक जाता है आपके जाने से ।।
 क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?
कवि: रौशन कुमार, कक्षा: 3rd,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र."अपना घर" 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

कविता: "उदास बैठा मेरा यार"

"उदास बैठा मेरा यार"
 न जाने मेरा आज मुझसे क्यों उदास अलग बैठा है। 
आज कल मेरा दोस्त बात भी करना बंद कर दिया है।। 
बात करो तो आँखे बचाता है पता नहीं वो क्या चाहता है । 
उसका हर उदासी मेरी है उसका बहता हर एक आँसू मेरे है ।। 
पूछने पर इंकार करता है पता नहीं वो क्या चाहता है । 
कही न कही मेरे लिए तो जगह होगा उसके दिल में ।। 
उसे भी बुरा लगता होगा जब मैं उदास हो जाउ। 
उसके उदास हो जाने ऐसा लगता है जैसा । । 
आज सूरज आसमा में न हो ।
बीते समय है याद आते, ये सोच कर दिल मेरा रोता है । । 
पर आँखों से आँसू निकल न आ पाते नहीं । 
आखिर क्या चाहता है वो।। 
गाँव की गलियों में क्रिकेट अक्सर खेला करते थे । 
खेत खलियानो में घूमा करते थे एक दूसरे को चिढ़ाया करते थे । । 
हसी खुशी नहर में नहाया करते थे घर पे हो तो । 
माँ एक ही प्लेट खाना परोस देती थी दोनों भाई की तरह खा लिया करते थे । । 
बीते समय है याद आते, ये सोच कर दिल मेरा रोता है ।
 न जाने मेरा आज मुझसे क्यों उदास अलग बैठा है। । 
आज कल मेरा दोस्त बात भी करना बंद कर दिया है।। 
कवि: नीरज II, कक्षा: 5th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

कविता: "काले बादल"

"काले बादल"
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
गरज रहे है बादल आसमा में 
बिजली भी चमक रही है जोर - जोर से 
छाता का इस्तेमाल होने लगे एक तरफ से से 
बरसा रहे है अब पानी की बुँदे 
हर गली हर गाँव नया दिखने लगा अब 
नाच रहे है अब मोर कर के खूब सोर 
सब कुछ धूल गया हो मानो 
आँखे खुल गई हो मनो 
बारिश हो रही है खूब 
आते जा रहे है काले बादल 
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"




सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

कविता: "क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है"

"क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है
लिख दूँ तो क्या समझ लोगे। 
बोलूँ अगर तो क्या सुन लोगे । 
बनाए उनके रास्ते से तो गुजरेंगे । 
पर मेहनत की अहमियत नहीं समझेंगे । 
हर मज़दूर खुद से यह सवाल पूछता है । 
क्यों खुद अमीर - गरीब में फर्क रखता है । 
इमारते ईटो और पत्थरो से सजाता है । 
हर खतरा सहकर एक महल खड़ा करता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
टूटती उम्मीद और बिखरता साहस । 
ये सारी खामियाँ लेकर चलता है । 
गुजरा कल और आता भविष्य, भूल जाता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
उनकी बनाए हुए माकन पर हम रहते है । 
आते - जाते रास्ते में एक नहीं हजार बार मिलते है । 
पर कोई उनका इज्ज़त नहीं करना जनता है । 
न जाने क्यों इमारते ईटो और पत्थरो से एक मज़दूर ही क्यों सजता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"