मंगलवार, 23 अक्तूबर 2018

कविता : मन करता है सागर बनकर

" मन करता है सागर बनकर "

मन करता है सागर बनकर,
दूर तलाक तक मैं लहराऊँ | 
मन करता है हवा बनकर, 
घने बगिया को छू आऊँ | 
मन करता है चंदा बनकर, 
अंधियारे को दूर भगाऊँ | 
मन करता है तारा बनकर, 
एक नया संसार बनाऊँ | 
मन करता है सूरज बनकर,
किरण की नयी उम्मीद जगाऊँ | 
मन करता है एक इंसान बनकर, 
इस धरती में मानवता के बीज उगाऊँ | 

कवि : कामता कुमार , कक्षा :7th , अपना घर



 कवि परिचय : यह हैं कामता कुमार जो की बिहार के एक नवादा जिले के एक गांव के रहने वाले हैं इस समय कामता अपना घर में रहकर अपनी पढाई कर रहे हैं | सच में कामता मानवता के बीज बोन के लिए प्रयत्न करते  हैं | कामता को क्रिकेट खेलने का बहुत शौक है | 

कोई टिप्पणी नहीं: