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बुधवार, 18 नवंबर 2009

कविता: उत्तक

उत्तक

कोशिका से उत्तक बनता है,
जो करते है अंगो का गठन....
अंगों से से बनता है अंग - तंत्र,
सभी मिल करते शरीर का गठन....
संयोजी उत्तक सब अंगों का,
जोड़ कर देता है सहारा....
उत्तक से उत्तक को जोड़ता,
आपस में अंग जोड़ते हमारा....
सभी ऊतक ही अस्थिया है,
जो
शरीर को देती ढांचा है ....
अधिक कठोर होती है ये,
कंकाल खड़ा कर देती है....
पेशी उत्तक शरीर को,
गति प्रदान है करता....
ह्रदय हमारा बिना थके चलता रहता,
जीवन भर हर पल धड़कता रहता....


लेखक: धर्मेन्द्र कुमार, कक्षा ७, अपना घर....

रविवार, 1 नवंबर 2009

कविता फूल

फूल

नीले- पीले हरे रंग- बिरंगे ,
फूल है जैसे हर रंगो से रंगे .....
बाग में फूल है हर रंग के अनेक ,
बाग में है सब एक .....
रंग- बिरंगे हरे नीले- पीले ,
फूल है सभी बाग में खिले ......
सुंदर -सुंदर न्यारे -न्यारे ,
फूल लगे बाग में प्यारे प्यारे .....
नीले -पीले हरे रंग -बिरंगे ,
फूल है जैसे हर रंगों से रंगे....
सुंदर- सुंदर न्यारे- न्यारे ,
फूल है कितने प्यारे -प्यारे ......
लेखक -धर्मेन्द्र कुमार कक्षा अपना घर

सोमवार, 20 जुलाई 2009

कविता:- कोई कुछ सुनता नही

कोई कुछ सुनता नही....
हम जगा रहे थे, कोई जागे तो।
हम डर रहे थे, कोई डरे तो।।
हम बाँध रहे थे, कोई बंधें तो।
हम रुला रहे थे, कोई रोये तो॥
हम हंसा रहे थे, कोई हंसे तो।
हम पढ़ा रहे थे, कोई पढ़े तो॥
हम लिखा रहे थे, कोई लिखे तो।
हम नचा रहे थे, कोई नाचे तो॥
हम घुमा रहे थे, कोई घूमे तो।
हम नहला रहे थे, कोई नहाये तो॥
हम खिला रहे थे, कोई खाए तो।
हम बुला रहे थे कोई आए तो॥
हम मुस्करा रहे थे, कोई मुस्कराए तो।
हम सुला रहे थे, कोई सोये तो॥

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

बुधवार, 15 जुलाई 2009

कवि़त:- अंगूठा

अंगूठा
अंगूठा है कितना अच्छा
साथ है देता हरदम सच्चा
सब अंगुलियों से है मोटा
नही निकलता कभी ये खोटा
अगर अंगूठा ये होता
जीवन कितना मुश्किल होता॥
ये है जीवन का किरदार
अँगुलियों का है सरदार
अँगुलियों से सब खाते है
अपन काम निपटाते है

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ७, अपना घर

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

कविता:- चोर नेता और सिपाही

चोर नेता और सिपाही
पुलिस खड़ी है थाने में।
चोर है जेल के खाने में॥
पुलिस है डंडा लेकर खड़ी।
मूछे है उनकी बड़ी-बड़ी॥
पुलिस का है डंडा जब पड़ा।
चोर बड़ा गुस्से से खड़ा॥
गाँव में की जब चोर ने चोरी।
थाने ने उसके नाम की फाईल खोली
तब संसद में बैठा नेता।
झट उसने जब पैसा फेंका॥
फाईल झट से बंद हो गई।
चोरो पर कार्यवाही ख़त्म हो गई।।
चोर नेता और सिपाही
आपस में ये सभी है भाई॥

अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर

शनिवार, 11 जुलाई 2009

कविता: पुस्तक

पुस्तक
पुस्तक कितनी प्यारी है।
इनमें जीवन की कहानी है॥
पढ़ने में लगती प्यारी है।
इनमें मज़ेदार कहानी है॥
कलम से लिखी कहानी है।
लेखकों की जिंदगानी है॥
पुस्तक को बच्चें जब पढ़ते है।
जीवन में हरदम आगे बढ़ते है॥
शिक्षा से जीवन अच्छा बनता है।
खुशी से हरदम बच्चा रहता है

लेखक
: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर


बुधवार, 8 जुलाई 2009

कविता: यादें गाँव और बचपन की

यादें गाँव और बचपन की
याद हमें आती है हर पल अपने गाँव की बातों की
याद हमें आती है हर पल, बचपन की उन बातों की.
गाँव की गलियां, गाँव के रस्ते, खुशबु अपने माटी की.
याद हमें आती है हर पल अपने गाँव की बातों की.
गुल्ली डंडा, चोर सिपाही, कुकडू कू और भाग-भगाई.
चिक्का, कबड्डी, लाली बेटा, खेल थे अपने गांवों की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातो की.
आम के पेडों पर वो चढ़ना, खेल-खेल में लड़ना-झगड़ना.
रात हुई तो जंगल परियां, थे किस्से, कहानी बाबा की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातो की.
फूलों पर तितली को पकड़ना, रात को मिलके जुगुनू पकड़ना.
बारिस होते ही तैराते, कागज की उन नावों की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
भालू का हम नाच देखते, जादू की वो बात सोचते.
ध्यान लगा रहता था दिल में, आइसक्रीम की घंटी की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
भैस के ऊपर चढ़ना-उतरना, बकरी और पिल्ले को पकड़ना.
खेतों की उस पगडण्डी पर, झरबेरी के पेडों की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
लकड़ी की पाटी ले जाना, खट्टी मिठ्ठी इमली खाना.
यारो के संग एक दूजे को, चिढ़ने और चिढ़ाने की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
गाँव के कुत्तो को दौड़ाना, पेडों से बन्दर को भगाना.
चरता गधा मिल जाये तो, मजा थी उसकी सवारी की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
सबके संग में मेला जाना, चोरी-चुपके चाट खाना.
यारो के संग एक दूजे को, हंसने और हँसाने की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
याद हमें आती है हर पल, बचपन की उन बातों की.
गाँव की गलियां, गाँव के रस्ते, खुशबु अपने माटी की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.

महेश, कानपूर

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

कविता: पानी काले बादल में

पानी काले बादल में
नीले नीले आसमान में॥
पानी काले बादल में
बादल है या कोई छाया।
ये तो है प्रकृति की माया॥
कब ये पानी बरसाएगा।
हमको कब तक तरसाएगा॥
जब यह पानी बरसेगा
धरती को पहले सींचेगा॥
हम भी नहायेंगे पानी में।
नाव चलाएंगे नाली में॥
पानी की बुँदे गिरेंगी तन पे।
मेरे मन को लगेंगी छन से॥
पानी में झम - झम कूदेंगे।
हम मस्ती में सब डूबेंगे॥
हम सब झूम के नाचेंगे।
संग में सबके गायेंगे॥
सबके संग नहायेंगे।
पानी से बाहर आयेंगे॥
पानी पाकर धरती होगी हरियाली।
घर- घर में आयेगी खुशियाली

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर, कानपूर



शुक्रवार, 8 मई 2009

कविता:- राजा रानी

राजा रानी
एक था राजा एक थी रानी
दोनों की है अजब कहानी
राजा करता था शिकार।
रानी बनती थी आचार॥
दोनों खाते थे आचार।
अच्छा रहता उनका विचार॥
कभी न पड़ते वे बीमार।
रहते हरदम होशियार॥
एक दिन दोनों में हो गई लड़ाई।
एक दुसरे की करी पिटाई॥
रानी जीती राजा हारा।
राजा के पास बचा न चारा॥
राजा बोला अब न करेंगे लड़ाई।
आओ एक दूजे की करे बड़ाई ॥

ज्ञान कुमार, कक्षा ५, अपना घर