शनिवार, 14 मार्च 2026
बचपन में बहूत ख्वाइशें थीं
शुक्रवार, 13 मार्च 2026
दिन ढलने को चला नहीं की
कविता
मंगलवार, 10 मार्च 2026
ज़िंदगी तो पलभर का है
कविता
कविता: "इंतजार"
रविवार, 8 मार्च 2026
हर गली में हर डगर में
कविता
हर गली में हर डगर में
कहीं किसी राह के कोने में
मिलती नई ज़िंदगी पड़ी यूँ उलझे चौराहों में
जल गयीं क्या सारी कीताबें
या खो गयी किसी शहर में
बिखरे हुए लगते है सारे मदरसे
समुन्द्रों कि गहराई में छुपे लगते है स्कूल सारे
गलियां भी अब रूठ गयी है
बेसहारा को देख कर टूट गयी है
बेज़ुबान है इंसान यहाँ
हारा हुआ है ये जहाँ
कतरा कतरा बस जल उठता है
हश्र ये देखकर जी रो उठता है
कबतक यूँ ही बिखरा रहेगा
ये जहाँ कब तक शांत रहेगा
गलियां कहाँ तक शांत रहेगी
गीली मिटटी में क्या सब गल जायेगा
गलतिया न होते हुए भी उनकी क्या उनका स्कूल छिन जायेगा
क्यों भिखरी हुई है ज़िंदगी यूँ राहों में
क्या खो गयी है किताब कहीं दूर शहरों में
कवि - साहिल
कक्षा -9
(अपना घर )
अब हो गया ठंडी ख़त्म
शुक्रवार, 6 मार्च 2026
शांति
कविता
फसलों घेरे में
उसके आगे थोड़े
थोड़े से पीछे भी
मशीनों की ा रही बेसुर आवाज़
जिससे चली गयी कोसो दूर
मेरे नज़रो में जो शांति थी
गाड़ी थोड़े अलग शोर से
जोर-जोर खींचे जा रही मेरे कान
पेंच हथोड़ी चीनी करते तब तब आवाज़
मेरे दाहिने पटीने और ठहरी जो शांति थी
पीछे लड़ते कुत्तों के झुण्ड
है बड़ी बेरहम
जिसके भोकने के मारे
मर गयी शन्ति
जो मौजूद थी पीठ के पीछे
गुरुवार, 5 मार्च 2026
होली का ये महीना है रंगो का का त्यौहार आया
झूम - झूम कर खेलेंगे खूब गुलाल लगाकर
मजा तो आएगा होली में सभी को रंग लागने से
पर वो दिन क्या ही था जब जब हम नहा भी लिया करते थे
गुजिया तो खाते ही है सबको खिलते भी है बाटते भी है
मन को खुश कर देती है ये तरह तरह के रंग को दिखा कर
महीना का अपना ही अंदाज है रंगो का राज है
"पहले देखा था माँ ने वो दिन "
पहले देखा था माँ ने वो दिन
जब दुनिया लगती थी पूरी हरी भरी
जब से बढ गए लोग
तब से लगी दुनिया ख़तम पेडो से पूरी
पहले देखा था मेने वो दिन
जब दुनिया पूरी लगती हरी भरी
अब लोग बनाते पेड़ों को काटकर लकड़ी
काट काटकर लकड़ी
काट काटकर पेड़ों से लकड़ी ख़तम होने लगे पेड़ ही पुरे
पहले देखा था माँ ने वो दिन
जब दुनिया लगती पूरी हरी भरी
कक्षा : 7
सोमवार, 2 मार्च 2026
कविता: "क्या आपने जिंदगी देखी है"
रविवार, 1 मार्च 2026
कविता: "उड़ने दो परिंदो को आसमान में"
रविवार, 22 फ़रवरी 2026
कविता: "एग्जाम के दिन"
शनिवार, 21 फ़रवरी 2026
कविता: "लक्ष्य"
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026
Poem: "A Step out from the World"
कविता: "एग्जाम"
बुधवार, 18 फ़रवरी 2026
कविता: "परीक्षा"
कविता: "कठिन परिश्रम"
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
कविता: "माँ तेरी याद आज आ रही है"
शनिवार, 7 फ़रवरी 2026
कविता: "बच्चे काम पर जा रहे है"
"बच्चे काम पर जा रहे है" बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये। वही मैले कपड़े पहने रहते है ।। काम करने पर कुछ खाने को दे देते है । दिन भर मेहनत करा के शाम को छुटी कर देते है ।। एक बार उनके हाथो को देखो तो, उनकी लकीरे शायद ही हो,उनसे पूछो तो उनके दिल में किस चीज की चाह है ।। कभी स्कूल के लिए पूछो । शायद एक उगता सूरज बन सकता हो।। अंधेरो मार भगा सकता हो । एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।। ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो । बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।। कवि: नरेंद्र कुमार, कक्षा: 3rd,आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026
कविता: " क्यों इतनी जल्दी आ जाते हो सूरज जी ?"
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
कविता: "उदास बैठा मेरा यार"
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026
कविता: "काले बादल"
सोमवार, 2 फ़रवरी 2026
कविता: "क्यों मज़दूर इतना मज़बूर रहता है"
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
कविता: "अँधेरी रात हो रही है"
शुक्रवार, 30 जनवरी 2026
कविता: "महात्मा गाँधी"
गुरुवार, 29 जनवरी 2026
कविता: "समय आ गया है"
मंगलवार, 27 जनवरी 2026
कविता: "लड़को की जिम्मेदारी"
कविता: "बड़ा भाई"
रविवार, 25 जनवरी 2026
कविता: "मेरी भी जिम्मेदारी है"
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
कविता: "क्रिकेट का दिन"
गुरुवार, 22 जनवरी 2026
कविता: "बरसात की राह "
दिनभर यही आस में बैठा हूँ।।
कब होगी बरसात इस धरती पर ।
पियासे है पेड़ - पौधे, सुखे पड़े है खेत - खलियान।।
महक उठेगी ये धरती ।
न जाने कब छाएंगे बादल आसमान में ।।
एक बार फिर चाँद चमकेगा अँधेरी रातो में ।
न जाने कब दिखेगी सब की चेहरे पर खुशी ।।
सोच रहा था क्या करू मैं ।
बुधवार, 21 जनवरी 2026
कविता: "अच्छी पलो कि यादो में"
सोमवार, 19 जनवरी 2026
कविता: "पढ़ना हुआ मुश्किल"
न जाने क्या - क्या नई चीजे आ गई है ।।
जो सोच के परे है ।
अब एक छोटी सी चीज को भी बिस्तार से बताया है ।।
समझना मुशिकल है ।
अब तो नई - नई मशीने आ गई ।।
जिसका एक एक अंग भी पढ़ना है।
जो जल्द से जल्द फसल उगा रहा है ।
अब आसान नहीं है पड़ना लिखना ।।
कविता: "31 दिसम्बर 2025 की दिन"
रविवार, 18 जनवरी 2026
कविता : "बीते हुए कल"
जो हमने बिताए थे कल ।।
सभी के साथ हस कर खिल - खिलाए थे।
पर अब उसका कोई भी नहीं है हल ।
मुझे याद आते है वो पल ।।
जो हमने बिताए थे कल ।
रोजाना आग के पास जाना था।।
जो हमने बिताए थे कल ।