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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

कविता: अब नहीं किसी का जुल्म सहेंगे

अब नहीं किसी का जुल्म सहेंगे

जुल्म क्या है ? जुल्म से लड़ना सीखो,
मुल्क क्या है ? मुल्क में रहना सीखो।
कोई किसी को मारे ये जुल्म है,
कोई खड़ा देखे ये तो और जुल्म है।
अपना मुल्क तो अपना भारत देश है
टोपी, चश्मा, हाथ में लाठी ये गाँधी जी का वेश है।
लक्ष्मी बाई और भगत सिंह ने भारत में जन्म लिया,
इस देश कि खातिर अपने प्राणों को गंवा दिया।
गोरे हम पर जुल्म ढाने आये,
साथ में गोला, बारूद, बम लाये
सारा देश फिर एक हुआ,
जुल्म के खिलाफ साथ हुआ।
जनता बोली नहीं सहेंगे जुल्म किसी का,
गोरा काला सरकार या और किसी का।
आओ मिलकर फिर से लड़ेंगे,
गलत हुआ तो चुप रहेंगे।
अब किसी का जुल्म सहेंगे,
आजाद है हम आजाद रहेंगे
लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर



गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

कविता: जब मानव आपस में लड़ता है

जब मानव आपस में लड़ता है

जब मानव आपस में लड़ता है ,
तब जुल्म सितम बढ़ता है
कौन बचाए उनको कौन छुड़ाये,
ये सारा जमाना कहता है
कुछ लड़ते है इस देश के खातिर,
कुछ मरते है बस रुपयों के खातिर
सब मांगते है बस अपने लिए ,
कोई जीता नहीं जिए दूजे के लिए
इस देश पर जताए जो सिर्फ अपना हक़ ,
इनको भी सिखायेंगे अब हम सबक
चारो ओर फैलाओ सबको यह बात ,
नहीं है अलग कोई धर्म जात -पांत
हम है सभी एक इन्सान भाई,
क्यों करते हो आपस में लडाई।
गले मिल जाएँ एक दूजे के हम,
दुनियाँ में सुखमय जीवन जिएँ हम


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

कविता: बैगन के है नसीब फूटे

बैगन के है नसीब फूटे

बैगन जी कि दिल्ली गई बरात,
पहुचते पहुचते हो गई आधी रात ।
मूली जी दुल्हन बनी थी ,
मन ही मन वो सोच रही थी ।
कब आयेंगे दुल्हे राजा ,
उन्हें खिलाऊंगी हलुआ ताजा।
तब तक आ गए दुल्हे राजा ,
मूली ने देख रुकवाया बाजा।
क्योकि दूल्हा थे बैगन काला ,
मूली बोली मै नहीं डालूंगी माला ।
दूल्हा काला दुल्हन गोरी ,
टूट गई शादी कि डोरी ।
बैगन बोला हमारे नसीब है क्यों फूटे,
मूली झट से बोली क्योकि तुम हो काले कलूटे।


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

कहानी: चूहा और बिल्ली कि दोस्ती

चूहा और बिल्ली कि दोस्ती

एक बार कि बात है कि एक बिल्ली थी, जिसक नाम बाटी था और एक चूहा जिसका नाम चोखा था। उन दोनों में बहुँत अच्छी दोस्ती थी। वे जँहा भी जाते एक साथ जाते और एक दूसरे के ऊपर मुसीबत जाने पर सहायता करते थे। एक दिन बिल्ली किसी के घर दूध पीने गई। उसने देखा कि दूध भरा हुआ कटोरा रसोई घर में हुआ है, वो रसोई घर में घुस गयी, तभी चूहा भी पीछे से धमका, बाटी ने दूध कटोरा गिरा दिया। दूध जमीन पर गिर गया बाटी और चोखा दोनों मस्त होकर दूध पीने लगे। थोड़ी देर में चूहे का पेट भर गया वो एक तरफ जाकर आराम फरमाने लगा। तभी बाटी के ऊपर किसी ने जाल डाल दिया, और उसे जाल में बांधकर रसोईघर के एक कोने में रखदिया। उस आदमी के जाने के बाद चोखा धीरे से बाहर आया और बाटी को आजाद करने के लिए जल्द से उस जालको काट दिया, और बाटी को मरने से बचा लिया। घर का कोई आदमी फिर आकर मारे उससे पहले दोनों वंहा से भाग लिए। इस तरह से चूहे ने बिल्ली कि जान बचा ली और अपनी मित्रता कि शान बढा ली।

