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बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

कविता: चाय गरम

चाय गरम

चाय बनी है गरम - गरम,
ठंढ़ी लगे नरम - नरम।
चाय पीये हम गरम - गरम,
ठंढ़ी लागे हमको गरम।
ठंढ़ी से हम सबको बचना होगा,
इसका हमको ध्यान रखना होगा।


लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

कहानी: हरहर सिंह की तरकीब

हरहर सिंह की तरकीब
प्राचीन काल की बात है की एक राजा किसी नगर में राज्य करता था। वह बड़ा ही निर्दयी और क्रूर और हरदम दुखी रहने वाला राजा था। वह लोगो को हमेशा सताया और डराया करता था। वह सभी लोगो से अपने खेतों में काम करवाता था और काम के बदले जो भी पैसा तय करता उतने न देकर उससे बहुत ही काम पैसे देता था, मजदूर जब अपने पैसे मांगते थे तो उनकी पिटाई करता और उन्हें जेल में डाल देता। इस तरह से राजा नगर के लोगों को सताया करता था। उसी नगर में हरहर सिंह नाम काल एक नौजवान रहता था। उसकी उम्र लगभग २८ वर्ष थी, वह कुछ पढ़ा लिखा था और बहुत समझदार भी था। जब उसे पता चला की राजा नगर के वासियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है, तो हर हर सिंह ने लोगों को बुलाकर एक बैठक की और उन्हें समझाया कि हम लोगों को स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार है और हम लोगो से कोई जबरदस्ती करके काम नही ले सकता है। मगर हम लोगों को अपने अधिकार लेने के लिए एक साथ संगठित और शिक्षित होकर संघर्ष कारन पड़ेगा तब हमें अपना अधिकार मिलेगा। हमें अपना अधिकार तब मिलेगा सब हम सभी राजा के पास चलाकर इस अन्याय का विरोध करे और हम स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार मांगे। बैठक के बाद कुछ लोगो राजा के पास जाकर विरोध करने के लिए तैयार ही गए, मगर कुछ लोगो राजा के डर से इस विरोध में शामिल नही हो रहे थे । हर हर सिंह ने उन लोगों को फ़िर से खूब समझाया कि राजा तुम्हारा कुछ नही कर सकता है न करेगा, इसलिए आप सभी इस संघर्ष में शामिल हो... ये तुम्हारा अधिकार है अगर आप नहीं लोगो तो वो कौन लेगा, तुम्हे अपना अधिकार लेने के लिए राजा का विरोध करना चाहिए, अगर नही करोगे तो तुम्हे अधिकार नही मिलने वाला है। इतन कहते ही सभी नगर वासी संघर्ष के लिए तैयार हो गए। औए अगले दिन राजा के राजा के दरबार में विरोध करने पहुँच गए और अपने अधिकार के मांग को लेकर नारे लगाने लगे। राजा सभी नगरवासियों को इकठ्ठा देख कर डर गया वो सोचने लगा कि कंही सभी मिलकर हमें पीटने न लगे। राजा सभी से बातचीत करने लगा और उसने नगरवासियों से कहा कि मै ग़लत था आप सबसे अपनी गलतियों के लिए माफ़ी चाहता हूँ । आज से आप सभी अपने मर्जी से काम का समय तय करेंगे और जो भी मजदूरी आप सभी मिल कर तय करेंगे वो मजदूरी आपको पूरी कि पूरी मिलेगी और राजा ने उनके सभी अधिकार दिए। नगर के लोगो इस जीत से बहुँत ही खुश हुए। नगरवासियों ने हरहर सिंह को इस जीत के लिए धन्यवाद् दिया और खूब बधाइयां दी। हरहर सिंह कि तरकीब देखकर राजा बहुँत ही प्रभावित हुआ। राज ने भी निर्दयता, क्रूरता, सताना और डरना छोड़कर लोगो के साथ अच्छा ब्यवहार करने लगा । राजा अब सभी के साथ खेतो में जाकर ख़ुद काम करने लगा सभी लोगो के साथ मिलकर उनके साथ प्रेमपूर्वक जीने लगा। इस प्रकर अब नगर के सभी लोग हरहर सिंह के साथ खुशी से रहने लगे साथ में अब राजा भी बहुत खुश रहने लगा....
lekhak: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना ghar

