बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

कविता: जो है सही

"जो है सही"
 
अब हवा क्यों नहीं चलती, 
अब चिड़िया क्यों नहीं चहकती |
छोटे बच्चे मुस्कराते क्यों नहीं, 
ये समय रुका क्यों नहीं |
अब मेरी भी सुन लो, 
जो कह रहा हूँ सही | 
ये सूरज क्यों नहीं कुछ कहता, 
चंदमा क्यों नहीं चमकता |
समुद्र की लहरें क्यों नहीं गाता, 
अब फूल क्यों नहीं महकता |
अब मेरी भी सुन लो, 
जो कह रहा हूँ सही | 
फैक्ट्रियां अब चलेगी नहीं, 
कोई कूड़ा अब होगा नहीं | 
सारी गन्दगी करो सही, 
चाहे वो फैला हो कंही |
अब सबसे कहना है यही, 
करो मिलकर गंदगी सही |

कवि: देवराज, कक्षा 7th, अपना घर, कानपुर

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

कविता: मन

"मन"
वो मन बेचैन हमारा,
क्या करे दिन में काम का मार |
मन मारकर बैठा प्यारा,
थक हुआ सा हो जाता |
मन भी वक्त में काम आता,
दिमाग से वह तनाव में हो जाता |
पता न किस बीमारी से ग्रस्त हो जाता,
हर किसी को त्रस्त कर जाता |
मन है ये मन का मारा,
वो मन बेचैन हमारा |
कवि: राज, कक्षा 7th, अपना घर, कानपुर

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017


ओस की बूँद जैसी निर्मल ,
फूलों की पंखुड़ियां है कोमल/
तितली की वह सहेली  है ,
लगती एकदम अकेली है/
रेशम की जैसी नाजुक डोर ,,
चमकीली सी एक भोर/
 मद्धिम बयार के साथ
एक अनकही सी बात।
ओस की  बूँद सी निर्मल।

रविवार, 8 जनवरी 2017

आज़ाद 
में आज़ादी का तूफान उठ रहा है ,
सागर की तरह ये मचल रहा है /
आज़ादी तो तूने दिलाई खुद को मिटाकर ,
खुशियां भीदिलों  अपनी बेचीं बुराई को मिटाकर /
तब जाके  तूने मौत को गले लगाया ,
हम सभी को आज़ादी दिलाया /
कहते तो सभी है पर करते नहीं ,
करते वही है जो बुराई से डरते नहीं /
ऐसा ही था यार अपना ,
कहते हैं वो था आज़ाद हमारा /
नाम=विशाल कुमार
कक्षा = 7th 

शनिवार, 7 जनवरी 2017

iccha ki

  • इच्छा की राहों में मैं चलना चाहा । 
  • बारिस की बूंदे की तरह बिखरना चाहा ।  
  • इच्छा तो बहुत हुई की भगत सिंग 
  • राजगुरु की तरह आंदोलन में कूद जाऊ 
  • नेहरू की तरह नेता बनकर राजगदी में बैढ़ जाऊ । 
  • इच्छा की बल पर चलना चाहा 
  • संग्घर्ष और है जज़्बो कि है 
  • जरुरत । 



  •          राज कुमार 

  •               अपना घर 

ye kale kale badal

ये काले काले बा
गरज गरज कर कुछ 
कहना चाहते  है । 
दल शायद हमारे है 
बूंदे के बुछार  से मन बहलाते  है ;
क्या ये हमको बुलाते है। 
दूर खड़े रह   कर रहू  तो  मन ललचाता 
एक बार भीग जाऊ  मन बहल जाता है। 


                    देवराज कुमार 
                   अपना घर 
ईद 
आओ भाई ईद मनाएं 
हिन्दू मुस्लिम को भूल जाएं 
मिलकर हम खुशियां मनाएं 
वर्षों से था इंतजार 
आई है ईद वर्षों बाद 
वर्षों की घडी ख़त्म हुई 
अब आई ईद मत करो इंतजार 
नाम = नितीश 
बारिश 
ये सुनहरे बूंदे कह रही हैं ,
मौसम बड़ा मस्ताना है /
आयो मेरे साथ खेल कूद कर तुम्हे नहाना है ,
हर बूँद का मजा तुन्हें उठाना है /
पता नहीं हम कब चलें जाए ,
सूरज को ही फिर आना है /
हर बूँद के साथ तुम्हें नहाना है ,
फिर बताओगे वाह भाई मौसम मस्ताना है /
नाम = विक्रम कुमार

