शुक्रवार, 13 मार्च 2026

कविता "दिन ढलने को चला नहीं की"

"दिन ढलने  को चला नहीं की" 
दिन ढलने  को चला नहीं की 
वो हमारे पास आ गए 
बातें करके  पूरा समय निकालकर 
 हमें हंसाकर चले गए 
 वो क्या लोग थे जो 
रोज गली से गुजर कर हमारे साथ 
वक्त ज़या करते थे 
दिन भी वो क्या थे जो रोज़ 
 उस पल की याद दिलाते थे 
उस गली में हर रोज जाकर 
अपना हम अनमोल वक्त गंवाकर 
आ जाया करते थे 
गले उसे लगाकर उसके साथ कुछ वक्त बिताकर 
वापस आ जाया करते थे 
कवि: मंगल कुमार, कक्षा: 9th  
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर "
 

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