सोमवार, 21 जनवरी 2019

कविता : भगवान मेरा कसूर क्या है

" भगवान मेरा कसूर क्या है "

हे भगवान मेरा कसूर क्या है,
मैंने ऐसा किया ही क्या है |
हे भगवान् मेरा कसूर क्या है,
छोटी से ही सड़क पर पला हूँ |
रो - रोकर सुखाया अपनी गला है,
बड़े नसीब से पिने का पानी मिला है |
गर्मियों में एक बूँद ठंडे पानी के खातिर,
घर घर भटकती फिरती हूँ |
कहीं अगर जूठी बोतल मिले,
झट से पानी पि जाती हूँ |
श्रुति ऋतुओं का भी क्या,
हे भगवान मेरा कसूर क्या है |

कवि : देवराज कुमार , कक्षा : 8th , अपना घर



कवि परिचय : यह हैं देवराज जिन्होंने यह कविता लिखी है | देवराज को हमेशा कुछ सिखने की ललक रहती है | देवराज को कवितायेँ लिखने का बहुत शौक है और लगभग इन्होने बहुत सी कविताये लिख चुके हैं | देवराज डांस भी बहुत अच्छा कर लेते हैं |




शनिवार, 19 जनवरी 2019

कविता : लोग सो रहे

" लोग सो रहे "

इस मुल्क के लोग सो रहे हैं,
इस मुल्क के लोग सो रहे हैं |
और जो कुछ नहीं कर रहे हैं
वो इस मुल्क में हँस रहे हैं |
जहन के जज्बात खो गए,
जहन की आवाज़ गूंज रही है |
और जिसका जहन नहीं है,
वो जहन नहीं ज़हर रह गए |
हँसी तो दूर की बात है,
लोग तो हँसते भी नहीं |
अरे !खो गया है वो नगमा,
जो लोगों के जहन में बस्ता था |
अरे ! बह गया है वो आँसू,
जो कभी मोती बनता था |
यह मैं नहीं कह रहा हूँ मेरे यार,
यह तो उन लोगो की आँखों में हैं |
जो कभी गले लगाकर ईद,
की बधाइयाँ दिया करते हैं |
और कभी दीवाली की रात को मिलकर,
साथ में दिया जलाया करते थे |

कवि : विशाल कुमार , कक्षा : 9th , अपना घर

कवी परिचय : यह कविता विशाल के द्वारा लिखी गई है | विशाल अपने काम को हमेशा समय से पूरा करते हैं और उसको खूब अच्छे से निभाते हैं | विशाल पढ़लिखकर एक रेलवे इंजीनियर बनना चाहते हैं |

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

कविता : हे प्रभु

" हे प्रभु "

हे प्रभु तू सुन मेरी पुकार,
फिर से बना दे ख़ूबसूरत संसार |
इंसानों के अंदर भर दे प्यार,
ताकि हर इंसान बन जाए यार |
फूलों की खुशबू को बढ़ा दे,
चाहे तो उसमें चार चाँद लगा दे |
तोड़ने पर न पहुंचे दुःख,
काँटों पर खिलकर भी रहे खुश |
इस संसार को ऐसा बना दे,
सोंचू तो दिल बहला दे |

                                                                                                                कवि : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 9th , अपना घर





कवि परिचय : यह है प्रांजुल जिन्होंने यह कविता लिखी है | प्रांजुल छत्तीसगढ़ के निवासी है और कानपूर में रहकर अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं | प्रांजुल को कवितायेँ लिखना बहुत पसंद है | प्रांजुल पढ़लिखकर एक अच्छे इंजीनियर बनना चाहते हैं |

बुधवार, 9 जनवरी 2019

कविता : बच्चों ने जैसे छोड़ा खेल

" बच्चों ने जैसे छोड़ा खेल "
 "बच्चों ने जैसे छोड़ा खेल "

 "बच्चों ने जैसे छोड़ा खेल "

बच्चों ने जैसे छोड़ा खेल,
खेल ने दिया उन्हें पढ़ेल |
कर दिया उनको मोटा - मोटा,
जिनका सहारा बन गया अब लंगोटा |
करने को पेट का साइज़ छोटा,
परन्तु अब यह उनसे नहीं होता |
पहले जो थे हट्टे - कट्टे,
अब दीखते हैं मोटे - मोटे |
इसका पड़ा स्कूली बच्चों पर असर,
खेल ने निकाली पूरी कसर |
बच्चों ने जैसे छोड़ा खेल,
खेल ने दिया उन्हें पढ़ेल |

कवि : समीर कुमार , कक्षा : 8th , अपना घर


कवि परिचय : यह कविता समीर के द्वारा लिखी गई है और समीर इलाहबाद के रहने वाले हैं | समीर को क्रिकेट से बहुत प्रेम है और उन्हें क्रिकेट खेलना बहुत पसंद है | समीर को क्रिकेट के आलावा कवितायेँ लिखना भी बहुत पसंद है | समीर एक संगीतकार बनना चाहते हैं |





बुधवार, 2 जनवरी 2019

कविता : मम्मी की मार बेकार न था

" मम्मी की मार बेकार न था "

मम्मी की मार बेकार न था,
दादी का प्यार बेकार न था |
बचपन में खिलौनों का खो जाना ,
वो कोई चिंता का बात न था |
घर लाई गई मिठाई में कम मिलना
पर रूठना रूठना था ही नहीं |
हमें तो अब समझ में आया,
नरिजग का मतलब सही |
हर गलत बात पर  सभी चिढ़ाते है,
चिढ तब होती है जब कोई दोस्त,
हमें छोड़कर आगे निकल जाता है |
निकल जाए और पीछे रह जाए,
नाराजगी तो तब  होती है जब,
मंजिल सामने और हम बगल में होते हैं |
नाराजगी तो तब होती है जब,
आपकी रात दिन की मेहनत,
ज़ीरो में तब्दील हो जाती है |

कवि : देवराज कुमार , कक्षा : 8th , अपना घर





कवि परिचय : यह हैं देवराज जिन्होनें यह कविता लिखी है | देवराज को कवितायेँ लिखना बहुत पसंद है और लगभग ये एक शाट कवितायें लिख चुके हैं | देवराज बिहार के नवादा जिले के निवासी हैं और अपना घर में रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं | देवराज को इसके आलावा डांस करना और विज्ञानं से जुड़े प्रयोग करना बहुत पसंद हैं |

कविता : नया साल आएगा

" नया साल आएगा "

शायद गुमशुदा चिड़िया भी जाएगी,
शायद मुरझाए हुए पेड़ भी लहलहाएंगे |
शायद हर चेहरे पर खुशियाँ छाएँगे ,
जब नए उम्मीद के साथ नया साल आएगा |
शायद हर बहन की डोली ख़ुशी से उठेगी,
शायद हर माँ की झोली उम्मीद से भरेगी |
शायद हर घरों में खुशियाँ छाएगी,
जब नए उम्मीद के साथ नया साल आएगा |

कवि : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 9th , अपना घर





कवि परिचय : यह कविता प्रांजुल के द्वारा नए साल के पर्व पर लिखी है | सभी को आजकल नया साल का बहुत इंतज़ार है सोचते होंगें की २०१९ मंगलहो | प्रांजुल इस कविता के माध्यम से सभी भाई /बहन को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं देता है |

कविता : दिल की पुकार

" दिल की पुकार "

जब मैं उदास बैठा था उस पार,
तब मुझे याद आई तेरी यार |
तब मैंने सुनी अपने दिल की पुकार,
मुझे भी बनाना है एक अपना संसार |
जिसमें सिर्फ हो प्यार ही प्यार ,
उसमें एक तू भी हो मेरे यार |
जहाँ हम बाँट सके अपना प्यार,
तू है मेरा इस जहाँ का यार |
जब मैं उदास बैठा था उस पार,
तब मुझे याद आई तेरी यार |