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

कविता: पापा और बेटा

पापा और बेटा

पापा कहते है बेटा,
तुम भी पढ़ने जाया करो...
पढ़ लिख कर अच्छा काम करोगे,
जग में अपना नाम करोगे...
पापा कहते है बेटा,
तुम भी पढ़ने जाया करो...
पापा ने पूछा एक सवाल,
बेटा बोलो मेरे कमाल....
तुम कौन सा ऐसा काम करोगे,
जिससे जग में नाम करोगे....
मैंने काफी सोच के बोला,
अपना छोटा सा मुंह खोला....
पापा मै अच्छा इन्सान बनूँगा,
हर गरीब की मदद करूँगा....
जिससे उनका होगा काम,
जग में होगा मेरा नाम....
पापा कहते है बेटा,
तुम भी पढ़ने जाया करो....


लेखक: सागर कुमार, कक्षा ७, अपना घर

कविता: गुरु जी की मार

गुरु जी की मार

गुरु जी हमारे कितने प्यारे,
हरदम पाठ पढाते प्यारे...
हम भी पढ़ते जाते सारे,
याद न हमको होते प्यारे...
कक्षा में जब गुरु जी बोले,
पाठ सुनाओ बेटा भोले...
हम तो भइया गए भूल,
सोचा क्यो आए स्कूल...
गुरु जी को गुस्सा आया,
खूब पड़े फ़िर मुझको रूल...
याद आ गई मेरी नानी,
ख़त्म हुई अब मेरी कहानी...

लेखक :चंदन कुमार, कक्षा ४, अपना घर

बुधवार, 16 सितंबर 2009

कविता: थाली और गिलास

थाली और गिलास

एक थी थाली एक था गिलास,
खाने में मिलते हरदम साथ...
हर घर में वे रहते साथ,
एक दूजे से करते बात...
एक दिन थाली की आई बारात,
चम्मच कटोरी जमके नाचे साथ...
दूल्हा बन ठुमके थे गिलास,
दोनों की शादी हो गई साथ...
एक थी थाली एक था गिलास,
खाने में मिलते हरदम साथ
....
लेखक: जमुना कुमार, कक्षा ४, अपना घर

सोमवार, 14 सितंबर 2009

कविता: कंप्यूटर

कंप्यूटर
कंप्यूटर है ये कितना अच्छा,
चलाता है इसको बच्चा बच्चा...
कंप्यूटर होते है बहुँत प्रकार,
अलग अलग होते है इनके आकार...
बहुँत सारा होता है डाटा स्टोर,
करता नही है ये शोर...
छोटा सा होता है माऊस एक,
जो करता है काम अनेक...
कंप्यूटर है ये कितना अच्छा,
चलाता है इसको बच्चा बच्चा...
छोटा सा होता है माऊस एक,
जो करता है काम अनेक...
लेखक: धर्मेन्द्र कुमार, कक्षा ७, अपना घर

रविवार, 6 सितंबर 2009

कविता: लालू आलू और भालू

लालू आलू और भालू

असली है घोड़ा, उस पर बैठा मोड़ा,
जा पहुँचा वह अल्मोडा...
वहा पर खाया उसने केला,
फ़िर देखा दशहरे का मेला...
मेले में ख़रीदा उसने आलू,
मोड़ा के पीछे पड़ गया भालू...
छोड़ के भागा फ़िर वह आलू,
तब तक आ गए पूर्व रेलमंत्री लालू...
लालू ने भी ख़रीदा आलू,
उनके पीछे पड़ गया भालू...
लालू को लगा बड़ा ही झटका,
तब तक भालू ने उनको दे पटका...
लालू को जोर से गुस्सा आया,
जल्दी से उसने पुलिस बुलाया...
भालू की जेल में हुई पिटाई,
भालू ने अस्पताल में दवा कराई...

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

बुधवार, 2 सितंबर 2009

कविता: आओ सीखे अ, आ, ई

आओ सीखे अ, आ, ई

छोटा "अ" से अजगर, बड़ा "आ" से आम,
कभी न करना, तुम कोई ग़लत काम....
छोटी "इ" से इमली, बड़ी "ई" से ईख,
बड़ों से लेना हरदम सीख...
छोटा "उ" से उपमा, बड़ा "ऊ" ऊन,
देखने जाना देहरादून...
ए से "एक", "ऐ" से ऐनक,
बच्चे सभी बनेगे सैनिक...
"ओ" से ओर, "औ" से और,
आसमान का मिलता न छोर...
"अं" से अंगद, "अः" पर है विसर्ग,
एक ही है सब जाति और धर्म....


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

बुधवार, 26 अगस्त 2009

कविता: बन्दर और कलेंडर

बन्दर और कलेंडर

आसमान में टंगा कलेंडर,
उसको पढ़ रहे थे हाथी बन्दर....
आसमान से गिरा जब बन्दर,
चिपका गया धरती के अन्दर
धरती के अन्दर थे तीन बन्दर,
तीनों ने मारे जम के थप्पड़ ...
बन्दर भगा किचन के अन्दर,
खाने लगा घी और मक्खन....
लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ८, अपना घर

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

कविता: रक्षाबंधन त्यौहार

रक्षाबंधन त्यौहार

आज बुधवार है,
नानकारी का बाजार है...
बाजार का झोला तैयार है,
आज मेरी सोच बेकार है...
आज तो रक्षा बंधन त्यौहार है,
राखी हाथ में बंधने को तैयार है..
राखी हम पहले बंधावायेंगे,
बाजार
फ़िर बाद में जायेंगे...
खूब जम के मिठाई खायेंगे,
मिलके खुशियाँ मनाएंगे...
लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

कविता: बकरी खाती खीरा ककड़ी

बकरी खाती खीरा ककड़ी

एक थी प्यारी बकरी,
खाती हरदम खीरा ककड़ी...
जब दिन आया मंगल,
वो भाग के पहुँची जंगल...
जंगल में मिले दो भालू,
दोनों खा रहे थे कच्चे आलू...
बकरी को खिलाया कच्चा आलू,
खाकर बकरी बन गई चालू...
भालू ने सोचा बकरी को खा लूँ,
नरम मुलायम मांस मै पा लूँ...
बकरी निकली बहुत ही चालू,
भालू को पिलाया जम के दारू...
दारू पीकर भालू बोला खीरा-खीरा,
बकरी ने झटपट भालू को चीरा...
भालू ने मरते ही बोला जय हो,
भैया बकरी से अब रखो भय हो...
सब भालू अब खाना खीरा ककड़ी,
जैसे हरदम खाती थी वो बकरी..
एक थी प्यारी बकरी,
खाती हरदम खीरा ककड़ी...
लेखक, सागर कुमार, कक्षा ६, अपना घर

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

कहानी: दो दोस्त और जंगल का राक्षस

दो दोस्त और जंगल का राक्षस

बहुत समय पहले की बात है की एक छोटा सा गाँव था, उसी गाँव में दो मित्र रहते थे। एक का नाम था गंगू और दूसरे का नाम छंगू था। गंगू चालक और बुद्धिमान था, क्योंकि वह पढ़ने जाता था, पर छंगू न ही चालाक था न ही बुद्धिमान। वह बिल्कुल अनपढ़ और भोला था, यहाँ तक की उसने स्कूल का मुंह भी नही देखा था। घर में गरीबी होने के कारण वह पढ़ न सका और छोटी उम्र में ही काम करने लगा। गंगू हमेशा छंगू के सामने अपना घमंड दिखाया करता था कि मै तुमसे कितना चालाक और बुद्धिमान हूँ, मगर छंगू कभी भी इन बातों का बुरा नही मानता था। वो कहता था हा यार मै अनपढ़ भला कैसे बुद्धिमान हो सकता हूँ समय के साथ धीरे -धीरे दोनों मित्र बड़े हो गए। एक दिन दोनों मित्रों ने आपस में बात की, कि चलो कंही घूमने चलते है। छंगू ने कहा कि चलो आज उस पास के जंगल में चलते है। दोनों मित्र टहलते-टहलते गाँव से दूर उस जंगल में आ गए, चारो तरफ़ घने पेड़ के जंगल थे। गर्मी बहुत तेज थी गंगू को तेज प्यास लगी, गंगू कहने लगा अगर थोडी देर में मुझे पानी नही मिला तो शायद मै प्यास से मर जाऊ। छंगू ने गंगू को एक पेड़ के छाये में लिटा दिया और ख़ुद पानी ढूढ़ने के लिए जंगल कि तरफ़ चल दिया। भटकते- भटकते आखिरकार वो एक कुएं के पास पहुँच ही गया। उस कुएं के पास के पेड़ पर दो बड़े राक्षस रहते थे। कुएं का पानी मुहं तक लबालब भरा था, छंगू को भी अब तक प्यास लग गई थी। वो झुक कर पानी पीने लगा, पानी पीने कि आवाज सुनकर पेड़ से दोनों राक्षस धड़ाम से जमीं पर कूद पड़े। छंगू अचानक आवाज सुनकर थोड़ा डर गया उसने पीछे देखा तो दो बड़े राक्षस खडे थे। दोनों राक्षस ने छंगू से पूछा कि तुम कौन हो और यंहा पर क्या कर रहे हो। छंगू बहादुर था उसने बिना डरे बताया कि मेरा नाम छंगू है, और मै पास के गाँव का रहन वाला हूँ। मै और मेरा दोस्त गंगू आज इधर घूमने आये थे। मेरा दोस्त अभी प्यास से बेहाल होकर पेड़ के पास पड़ा है, मै उसके लिए पानी लेने आया हूँ । छंगू के निडरता और दोस्त के लिए प्यार देखकर दोनों राक्षस बहुत खुश हुए , दोनों राक्षसों ने कहा कि हम दोनों भी दोस्त है और हम दोनों एक दूसरे के लिए जान भी दे सकते है। उन्होंने छंगू को एक बर्तन में पानी तथा ढेर सारे मिठाई, फल दिए, और कहा अपने दोस्त को खिलाना और हमेशा अच्छे दोस्त बनकर रहना। छंगू पानी और मिठाई लेकर गंगू के पास पंहुचा, उसे पानी पिलाया और फ़िर दोनों ने जमकर मिठाई औरफल खाया, साथ ही छंगू ने गंगू को उन दोनों राक्षस कि बात भी बताई कि किस तरह पानी लेते हुए वे दोनों भले राक्षस आ गए थे, और उन्होंने ने ये फल और मिठाई दिए। गंगू को कहानी सुनते - सुनते आँखों से आंसू आ गए कि किस तरह छंगू ने अपने जान की परवाह न करते हुए उसकी जान बचाई, साथ ही गर्व भी हुआ कि उसका दोस्त कितना बहादुर है। मगर अपने पर शर्मिंदा होने लगा कि मै किस तरह छंगू को नीचा दिखता था, और अपने पर घमंड करता था। गंगू रोते हुए अपने गलतियों के लिए छंगू से माफ़ी मांगने लगा, छंगू ने उसे गले लगाते हुए कहा धत पगले दोस्तों में माफ़ी मांगते है, इतना कहते-कहते छंगू के भी आँखों से आंसू टपकने लगे। दोनों दोस्त वापस अपने गाँव आये और खूब मजे से प्रेम पूर्वक रहने लगे।

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

कक्षा में है नही घड़ी

कक्षा में है नही घड़ी

कक्षा है भाई कितनी बड़ी,
पर लगी नही है कोई घड़ी...
मन करता है सब बच्चों का,
लाकर लगा दे एक घड़ी...
पर डर लगता है सब बच्चों को,
टीचर, प्रिंसपल के डंडे से...
बच्चे भी कुछ कह नही पाते,
अपने क्लास के टीचर से...
कक्षा है भाई कितनी बड़ी,
पर लगी नही है कोई घड़ी...
लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

कविता: मोटा-मोटी

मोटा-मोटी

एक था मोटा, एक थी मोटी,
खाते थे, दोनों दस-दस रोटी।
एक दिन उनके घर आए मेहमान,
बोले लगी है भूख कराओ खान-पान।
मोटी थी बड़ी आलसी और खोटी,
बोली घर में बनी नही है रोटी।
चट से बोली आटा रखा है घर में,
झट से पका लो रोटी चूल्हे में।
अभी नींद लगी है, इसलिए मुझे है सोना,
पक जाए अगर रोटी, तो मुझे जगा देना।
लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

बुधवार, 29 जुलाई 2009

कविता: कालू बन्दर

कालू बन्दर

एक था कालू बन्दर,
रहता था नाले के अन्दर...
एक दिन खा रहा था चुकंदर,
मस्ती में था नाले के अन्दर...
उतने में एक सांप आया,
उसने अपना फन जो उठाया...
बन्दर जी की घिघ्घी बन गई,
हालत उनकी पतली हो गई...
कालू बन्दर भागे अन्दर,
उनके हाथ से गिरा चुकंदर...
आगे मिल गई नागिन रानी,
बोली बन्दर भैया पीलो पानी...
कालू बन्दर नाले से भागे,
पेड़ पर चढ़ कर जम के हाफें...
याद आ गई बन्दर को नानी,
खत्म हो गई अपनी कहानी...

लेखक: मुकेश, कक्षा ८, अपना घर

कविता: रात का अँधेरा

रात का अँधेरा

रात का अँधेरा था,
पास के घर में उजेला था...
ऐसा लग रहा था,
जैसे कोई पढ़ रहा था...
मन में मै डर रहा था,
अपने आप से लड़ रहा था...
भूत है ये मन कह रहा था,
अँधेरा और बढ़ रहा था...
मै चद्दर ओढ़ कर सो गया,
सपनो में जाके खो गया...
सपनो में परियाँ थी,
फूलों की बगिया थी...
तभी अचानक सूरज उग आया,
चारो ओर उजाला फैलाया...
उजाले में सबने की पढ़ाई,
और मैंने ये कविता बनाई...
लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर


मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कविता: जीवन

जीवन

जीवन के हर उमंगों से,
तितली व उसके पंखों से...
आसमान में उड़ती नीली- पीली पतंगों से,
यह धरती है तो मनुष्यों से...
पक्षियों से , जीव- जंतुओं से,
आसमां के हर तारों -सितारों से...
अगर जीवन है तो पेड़-पौधों से,
सूरज से, चन्दा की रोशनी से...
हवा से, मिटटी से, पानी से,

शान्ति से, दोस्ती से, मोहब्बत से...
जीना है तो जियो मुस्करा के,
मरना है तो मरो मुस्करा के...

लेखक: आदित्य, कक्षा ७, अपना घर

सोमवार, 27 जुलाई 2009

कविता: बरसते पानी में

बरसते पानी में
बरस रहा है पानी,
कैसे मै बाहर निकलू ....
इस पानी को कैसे बंद करें,
ये है ऊपर वाले की मेहरबानी.....
बरसते हुए पानी में,
बहते हुए पानी में....
नहाने का मन कर रहा है,
पर अन्दर से डर लग रहा है.....
पानी खूब बरस रहा है,
खेलने को मन तरस रहा है...

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर