कविता
कितना लम्बा है ये सफर
जहाँ कोई न आता है नजर
न छांव है न है मस्ती की डगर
कास छोटा होता ये सफर
जहां न है कोई घर
बस अति है पड़े ही नजर
बस कैसे भी पार करना है ये डगर
फिर शुरू करते है दूसरा सफर
कितना लम्बा है ये सफर
जबतक पूरा न होगा ये सफर
तबतक कोई दूसरी न चुनेगे डगर
जहाँ कोई न आता है नजर
न छांव है न है मस्ती की डगर
कास छोटा होता ये सफर
जहां न है कोई घर
बस अति है पड़े ही नजर
बस कैसे भी पार करना है ये डगर
फिर शुरू करते है दूसरा सफर
कितना लम्बा है ये सफर
जबतक पूरा न होगा ये सफर
तबतक कोई दूसरी न चुनेगे डगर
नाम- सुल्तान
कक्षा -12
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