मंगलवार, 25 अगस्त 2026

इस कड़कती धुप में

 कविता 

इस कड़कती धुप में 
चिलचीलाती धुप में 
अपनी  चलती अपने साथ में 
सूरज ने उसका नाम लू रखा 
गर्म हवाएं दिवार चीर कर अंदर आ रही है 
दिन पर दिन टेम्प्रेचर बड़ा रही है 
कभी छांव तो कभी घाम  है 
न जाने सूरज हमसे क्या चाहती है 
पेड़ पौधे अब सुख रहे है 
पारा अब बढ़ रहा है 
धरती को तालाब कर  है 
रखने  को अब ज़मी  बचा है 
 ना जाने सूरज क्या चाहता है 
ये कविता हमारे कवी निरु  द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 2018    में आये  थे शिवा  इस समय कक्षा 10    में पढ़ते है | अपना घर में 8    साल से रह रहे है | ये बड़े होनहार छात्र है यहाँ के /   

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