कविता
इस कड़कती धुप में
चिलचीलाती धुप में
अपनी चलती अपने साथ में
सूरज ने उसका नाम लू रखा
गर्म हवाएं दिवार चीर कर अंदर आ रही है
दिन पर दिन टेम्प्रेचर बड़ा रही है
कभी छांव तो कभी घाम है
न जाने सूरज हमसे क्या चाहती है
पेड़ पौधे अब सुख रहे है
पारा अब बढ़ रहा है
धरती को तालाब कर है
रखने को अब ज़मी बचा है
ना जाने सूरज क्या चाहता है
ये कविता हमारे कवी निरु द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 2018 में आये थे शिवा इस समय कक्षा 10 में पढ़ते है | अपना घर में 8 साल से रह रहे है | ये बड़े होनहार छात्र है यहाँ के /
चिलचीलाती धुप में
अपनी चलती अपने साथ में
सूरज ने उसका नाम लू रखा
गर्म हवाएं दिवार चीर कर अंदर आ रही है
दिन पर दिन टेम्प्रेचर बड़ा रही है
कभी छांव तो कभी घाम है
न जाने सूरज हमसे क्या चाहती है
पेड़ पौधे अब सुख रहे है
पारा अब बढ़ रहा है
धरती को तालाब कर है
रखने को अब ज़मी बचा है
ना जाने सूरज क्या चाहता है
ये कविता हमारे कवी निरु द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 2018 में आये थे शिवा इस समय कक्षा 10 में पढ़ते है | अपना घर में 8 साल से रह रहे है | ये बड़े होनहार छात्र है यहाँ के /
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