बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

कविता: "उदास बैठा मेरा यार"

"उदास बैठा मेरा यार"
 न जाने मेरा आज मुझसे क्यों उदास अलग बैठा है। 
आज कल मेरा दोस्त बात भी करना बंद कर दिया है।। 
बात करो तो आँखे बचाता है पता नहीं वो क्या चाहता है । 
उसका हर उदासी मेरी है उसका बहता हर एक आँसू मेरे है ।। 
पूछने पर इंकार करता है पता नहीं वो क्या चाहता है । 
कही न कही मेरे लिए तो जगह होगा उसके दिल में ।। 
उसे भी बुरा लगता होगा जब मैं उदास हो जाउ। 
उसके उदास हो जाने ऐसा लगता है जैसा । । 
आज सूरज आसमा में न हो ।
बीते समय है याद आते, ये सोच कर दिल मेरा रोता है । । 
पर आँखों से आँसू निकल न आ पाते नहीं । 
आखिर क्या चाहता है वो।। 
गाँव की गलियों में क्रिकेट अक्सर खेला करते थे । 
खेत खलियानो में घूमा करते थे एक दूसरे को चिढ़ाया करते थे । । 
हसी खुशी नहर में नहाया करते थे घर पे हो तो । 
माँ एक ही प्लेट खाना परोस देती थी दोनों भाई की तरह खा लिया करते थे । । 
बीते समय है याद आते, ये सोच कर दिल मेरा रोता है ।
 न जाने मेरा आज मुझसे क्यों उदास अलग बैठा है। । 
आज कल मेरा दोस्त बात भी करना बंद कर दिया है।। 
कवि: नीरज II, कक्षा: 5th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

कविता: "काले बादल"

"काले बादल"
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
गरज रहे है बादल आसमा में 
बिजली भी चमक रही है जोर - जोर से 
छाता का इस्तेमाल होने लगे एक तरफ से से 
बरसा रहे है अब पानी की बुँदे 
हर गली हर गाँव नया दिखने लगा अब 
नाच रहे है अब मोर कर के खूब सोर 
सब कुछ धूल गया हो मानो 
आँखे खुल गई हो मनो 
बारिश हो रही है खूब 
आते जा रहे है काले बादल 
आने लगे है अब काले बादल।
आसमा अब काला हो चूका है 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"




सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

कविता: "क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है"

"क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है
लिख दूँ तो क्या समझ लोगे। 
बोलूँ अगर तो क्या सुन लोगे । 
बनाए उनके रास्ते से तो गुजरेंगे । 
पर मेहनत की अहमियत नहीं समझेंगे । 
हर मज़दूर खुद से यह सवाल पूछता है । 
क्यों खुद अमीर - गरीब में फर्क रखता है । 
इमारते ईटो और पत्थरो से सजाता है । 
हर खतरा सहकर एक महल खड़ा करता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
टूटती उम्मीद और बिखरता साहस । 
ये सारी खामियाँ लेकर चलता है । 
गुजरा कल और आता भविष्य, भूल जाता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
उनकी बनाए हुए माकन पर हम रहते है । 
आते - जाते रास्ते में एक नहीं हजार बार मिलते है । 
पर कोई उनका इज्ज़त नहीं करना जनता है । 
न जाने क्यों इमारते ईटो और पत्थरो से एक मज़दूर ही क्यों सजता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है । 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

कविता: "अँधेरी रात हो रही है"

"अँधेरी रात हो रही है"
अँधेरी रात हो रही है।  
न जुगनू है न तारे है आसमा में । 
ऐसा क्यों लगता है की चाँद का मुखड़ा नराज़ सा है ?
 सब तरफ सन्नाटा और दर्द से भरे हुए है । 
आशा की उम्मीद मानो जैसे बस कम हो। 
मन चाहत की कब सवेरा हो । 
सूरज की किरणे एक बार फिर आसमा का हो । 
आते रहते है इन्सेक्ट की आवाजे । 
बड़े ही खतरनाक लगता है सुनने में । 
 दर का माहौल बना देता है रातो में । 
 अँधेरी रात हो रही है । 
न जुगनू है न तारे है । 
 दूर - दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता है । 
काली परछाई का राज चलता हो 
हर रात बस उनका हो ।  
कब एक बार फिर से सूरज आसमा में होगा  
आशा की उम्मीद अपना होगा।। 
चमकता सूरज हमारा हो ।  
कवि: निरंजन कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"


शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

कविता: "महात्मा गाँधी"

"महात्मा गाँधी"
हमें एक आज़ाद परिन्दा कह कर चले गए है। 
हर साल हमें याद दिलाता है 
सच बोलना भी सिखाया है 
हिन्सा राह पर चलना सिखाया है 
एक लाठी की दम पर ब्रिटिश को मार भगाया 
खून तो सबने बहाया था 
एक आज़ाद भारत को देखने के लिए 
आज़ाद परिन्दे के जैसा अब खुले आसमा में ये उड़ता है 
हर जगह अपना ही नाम लेता है 
हम आज़ाद है ये हर बार याद दिलाता 
फिर चाहे वो 15 August  हो या  26 January 
हर बार तो उन सब  को याद करते है 
हर साल हमें याद दिलाता है 
सच बोलना भी सिखाया है 
 प्यार से बापू उन्हें कहते थे 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

कविता: "समय आ गया है"

"समय आ गया है"
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा। 
मन को संभालना है 
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा 
अब पढ़ाई में मन लगाना है 
हर परेशनी में याद करना है 
दिन - रात अब लड़ना है 
आसमा और जमी एक करना है 
हर परिस्थितयों में अब पढ़ना है 
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा 
युद्ध के समान लगता है ये 
रातो को जगाता है ये 
पढ़ाई में मन लगाना है अब 
खेल - कूद बंद पड़ जाएंगे 
90% के हिसाब से तयारी हो रही है  
 कही नींद न आ जाए , पेपर में हम फैल न हो जाए 
इस दर की वजह से हमने तो अभी से ही पढ़ना शुरू कर दिए है 
शुरू होने वाली है वार्षिक परीक्षा। 
मन को संभालना है 
कवि: नीरज II, कक्षा: 5th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

कविता: "लड़को की जिम्मेदारी"

"लड़को की जिम्मेदारी"
घर में बड़े हो या छोटे। 
वे अपनी जिम्मेदारी समझते । 
नकारते नहीं कभी न कभी पीछे हटते है । 
जितना हम समझते है । 
लड़के की जिंदगी आसान नहीं होती । 
अपने ही आँसू पी जाते है । 
रोने पर भी वो रो नहीं पाते है। 
अंदर ही अंदर गम सह जाते है । 
ख्वाइस तो है उनकी भी । 
पर कभी वो बता नहीं पाते । 
जितना हम समझते है । 
लड़को की जिंदगी आसान नहीं होती । 
fail हो जाए तो उन्हें भी दुख होता है । 
कही depression में न चला जाए इसलिए खुश रहता है। 
आँसू तो गिरते है उनके भी। 
पर कभी अंदर से टूटते नहीं है।  
 जितना हम समझते है । 
लड़को जिंदगी आसान नहीं होती।। .......
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपूर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "बड़ा भाई"

"बड़ा भाई"
पिता का प्यार देता है वो। 
सारी परेशनियाँ झेलता है वो।। 
घर का बड़ा है। 
इसलिए सारी जिम्मेदारियाँ सम्भालता है वो। 
कभी - कभी तो अपनी खुशियाँ कुबीन कर देता है । 
 छोटे भाई के लिए तो ,
बड़ा भाई एक पिता भी बन जाता है । 
बुझते दीपक का सहारा बनता है । 
खुशियाँ जहाँन की बटोरकर देता है वो । 
बड़ा भाई होकर, एक पिता का साया देता है वो । 
अक्सर लड़ जाता हूँ मैं । 
बच्चा समझ रखा है कहकर,
रुठ जाता हूँ मैं । 
अपना फर्ज वो निभाता है । 
मनाने खुद चला आता है । 
बड़ा भाई ही माँ - पिता का प्यार साथ देता है वो । 
मेरी नासमझी को माफ करता है । 
हर डॉट पीछे प्यार छुपा देता है । 
बड़ा भाई ही माँ - बाप का प्यार देता है । 
कवि:  साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

