कविता
काली काली रात है
न जुगनू है न टारे है
आसमान का न जाने क्यों मुखड़ा
यूँ मुरझाएं
सब तरफ सन्नाटा है और दर्द से ढके है
आशा का उम्मीद मनो बस ख़त्म है
मन में चाहत बस कब सबेरा होगा
सूरज के किरणे फिर आस्मां को
रंग देगा मनो पर जो रातों का
ख्याल था उसे मिटा कर फिर
से न्य उत्साह और अर्जी देगा
न जुगनू है न टारे है
आसमान का न जाने क्यों मुखड़ा
यूँ मुरझाएं
सब तरफ सन्नाटा है और दर्द से ढके है
आशा का उम्मीद मनो बस ख़त्म है
मन में चाहत बस कब सबेरा होगा
सूरज के किरणे फिर आस्मां को
रंग देगा मनो पर जो रातों का
ख्याल था उसे मिटा कर फिर
से न्य उत्साह और अर्जी देगा
नाम -निरंजन
कक्षा- 10
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