कक्षा 6th 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

बारिश 
डाकिया बन के जब मोर आया ,
पंख से अपने इशारे लाया /
इसका मतलब आसमान में, 
काले घना बादल छाया /
बच्चों का मन बहलाते, 
एक बूँद धरती पर आया 
घना बारिश को देख-देखकर /
मेरा मन यूं ललचाया 
तन पे पड़ी बूँदें टप टप /
फिर रोक न मुझको कोई पाया 
बारिश में उछल कूदके 
बच्चों ने आनंद उठाया /
नाम = देवराज 

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

तू कितना जरुरी है 


  तू कितना जरुरी है
तेरे बिन सम्मान अधूरी है । 
बदन ढका है तेरे सहारे 
तुछे पहनती दुनिया सारी 
तेरे बल पे भिखारी बन जाऊ 
तेरे बल पे आदर्श मैं पाऊ 
तुछे से बचती सबकी लाज 
तुझ से सजती सर पर ताज 
इसे समझना न तू बकरा 
ये त सिम्पल सा है कपडा । 



            नाम  =देवराज 
                 अपना घर 

बुधवार, 4 जनवरी 2017

तारे 
आसमान के तारे लगते प्यारे ,
बच्चों से है दूर तारे /
मन करता छू ले तारे ,
बिखरे हैं आसमान में तारे /
बच्चों को ललचाते तारे, 
रात में जगमगाते तारे /
सपने में मिलते तारे,
सुबह नहीं दिखते तारे /
नाम = नितीश कुमार 

सफलता 
उभरते-उभरते आसमान में पहुंचे ,
पर मंजिल बाकि है /
लड़खड़ाते -लड़खड़ाते खड़े हुए 
पर चलना बाकि है /
सरे सरहदों को पर करके 
हमीं बनानी है अपनी दुनियां /
क्योंकि अत्याचारी की नहीं है कमी यहाँ ,
अच्छाइयों के तरफ सिकनी है इस दुनियां को /
भगानी है बुराइयों को 
सफलता दिखानी है बच्चों को /

नाम =देवराज 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

आम 
यह मौसम है आम  खाने का 
यह  मौसम है नहीं काम करने का /
गर्मी में आम खाते -खाते  हो जाते हैरान ,
 गर्मी में काम करते -करते हो जाते परेशान /
यह मौसम है आम खाने का ,
यह मौसम है नहीं काम करने का /
  नाम =  प्रभात कुमार 
   कक्षा = 6th 

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

गर्मी 
चीखती है जिंदगी हमारी ,
गर्मियों की चलती  हवाओं में /
चल रही है जिंदगी हमारी ,
सूखे एक बूँद पानी में/
नहीं चलती थी हवाएं ,
आज से पहले किसी ज़माने में/ 
क्यों किया था ऐसा काम,
 जो सहना  पड़ा 40 का तापमान /
ये गर्मी की हवाएं होठों की मुश्कान चुरा जाती है 
हँसना चाहा तो पेट में रह जाती है /  
           नाम= अखिलेश कुमार 
            कक्षा = 6th 

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

मौका 
हमको मौका देकर देखो ,
हम पैरों पर खड़े  जायेंगे /
कुछ करने की इजाज़त दो ,
हम वो कर  दिखलायेंगे /
हमें जरूरत है हौसलों की ,
हम दुनिया को बदल आएंगे /
हमको भी एक  राह दो ,
आसमाँ छूकर आएंगे 
बादलों में रहना सीखेंगे
चाँद इज़ाज़त दे तो, 
तारों पर  बैठ जाएंगे /
एक बार तो मौका दो ,
हम सूरज बन जाएंगे /
हर एक अँधेरे के साये में ,
रौशनी हम फैलाएंगे / 
नाम =देवराज कुमार 
कक्षा = 6th 

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

बच्चे 
गुलाब की पंखुड़ियों जैसे,
कोमल होते है बच्चे /
हँसते  ,मुश्कुराते हैं  जब वे, 
तो लगते है माशूम बच्चे /
फूलों की खुशबू जैसे ,
झरनो की लहरें जैसे /
एक हंसी दिखा दे तो ,
जग के हँसते है बच्चे /
दुनियां की हर ख़ुशी ,
न हो कभी वे दुखी /
न हो उनके लिए सर्दी ,
बस प्यार की हो गर्मी/ 
नाम =राज कुमार 
कक्षा = 7th 

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

जिंदगी
छोटी सी जिंदगी हमारी
छोटी सी ख़ुशी हमारी
खुशियों को छुपाना मौसम की तरह
खुशियों को गुजरना लम्हों की तरह /
छोटी सी जिंदगी हमारी ,
नाम=नितीश