रविवार, 25 जनवरी 2026

कविता: "मेरी भी जिम्मेदारी है"

"मेरी भी जिम्मेदारी है"
मेरी भी जीवन कि एक कहानी है। 
उनमे से एक भाग जिम्मेदारी है।
पढ़ाई करना या लापवाही करना,
ये मुझे खुद निभानी है 
ये उम्र में पढ़कर ही कुछ कर पाएंगे,
 ये बात मुझे खुद को बतानी है 
मेरी भी जीवन कि कहानी है 
 उनमे से एक भाग जिम्मेदारी है  
समस्या आएगी पर खुद को समझानी है 
हार तो नहीं मानना है 
ये जिम्मेदारी अपने दिमाग बैठानी है 
मेरी  जीवन कि एक कहानी है 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

कविता: "क्रिकेट का दिन"

"क्रिकेट का दिन"
चलेंगे क्रिकेट खेलने 
कोशिश करंगे जीतने  की 
हार तो हमें मंजूर नहीं है 
जी - जान लगा देंगे इस खेल में 
हम्हारा target होगा 100 पार 
नहीं तो हम जाएंगे हार 
जल्दी - जल्दी सबको out है करना 
आज है हमें क्रिकेट खेलना 
 आज मैं पहले नंबर पर जाऊंगा 
 6 छके मारे बिना न आऊंगा 
आज है क्रिकेट का दिन 
खेले बिना नहीं लगता है मेरा मन 
कवि: गया कुमार, कक्षा: 5th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

कविता: "बरसात की राह "

"बरसात की राह " 
सोच रहा था क्या करू मैं। 
दिनभर यही आस में बैठा हूँ।।
 कब होगी बरसात इस धरती पर 
पियासे है पेड़ - पौधे, सुखे पड़े है खेत - खलियान।।
महक उठेगी ये धरती 
न जाने कब छाएंगे बादल आसमान में ।।
एक बार फिर चाँद चमकेगा अँधेरी रातो में 
न जाने कब  दिखेगी सब की चेहरे पर खुशी ।।
सोच रहा था क्या करू मैं 
दिनभर यही आस में बैठा 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

 

बुधवार, 21 जनवरी 2026

कविता: "अच्छी पलो कि यादो में"

"अच्छी पलो कि यादो में" 
अच्छी पलो कि यादो में। 
कभी हम भी खोया करते थे 
हार तो हम भी जाते थे अक्सर 
पर हम कभी रोया नहीं करते थे 
उस समय खाना, खेलना और मुस्कुराना था 
 कुछ नहीं था, बस पढ़ाई में मन लगाना था 
अच्छी पलो की यादो में 
कभी हम भी खोया करते थे 
रोया तो नहीं कभी 
पर एक न एक बार हम भी हस लिया करते थे  
अच्छी पलो कि यादो में 
कभी छाव आता, तो कभी धुप 
कभी हवा चलती, तो कभी लू 
पर हम हमेशा आगे बड़ते  रहे 
कवि: गोविंदा कुमार,  कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर" 

सोमवार, 19 जनवरी 2026

कविता: "पढ़ना हुआ मुश्किल"

"पढ़ना हुआ मुश्किल" 
अब आसान नहीं है पढ़ना लिखना। 
न जाने क्या - क्या नई चीजे आ गई है ।। 
जो सोच के परे है । 
अब एक छोटी सी चीज को भी बिस्तार से बताया है ।। 
 समझना मुशिकल है । 
अब तो नई  - नई  मशीने आ गई ।। 
 जिसका एक एक अंग भी पढ़ना है। 
 अब तो खेतो में  science पाया जा रहा है ।। 
जो जल्द  से जल्द फसल उगा रहा है । 
अब आसान नहीं है पड़ना लिखना । 
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "31 दिसम्बर 2025 की दिन"

"31 दिसम्बर 2025 की दिन"
हर साल आता है नए किस्से लेकर। 
पुराना साल गुज़र जाता है उम्मीदे देकर । 
रोती रह जाती है ये गलियाँ । 
गुजरती शाम और चाँद देकर । 
क्या - क्या  किस्से छोड़ जाता है गुजरता साल । 
सारी खामोशी तोड़ देता है एकबार । 
जिक्र नहीं करते है जिसका हम कभी । 
एसी कुछ कहानियाँ भी छोड़ जाता है साल । 
आती हर खुशी वजह होता है साल । 
गुजरती जनवरी को अलविदा कहकर । 
आते दिसम्बर का इन्तजार होता है । 
अधूरे किस्से को पूरा करने के लिए । 
हर बार आता है नया साल । 
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर" 

रविवार, 18 जनवरी 2026

कविता : "बीते हुए कल"

"बीते हुए कल"
 मुझे याद आते है वो पल। 
जो हमने बिताए थे कल ।। 
सभी के साथ हस कर खिल - खिलाए थे।  
उसी में एक दूसरे को चिढ़ाए थे ।। 
पर अब उसका कोई भी नहीं है हल । 
मुझे याद आते है वो पल ।। 
जो हमने बिताए थे कल । 
रोजाना आग के पास जाना था।  
आग तापते - तापते एक दूसरे की मौज भी ले लिया करते थे । 
हसी मजाक में ही सही पर बाते कर लिया करते थे।   
हसी दिलाना तो मेरा काम था,
कुछ चीजों के लिए फर्जी में मैं यु ही बदनाम था।  
मुझे याद आते है वो पल ।। 
जो हमने बिताए थे कल । 
कवि : गोविंदा कुमार, कक्षा :9th 
आशा ट्रस्ट कानपुर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "मैं भी जीना चाहता था"

"मैं भी जीना चाहता था"
मैं भी किसी जवाने में खुश रहा करता था। 
न जाने किस ओर से हवाए चली ।। 
मेरी हर  खुशियाँ ले गई
मेरे इस मुस्कुराते चेहरे को उदासी का नाम दे गया 
अब मैं तरसने लगा मुस्कुराने को 
हर एक पल याद आता है वो पल जीने को 
मैं भी जीना चाहता था इस बदलते नया साल में 
पर किस्मत ने भी क्या खेल खेला 
सब कुछ देकर भी सब कुछ ले लिया 
मैं भी किसी जवाने में खुश रहा करता था 
कवि: निरु कुमार, कक्षा:9th,
आशा ट्रस्ट, कानपूर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "खिलते फसले खेत में"

"खिलते फसले खेत में"
 कितना रंगीन है ये खेत - खलियान। 
जिसमे चमक रहे है फूल फसलों की । 
कुछ पीले तो कुछ हरे भी नजर आ रहे है । 
कुछ बड़े तो कुछ छोटे। 
 कुछ मुरझाए है तो कुछ खिले । 
कितना रंगीन है ये खेत - खलियान । 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
 आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर" 

कविता: "ठंडी"

"ठंडी"
ठण्डी का मौसम आया।  
सर्द हवाएँ संग - संग लाया ।।  
ठण्डी का मौसम आया ।   
कोहरा बहुत जयादा आया ।।    
ओस भी खुशी - खुशी घासो पर छाया ।  
ठण्डी का मौसम आया ।।  
सर्द हवाएँ संग लाया ।  
ये मौसम ठंडी का आया ।।  
सर्द हवाएँ संग लाया  ।  
कवि: साहिल कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शनिवार, 17 जनवरी 2026

कविता: "उम्मीद दिलाने की जरुरत है उसे"

"उम्मीद दिलाने की जरुरत  है उसे"
उम्मीद दिलाने की जरुरत  है उसे। 
दोस्ती कायम रखने का जिगर रखना । । 
दुरियाँ बड़ रही है इस दोस्ती के बीच । 
कुछ न हो सके तो दोस्ती बनाए रखना । 
मैंने माना की गलती हो गई है मुझसे । । 
मैं चाहता हूँ की ये दोस्ती बनाए रखना । 
भरोसा तो मैंने तोड़ा तुम नराज मत होना । । 
आशु तेरे होंगे पर आँख मेरे होंगे । 
रोना मुझे पड़े दोस्ती ही कुछ इस तरह करना। ।  
उम्मीद दिलाने की जरुरत है उसे । 
हमने तुम्हे जान से भी जायदा चाहा । । 
 इस दोस्ती को ठुकराना मत । 
उम्मीद दिलाने की जरुरत  है उसे । । 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "2026 की शुरुआत"

"2026 की शुरुआत"
हो गया है नया साल सुरु। 
नई जोश और नई अंदाज में। 
पुराने चीज पुराने हो गए 
अब नई चीज की शुरुआत हो गए
नई सोच होगी इसमें 
खिल - खिलाते मुस्कान होगी इसमें 
बाटेंगे प्यार सभी में 
न लड़ाई न दुश्मनी होगी कही 
बस एक जुट होगी सभी 
ख़त्म ही जाएगी सारी नफरते 
अब चलो शुरुआत नई करते 
 हो गया है नया साल सुरु 
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "कोहरे ठंडी की"

"कोहरे ठंडी की"
ठंडी - ठंडी हवाए बहती है।  
कोहरो की भरमार रहती है।
मौसम थोडा भीगा रहता है। 
 कभी धूप खिल जाता है। 
शाम को जल्दी सूरज ढल जाता है  
सुबह मुशिकिल से किरण मिल पाता है 
ठंडी - ठंडी हवाए बहती है  
कोहरो की भरमार रहती  है
आग के पास ही लोग नजर आएंगे 
बहार निकलते साथ बदल जाएंगे 
अंदर रजाई कि ही सहारा होती है 
बाहर जैकेट से गुजारा है 
कवि: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

कविता: "नया साल मुबारक हो"

"नया साल मुबारक हो"
 
नया साल आया है
 साथ में कई उम्मीदें लाया है
पुराने यादों को पीछे छोड़ आया है
नया साल में नया खुशियाँ लाया है
नए  सपनो की ओर हाथ बढ़ाया
नया साल देखो है आया।  
कल की गलतियों को माफ़ करते है
आओ साथ मिलकर एक नई शुरुआत करते है। 
थोड़ा सा विश्वास और थोड़ा सा साथ 
और होंगे नये सपने, अपने सकार।
नया साल देखो है आया।  
साथ में कई उम्मीदें लाया है।
 
कवि: रमेश कुमार, कक्षा; 5th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

कविता: "ठंडी को मिला मौका"

"ठंडी को मिला मौका"
 
ठंडी का मौसम आया। 
अग्नि प्रक्रिया हुआ शुरू।  
ठंडी में सुबह उठने का मन नहीं करता । 
बिस्तर पर लेटे रहने को दिल कहता।। 
ठंडी का मौसम आया। 
नहाने पर प्रतिबन्ध लगाया।।  
धीरे - धीरे ठंडी बढ़ता जा रहा है। 
 टेम्परेचर 16 से 6 होता जा रहा है। 
ठंडी का मौसम आया। 
अग्नि प्रक्रिया हुआ शुरू।  
 
कवि : अमित कुमार, कक्षा: 11th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"  

कविता: "मेरे भी सपने है"

"मेरे भी सपने है"
 
सपने मेरे भी है, और उसे। 
पूरा भी करना है।।
चाहे कैसे भी हालत हो।
पर उसे पूरा करना है।। 
सपने कुछ ख़ास नहीं।
पर है कुछ जरुरी।।
हमें पता है उसके लिए।
पूरा मेहनत करना है।।
मेरे भी कुछ सपने है
  कितना भी मेहनत  करना पड़े
उसे पूरा करना है।। 
 
 
कवि : गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र, "अपना घर" 

कविता : "गर्मी आ चली है"

"गर्मी आ चली है" 
कुछ दिनों की बात है ,
गर्मी आने  इंतजार है। 
फिर न रहेगी सर्दी ,
न पहनेगे  अब सर्दी के  कपड़े। 
मजे करेंगे गर्मी का मौशम ,
कुछ दिनों की बात है। 
 गर्मी आने का इंतजार है। 
फिर होगी कभी कभी बरसात ,
खूब मजे करेंगे ये मौशम के साथ ,
चाहे गर्मी हो या बरसात।
कवि : नसीब कुमार, कक्षा : 3rd,
अपना घर