नाम : समीर कुमार , कक्षा : 8th , अपना घर


कवि परिचय : यह हैं समीर जिन्होंने यह कविता लिखी है | समीर को कवितायेँ लिखना बहुत पसंद है और लगभग अब तक बहुत सी कवितायेँ लिख चुके होंगें | समीर इसके अलावा गीत गाना , क्रिकेट खेलना बच्चों के साथ हंसी मज़ाक और उनको पढ़ाना बहुत पसंद हैं |

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

कविता : छोटी सी खुशियाँ

" छोटी सी खुशियाँ "

ये छोटी सी खुशियाँ ,
मेरी जिंदगी में रंग लाएगी |
ये छोटी सी मंजिल ,
मेरी जिंदगी को बनाएगी |
ये छोटी सी महक ,
पूरे संसार में खुशबू फैलाएगी |
ये छोटी सी रौशनी,
मेरी जिंदगी में राह दिखाएगी |
ये छोटी सी कोशिश,
हर किसी की जिंदगी बनाएगी |
यह कठिनाई का रास्ता,
राही को चलना सिखाएगी|
ये छोटी सी खुशियाँ ,
मेरी जिंदगी में रंग लाएगी |


नाम : सार्थक कुमार , कक्षा : 8th , अपना घर

कवि परिचय : यह कविता अपना घर के छात्र सार्थक के द्वारा लिखी गई है | सार्थक कक्षा 8 का विद्यार्थी है  | सार्थक को क्रिकेट खेलना बहुत पसंद है और लोगो से बातचीत करना भी बहुत पसंद है | सार्थक पढ़ने में बहुत होशियार और कक्षा में दोस्तों के साथ साथ अच्छा बर्ताव है | सार्थक के माता - पिता ईंट भट्ठों में ईंटे पाथने का काम करते हैं |

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

कविता : जिसे मैं देख न सका

" जिसे मैं देख न सका "

क्या वो चीज है,
जिसे मैं देख नहीं सका |
आँखों के पलकों से गुजर गया,
 ये ठंडी हवा का झोका था |
जिसे मैं देख न सका | |
चन्द्रमा जैसी मुस्कान थी,
खुशियों की बौछार थी |
जिसे मैं देख न सका |
ये माँ का गोद था,
जिस पर मैं खो गया था |
जिसे मैं देख न सका | |

कवि : कुलदीप कुमार , कक्षा : 7th , अपना घर



मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

poem : life

" Life "

In a dark room,
our life is locked. .
in which we strike,
when we will try to walk.

in this bad situation,
can you survive.
it's worse imagination,
a life without a goal.
it like a person sitting,
in a corner of floor wall.
in which not innovation of soul,
for example as a playing doll.

Poet : Devraj  kumar , Class : 8th , Apna Ghar




Introduction : This poem is belongs to Devraj of clas 8th .  He is such a nice guy he always try to find new things which other one thought normally . He interested in science and recently he made a speaker for their dance practice .


रविवार, 16 दिसंबर 2018

कविता : गर्मी

" गर्मी "

ये तपती हुई गर्मी,
जैसी उलग रही हो आग |
दिन पे दिन बढ़ता है पारा,
इस गर्मी में क्या करें |
ये मनुष्य भी बेचारा,
दिन भर मनुष्य करते काम |
न धूप का पता,
न गर्मी का अहसास |
सारा दिन झेलता इसकी मार,
इससे मनुष्य हो जाते परेशान |
लेकिन गर्मी कम होने का नाम न लेती,
पूरे गर्मी भर केवल गर्म हवा है देती |   

कवि : नितीश कुमार , कक्षा : 8th , अपना घर


कवि परिचय : यह है नितीश जिन्होंने यह कविता लिखी हैं | नितीश मुख्य रूप से बिहार के निवासी है परन्तु अपना घर में रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं | कवितायेँ लिखना बहुत पसंद है और वह अभी तक बहुत सी कविताएँ लख चुके हैं | नितीश पढ़ लिखकर एक रेलवे डिपार्टमें में काम  करना चाहते हैं | हमें उम्मीद है की नितीश आगे चलकर एक महान कवि बनेंगे |