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

कविता: आओ मिलकर खेले खेल

आओ मिलकर खेले खेल

आओ सब मिल खेले कोई खेल,
जिससे हो जाए सबका मेल...
सोच के बोलो कौन सा होगा खेल,
जिससे हो जाएगा सभी का मेल....
ना कोई बल्ला ना कोई जेल,
होगा वह लुका छुपी का खेल....
कुछ बने चोर कुछ बने सिपाही,
बाकि सब बन जायें राही....
बीच में चोर आगे राही,
पीछे दौड़े पुलिस सिपाही....
जोर लगाकर भागो चोर,
आओ मिलकर मचाये शोर.....
यही है सबसे बढ़िया खेल,
जिससे होगा सबका मेल....


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर, १८/११/२००९

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

कविता: हिंदुस्तान हमारा है........

हिंदुस्तान हमारा है

हिंदुस्तान हमारा है,
हमको जान से प्यारा है....
इसकी खातिर लोगो ने दी क़ुरबानी,
तब जाकर मिली हम सबको आजादी....
देश के खातिर जो मिट गए,
अंग्रेजों को देश से खदेड़ गए.....
अंग्रेज तो कब के चले गए,
पर अपनी अंग्रेजियत छोड़ गए ....
आज काले अंग्रेज करते है राज,
नही सुनता कोई गरीबों की आवाज....
क्या इस अंग्रेजियत से पार पाएंगे,
जाने कब इनको मार भगायेंगे ....

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर



सोमवार, 2 नवंबर 2009

कविता: सबसे अच्छा क्या

सबसे अच्छा क्या

तारों मे अच्छा तारा,
वह है सूर्य हमारा...
रातों मे सबसे अंधेरी रात,
वो है अमौस्या की रात...
गीतों में वह गीत,
वो है अपने देश का राष्ट्रीय गीत...
दीवारों में है दीवार,
वह है चीन की दीवार...
मीनारों में वह है मीनार,
वह है दिल्ली में कुतुबमीनार....
ज्ञानों में वह ज्ञान जिससे मिले सभी को ज्ञान,
जिसको हम सभी कहते है विज्ञान ...
नारों में है वह नारा,
वो है इन्कलाब का है नारा...
झंडों में है सबसे प्यारा,
वो है तिरंगा हमारा...
देशो में है सबसे न्यारा,
वो है भारत है देश है हमारा...
सप्ताह में छुट्टी वाला दिन,
वो है रविवार का दिन...
बातों में वह है बात,
मज़ेदार की बात...
दानों में वह दानी,
जिसकी सुनी है सभी ने कहानी...
हम सबकी है मुजबानी,
कोई नही है हरिश्चंद्र जैसा दानी...

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

कविता: लाल टमाटर हरा टमाटर

लाल टमाटर हरा टमाटर

लाल टमाटर हरा टमाटर,
दोनों थे पक्के यार ...
एक दिन गए कद्दू राजा के पास,
कद्दू से बोले हम राजा तुम मेरे दास...
इतने में हो गया तीनों में झगड़ा,
कद्दू राजा तो था ही तगड़ा....
बैठ गए उन दोनों के ऊपर,
मारा दोनों के दो - दो झापड़....
झापड़ लगा गाल हुए दोनों के लाल,
बहुत बुरा हुआ उन दोनों का हाल....
राजा बनने का ख्वाब उतरा उनके सर से,
जान बचाकर भागे गए वह जल्दी से....

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

कहानी: हरहर सिंह की तरकीब

हरहर सिंह की तरकीब
प्राचीन काल की बात है की एक राजा किसी नगर में राज्य करता था वह बड़ा ही निर्दयी और क्रूर और हरदम दुखी रहने वाला राजा था वह लोगो को हमेशा सताया और डराया करता था वह सभी लोगो से अपने खेतों में काम करवाता था और काम के बदले जो भी पैसा तय करता उतने देकर उससे बहुत ही काम पैसे देता था, मजदूर जब अपने पैसे मांगते थे तो उनकी पिटाई करता और उन्हें जेल में डाल देता इस तरह से राजा नगर के लोगों को सताया करता था उसी नगर में हरहर सिंह नाम काल एक नौजवान रहता था उसकी उम्र लगभग २८ वर्ष थी, वह कुछ पढ़ा लिखा था और बहुत समझदार भी था जब उसे पता चला की राजा नगर के वासियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है, तो हर हर सिंह ने लोगों को बुलाकर एक बैठक की और उन्हें समझाया कि हम लोगों को स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार है और हम लोगो से कोई जबरदस्ती करके काम नही ले सकता है मगर हम लोगों को अपने अधिकार लेने के लिए एक साथ संगठित और शिक्षित होकर संघर्ष कारन पड़ेगा तब हमें अपना अधिकार मिलेगा हमें अपना अधिकार तब मिलेगा सब हम सभी राजा के पास चलाकर इस अन्याय का विरोध करे और हम स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार मांगे बैठक के बाद कुछ लोगो राजा के पास जाकर विरोध करने के लिए तैयार ही गए, मगर कुछ लोगो राजा के डर से इस विरोध में शामिल नही हो रहे थे हर हर सिंह ने उन लोगों को फ़िर से खूब समझाया कि राजा तुम्हारा कुछ नही कर सकता है करेगा, इसलिए आप सभी इस संघर्ष में शामिल हो... ये तुम्हारा अधिकार है अगर आप नहीं लोगो तो वो कौन लेगा, तुम्हे अपना अधिकार लेने के लिए राजा का विरोध करना चाहिए, अगर नही करोगे तो तुम्हे अधिकार नही मिलने वाला है इतन कहते ही सभी नगर वासी संघर्ष के लिए तैयार हो गए औए अगले दिन राजा के राजा के दरबार में विरोध करने पहुँच गए और अपने अधिकार के मांग को लेकर नारे लगाने लगे राजा सभी नगरवासियों को इकठ्ठा देख कर डर गया वो सोचने लगा कि कंही सभी मिलकर हमें पीटने लगे राजा सभी से बातचीत करने लगा और उसने नगरवासियों से कहा कि मै ग़लत था आप सबसे अपनी गलतियों के लिए माफ़ी चाहता हूँ आज से आप सभी अपने मर्जी से काम का समय तय करेंगे और जो भी मजदूरी आप सभी मिल कर तय करेंगे वो मजदूरी आपको पूरी कि पूरी मिलेगी और राजा ने उनके सभी अधिकार दिए नगर के लोगो इस जीत से बहुँत ही खुश हुए नगरवासियों ने हरहर सिंह को इस जीत के लिए धन्यवाद् दिया और खूब बधाइयां दी हरहर सिंह कि तरकीब देखकर राजा बहुँत ही प्रभावित हुआ राज ने भी निर्दयता, क्रूरता, सताना और डरना छोड़कर लोगो के साथ अच्छा ब्यवहार करने लगा राजा अब सभी के साथ खेतो में जाकर ख़ुद काम करने लगा सभी लोगो के साथ मिलकर उनके साथ प्रेमपूर्वक जीने लगा इस प्रकर अब नगर के सभी लोग हरहर सिंह के साथ खुशी से रहने लगे साथ में अब राजा भी बहुत खुश रहने लगा....
lekhak: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना ghar

बुधवार, 12 अगस्त 2009

कविता: सब्जी की गाड़ी

सब्जी की गाड़ी

आलू बैगन की थी गाड़ी,
उसमें बैठी दस सवारी...
पहिया बने थे धनिया भइया,
हार्न बनी थी लौकी...
स्टेरिंग बने थे कद्दू जी,
गेयर बनी थी मूली...
लाइट बने थे लाल टमाटर,
दिन में बैठे थे मुंह बंद कर...
जैसे ही अँधेरा घिर आता,
चलते थे अपना मुंह खोलकर...
सीट बने थे गोभी जी,
ड्राईवर बने थे शलजम जी....
एक दिन की हम बात बताएं,
सभी जरा सा गौर से सुनिए...
शाम को सूरज ढलने को आया,
चारो तरफ़ अँधेरा छाया...
आपस में दो गाड़ी लड़ गई,
एक दूजे से दोनों भिड गई
एक थी लकड़ी की गाड़ी,
दूजी थी सब्जी की गाड़ी...
सब्जी की गाड़ी टूट गई,
अलग - अलग वो छिटक गई...
सवारी सारे कूद पड़े थे,
गाड़ी से वे दूर खड़े थे...
सबने मिलकर सब्जी को उठाया,
घर ले जाकर सबको बिठाया...
घर में सबने सब्जी बनाया,
बच्चे बूढे सबने मिल खाया...

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

कविता: मोटा-मोटी

मोटा-मोटी

एक था मोटा, एक थी मोटी,
खाते थे, दोनों दस-दस रोटी।
एक दिन उनके घर आए मेहमान,
बोले लगी है भूख कराओ खान-पान।
मोटी थी बड़ी आलसी और खोटी,
बोली घर में बनी नही है रोटी।
चट से बोली आटा रखा है घर में,
झट से पका लो रोटी चूल्हे में।
अभी नींद लगी है, इसलिए मुझे है सोना,
पक जाए अगर रोटी, तो मुझे जगा देना।
लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कविता: जीवन

जीवन

जीवन के हर उमंगों से,
तितली उसके पंखों से...
आसमान में उड़ती नीली- पीली पतंगों से,
यह धरती है तो मनुष्यों से...
पक्षियों से , जीव- जंतुओं से,
आसमां के हर तारों -सितारों से...
अगर जीवन है तो पेड़-पौधों से,
सूरज से, चन्दा की रोशनी से...
हवा से, मिटटी से, पानी से,

शान्ति से, दोस्ती से, मोहब्बत से...
जीना है तो जियो मुस्करा के,
मरना है तो मरो मुस्करा के...

लेखक: आदित्य, कक्षा ७, अपना घर

सोमवार, 20 जुलाई 2009

कविता:- कोई कुछ सुनता नही

कोई कुछ सुनता नही....
हम जगा रहे थे, कोई जागे तो।
हम डर रहे थे, कोई डरे तो।।
हम बाँध रहे थे, कोई बंधें तो।
हम रुला रहे थे, कोई रोये तो॥
हम हंसा रहे थे, कोई हंसे तो।
हम पढ़ा रहे थे, कोई पढ़े तो॥
हम लिखा रहे थे, कोई लिखे तो।
हम नचा रहे थे, कोई नाचे तो॥
हम घुमा रहे थे, कोई घूमे तो।
हम नहला रहे थे, कोई नहाये तो॥
हम खिला रहे थे, कोई खाए तो।
हम बुला रहे थे कोई आए तो॥
हम मुस्करा रहे थे, कोई मुस्कराए तो।
हम सुला रहे थे, कोई सोये तो॥

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

कहानी: पॉँच साहसी दोस्त

पॉँच साहसी दोस्त....
बहुँत समय पहले की बात है एक घना जंगल था उसी जंगल के पास एक गाँव था, गाँव के लोगों का मानना था कि इस जंगल में कई भूत, जंगली जानवर और बड़े - बड़े सांप रहते है, पर उस जंगल में ऐसा कुछ नही था बहुँत ही सुंदर और प्यारा जंगल था मगर गाँव के जितने बड़े लोग थे वह अपने बच्चों से कहते थे कि उस जंगल में मत जाना वर्ना कोई जंगली जानवर तुम्हे मार कर खा जाएगा या फ़िर तुम्हें भूत पकड़ लेगा सभी गाँव के बच्चे उस जंगल में जाने से डरते थे उसी गाँव में एक बच्चों कि टोली थी, उन पांचो बच्चों में आपस में बहुत ही अच्छी दोस्ती थी वे थोड़े शैतानी जरुर करते थे मगर निडर और साहसी थे एक दिन उन्होंने ने आपस में सलाह कि चलो उस जंगल में जाकर देखा जाय कि क्या है वंहा पर, हो सकता है ये बड़े लोग ऐसे ही झूठ बोल रहे हो फ़िर पांचो दोस्त गाँव में बिना किसी को बताये उस जंगल कि तरफ चल दिए जंगल में चलते - चलते वो बहुत दूर निकल आए मगर अभी तक उन्हें कंही भी कोई भूत, सांप ये जंगली जानवर नजर नही आया, रस्ते में उन्हें मोर, खरगोश, हिरन, तोते, जंगली कबूतर और ढेर सारे रंग बिरंगी चिड़िया दिखी आगे चलने पर उन लोगो ने देखा कि पेड़ों के बीच एक बहुत ही सुंदर महल बना है , और उस महल के आस-पास ढेर सारे बच्चे खेल रहे थे, पांचो दोस्त उन्ही बच्चों के साथ खेलने लगे महल के पास वाले बगीचे में ढेर सारे फल के पेड़ लगे थे, सभी ने पेड़ से तोड़ कर ढेर सारे फल खाया और झूला भी झूला अब शाम हो चली थी बातचीत में उन बच्चों ने बताया कि ये हम लोगो का स्कूल हैऔर हम लोग यंहा रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे है हमारे परिवार के लोग इसी जंगल में रहते है सभी बच्चों के साथ इनकी दोस्ती हो गई पांचो दोस्तों ने सभी बच्चों से बिदा लेकर अपने गाँव कि तरफ़ चल दिए इस तरफ़ बहुत देर से बच्चों के गाँव में होने से गाँव वाले परेशान हो गए थे उन्हें लग रहा था कि हो हो ये बच्चे उस जंगल में गए होंगे और वनः पर उन्हें जंगली जानवर या भूत मार डाला होगा जंगल में उन्हें खोजने डर के मारे कोई नही जा रहा था तभी जंगल से वो पंचों बच्चे आते हुए दिखाई दिए गाँव वाले सभी खुश हो गए, पांचो दोस्तों ने जंगल के बारे में और वहाँ के स्कूल के बारे में बताया अगले दिन सभी गाँव वाले उस जंगल में गए उन्होंने वहां पर स्कूल देखा सभी से मिले और बहुँत खुश हुए उन्होंने अपने गाँव के सभी बच्चों को उस स्कूल में भेजने लगे अब उन्हें पता चला कि जंगल के बारे में कितनी झूठी अफवाह फैली हुई थी अब उस गाँव में बड़े लोग उन पांचो दोस्तों कि साहस कि कहानी अपने बच्चों को सुनाने लगे

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर, कानपूर

कविता: पानी काले बादल में

पानी काले बादल में
नीले नीले आसमान में॥
पानी काले बादल में
बादल है या कोई छाया।
ये तो है प्रकृति की माया॥
कब ये पानी बरसाएगा।
हमको कब तक तरसाएगा॥
जब यह पानी बरसेगा
धरती को पहले सींचेगा॥
हम भी नहायेंगे पानी में।
नाव चलाएंगे नाली में॥
पानी की बुँदे गिरेंगी तन पे।
मेरे मन को लगेंगी छन से॥
पानी में झम - झम कूदेंगे।
हम मस्ती में सब डूबेंगे॥
हम सब झूम के नाचेंगे।
संग में सबके गायेंगे॥
सबके संग नहायेंगे।
पानी से बाहर आयेंगे॥
पानी पाकर धरती होगी हरियाली।
घर- घर में आयेगी खुशियाली

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर, कानपूर



रविवार, 5 जुलाई 2009

कविता: मेहनत का दर्द

मेहनत का दर्द
कच्ची कच्ची मिटटी खोदी ।
खोदकर पानी में फुला दी ॥
गोल करके फिर सांचे में डाली ।
ईट हुई गड़बड़ मालिक ने दी गाली॥
गाली सुनकर गुस्सा आया ।
गुस्से को मन में भड़काया ॥
तब पता चला मालिक होते है कंजूस।
गाली देकर मन को पहुचाते है ठेस ॥

आदित्य कुमार कक्षा ७, अपना घर

शनिवार, 30 मई 2009

कहानी: मछुआरे और नेवले कि दोस्ती

मछुआरे और नेवले कि दोस्ती
एक समय की बात है कि एक मछुआरा मछली मारने के लिए जाल लेकर अपने घर से नदी की ओर चला, चलते- चलते रास्ते में उसे एक बडा सा सांप मिला, वह सांप बहुत काला और खतरनाक था वह सांप रास्ते में खड़ा हो गया और बोला कि मैं तुम्हें काटूगा इतने में मछुआरे ने कहा कि मैंने आपका क्या बिगाडा है, जो आप मुझे काटेगें सांप ने कहा मैं भूखा हूँ और मुझे कुछ खाने को चाहिए मछुआरे ने कहा ठीक है जब मै मछली मारकर वापस आऊंगा , तब मैं आपको मछली दूंगा, आप उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लेना सांप नें कहा कि अगर मछली मिली तो मैं तुमको काट लूँगा मछुआरे नें कहा कि ठीक है, तो जाओ और जल्दी वापस आना, सांप ने कहा जब मछुआरा वहां से थोडी दूर बढ़ा तो उसने देखा कि एक नेवला प्यास की वजह से चल नहीं पा रहा है तो उस मछुआरे को दया गई, उसने नेवले को उठाया और पहुंच गया नदी के पास ,वहाँ जाकर नेवले को मछुआरे ने पानी पिलाया और चुप चाप एक जगह पर जाल लगाकर बैठ गया नेवले ने पूछा कि क्या बात है तुम इतने उदास क्यों हो मछुआरे ने सारी बात बता दी नेवले ने कहा कि तुम चिंता मत करो सब कुछ ठीक हो जाएगा, जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ तुम्हें कुछ नहीं होगा मछुआरे को वहाँ जाल से एक भी मछली नहीं मिली, अब मछुआरा बहुत उदास हुआ नेवले ने कहा कि तुम घर कि ओर चलो और मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ मछुआरे ने नेवले को अपनी पोटली में रख लिया और घर कि तरफ़ चल दिया, थोड़ी दूर चलते ही वहीं साँप रस्ते में मिला और वह फुंफकारते हुए बोला कि मछलियाँ कहाँ हैंमछुआरे ने पोटली खोलकर नेवले को बाहर निकाल दिया नेवला पोटली से निकलते ही साँप पर टूट पड़ा, नेवले और सांप में खूब लड़ाई होने लगी सांप को काफी चोट भी लग गई सांप वंहा से जंगल कि तरफ़ भाग निकलामछुआरा नेवले को अपने साथ घर ले गया और इस प्रकार से घर में सही सलामत पहुच कर मछुआरे और नेवले ने साथ में कहना खायाइस प्रकार से मछुआरे और नेवले में पक्की दोस्ती हो गईअगले दिन से दोनों दोस्त साथ में मछली मरने जाने लगे
कहानी: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

मंगलवार, 26 मई 2009

कविता: टेलीफोन

टेलीफोन
कितना अच्छा है टेलीफोन।
बातचीत का साधन टेलीफोन
दूर - दूर से बाते होती
जाने कैसे आवाज पहुँचती॥
सोच - सोचकर यही पछताता।
कैसे टेलीफोन बातें करवाता
टेलीफोन एक ऐसा रस्ता।
जोड़े एक दूजे का रिश्ता॥
इसमे है रुपये का खर्चा।
तभी तो है टेलीफोन का चर्चा

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर


सोमवार, 18 मई 2009

कविता: गर्मी


गर्मी
हवा चल रही है क्या पुरवाई ।
झूम रही है हर पेड़ की डाली॥
सन - सन चल रही गरम लपट।
पतंग हमारी उड़ रही है फटाफट॥
ऐसे में पतंग भला कौन न उडाये।
इतनी गर्मी में भला कौन न नहाये॥
चलो गर्मी के बहाने लस्सी पिया जाए।
लस्सी पीकर चलो पेड़ के नीचे बैठा जाए॥

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर
पेंटिंग: अक्षय कुमार, कक्षा ६, अपना घर


शनिवार, 16 मई 2009

कविता: परीक्षा


परीक्षा
जब वार्षिक परीक्षा आई।
तो हमार सिर चकराई॥
नींद ऊपर से आई।
जम्हाई अलग से आई॥
पर क्या करे ? पेपर है सिर पर।
लेके कापी बैठ गए छत पर॥
नंबर आई अगर कम।
तो निकल जाई हमार दम॥
यही सोच के हम पछताई।
की परीक्षा कब खत्म हो जाई॥

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर