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सोमवार, 14 सितंबर 2009

कविता: कंप्यूटर

कंप्यूटर
कंप्यूटर है ये कितना अच्छा,
चलाता है इसको बच्चा बच्चा...
कंप्यूटर होते है बहुँत प्रकार,
अलग अलग होते है इनके आकार...
बहुँत सारा होता है डाटा स्टोर,
करता नही है ये शोर...
छोटा सा होता है माऊस एक,
जो करता है काम अनेक...
कंप्यूटर है ये कितना अच्छा,
चलाता है इसको बच्चा बच्चा...
छोटा सा होता है माऊस एक,
जो करता है काम अनेक...
लेखक: धर्मेन्द्र कुमार, कक्षा , अपना घर

रविवार, 6 सितंबर 2009

कविता: लालू आलू और भालू

लालू आलू और भालू

असली है घोड़ा, उस पर बैठा मोड़ा,
जा पहुँचा वह अल्मोडा...
वहा पर खाया उसने केला,
फ़िर देखा दशहरे का मेला...
मेले में ख़रीदा उसने आलू,
मोड़ा के पीछे पड़ गया भालू...
छोड़ के भागा फ़िर वह आलू,
तब तक गए पूर्व रेलमंत्री लालू...
लालू ने भी ख़रीदा आलू,
उनके पीछे पड़ गया भालू...
लालू को लगा बड़ा ही झटका,
तब तक भालू ने उनको दे पटका...
लालू को जोर से गुस्सा आया,
जल्दी से उसने पुलिस बुलाया...
भालू की जेल में हुई पिटाई,
भालू ने अस्पताल में दवा कराई...

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

बुधवार, 26 अगस्त 2009

कविता: बन्दर और कलेंडर

बन्दर और कलेंडर

आसमान में टंगा कलेंडर,
उसको पढ़ रहे थे हाथी बन्दर....
आसमान से गिरा जब बन्दर,
चिपका गया धरती के अन्दर
धरती के अन्दर थे तीन बन्दर,
तीनों ने मारे जम के थप्पड़ ...
बन्दर भगा किचन के अन्दर,
खाने लगा घी और मक्खन....
लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ८, अपना घर

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

कविता: रक्षाबंधन त्यौहार

रक्षाबंधन त्यौहार

आज बुधवार है,
नानकारी का बाजार है...
बाजार का झोला तैयार है,
आज मेरी सोच बेकार है...
आज तो रक्षा बंधन त्यौहार है,
राखी हाथ में बंधने को तैयार है..
राखी हम पहले बंधावायेंगे,
बाजार
फ़िर बाद में जायेंगे...
खूब जम के मिठाई खायेंगे,
मिलके खुशियाँ मनाएंगे...
लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

बुधवार, 12 अगस्त 2009

कविता: सब्जी की गाड़ी

सब्जी की गाड़ी

आलू बैगन की थी गाड़ी,
उसमें बैठी दस सवारी...
पहिया बने थे धनिया भइया,
हार्न बनी थी लौकी...
स्टेरिंग बने थे कद्दू जी,
गेयर बनी थी मूली...
लाइट बने थे लाल टमाटर,
दिन में बैठे थे मुंह बंद कर...
जैसे ही अँधेरा घिर आता,
चलते थे अपना मुंह खोलकर...
सीट बने थे गोभी जी,
ड्राईवर बने थे शलजम जी....
एक दिन की हम बात बताएं,
सभी जरा सा गौर से सुनिए...
शाम को सूरज ढलने को आया,
चारो तरफ़ अँधेरा छाया...
आपस में दो गाड़ी लड़ गई,
एक दूजे से दोनों भिड गई
एक थी लकड़ी की गाड़ी,
दूजी थी सब्जी की गाड़ी...
सब्जी की गाड़ी टूट गई,
अलग - अलग वो छिटक गई...
सवारी सारे कूद पड़े थे,
गाड़ी से वे दूर खड़े थे...
सबने मिलकर सब्जी को उठाया,
घर ले जाकर सबको बिठाया...
घर में सबने सब्जी बनाया,
बच्चे बूढे सबने मिल खाया...

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

कविता: रसीले आम

रसीले आम

आम क्या है ये रसीले,
पेड़ों पर लगे है पीले-पीले...
सोच रहे है कब जोर से हवा चले,
पीले रसीले आम खाने को मिले...
आम का अब समय आया है,
खट्टे-मीठे आम खाने को जी ललचाया है...
पेड़ों पर लगे है कच्चे-पक्के आम,
बाजारों में इनके कितने महंगे दाम...
आम क्या है ये रसीले,
पेड़ों पर लगे है पीले-पीले ...

लेखक: धर्मेन्द्र कुमार, कक्षा , अपना घर

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

कहानी: दो दोस्त और जंगल का राक्षस

दो दोस्त और जंगल का राक्षस

बहुत समय पहले की बात है की एक छोटा सा गाँव था, उसी गाँव में दो मित्र रहते थेएक का नाम था गंगू और दूसरे का नाम छंगू थागंगू चालक और बुद्धिमान था, क्योंकि वह पढ़ने जाता था, पर छंगू ही चालाक था ही बुद्धिमानवह बिल्कुल अनपढ़ और भोला था, यहाँ तक की उसने स्कूल का मुंह भी नही देखा थाघर में गरीबी होने के कारण वह पढ़ सका और छोटी उम्र में ही काम करने लगागंगू हमेशा छंगू के सामने अपना घमंड दिखाया करता था कि मै तुमसे कितना चालाक और बुद्धिमान हूँ, मगर छंगू कभी भी इन बातों का बुरा नही मानता थावो कहता था हा यार मै अनपढ़ भला कैसे बुद्धिमान हो सकता हूँ समय के साथ धीरे -धीरे दोनों मित्र बड़े हो गएएक दिन दोनों मित्रों ने आपस में बात की, कि चलो कंही घूमने चलते हैछंगू ने कहा कि चलो आज उस पास के जंगल में चलते हैदोनों मित्र टहलते-टहलते गाँव से दूर उस जंगल में गए, चारो तरफ़ घने पेड़ के जंगल थेगर्मी बहुत तेज थी गंगू को तेज प्यास लगी, गंगू कहने लगा अगर थोडी देर में मुझे पानी नही मिला तो शायद मै प्यास से मर जाऊछंगू ने गंगू को एक पेड़ के छाये में लिटा दिया और ख़ुद पानी ढूढ़ने के लिए जंगल कि तरफ़ चल दियाभटकते- भटकते आखिरकार वो एक कुएं के पास पहुँच ही गयाउस कुएं के पास के पेड़ पर दो बड़े राक्षस रहते थेकुएं का पानी मुहं तक लबालब भरा था, छंगू को भी अब तक प्यास लग गई थीवो झुक कर पानी पीने लगा, पानी पीने कि आवाज सुनकर पेड़ से दोनों राक्षस धड़ाम से जमीं पर कूद पड़ेछंगू अचानक आवाज सुनकर थोड़ा डर गया उसने पीछे देखा तो दो बड़े राक्षस खडे थेदोनों राक्षस ने छंगू से पूछा कि तुम कौन हो और यंहा पर क्या कर रहे होछंगू बहादुर था उसने बिना डरे बताया कि मेरा नाम छंगू है, और मै पास के गाँव का रहन वाला हूँमै और मेरा दोस्त गंगू आज इधर घूमने आये थेमेरा दोस्त अभी प्यास से बेहाल होकर पेड़ के पास पड़ा है, मै उसके लिए पानी लेने आया हूँछंगू के निडरता और दोस्त के लिए प्यार देखकर दोनों राक्षस बहुत खुश हुए , दोनों राक्षसों ने कहा कि हम दोनों भी दोस्त है और हम दोनों एक दूसरे के लिए जान भी दे सकते हैउन्होंने छंगू को एक बर्तन में पानी तथा ढेर सारे मिठाई, फल दिए, और कहा अपने दोस्त को खिलाना और हमेशा अच्छे दोस्त बनकर रहनाछंगू पानी और मिठाई लेकर गंगू के पास पंहुचा, उसे पानी पिलाया और फ़िर दोनों ने जमकर मिठाई औरफल खाया, साथ ही छंगू ने गंगू को उन दोनों राक्षस कि बात भी बताई कि किस तरह पानी लेते हुए वे दोनों भले राक्षस गए थे, और उन्होंने ने ये फल और मिठाई दिएगंगू को कहानी सुनते - सुनते आँखों से आंसू गए कि किस तरह छंगू ने अपने जान की परवाह करते हुए उसकी जान बचाई, साथ ही गर्व भी हुआ कि उसका दोस्त कितना बहादुर हैमगर अपने पर शर्मिंदा होने लगा कि मै किस तरह छंगू को नीचा दिखता था, और अपने पर घमंड करता थागंगू रोते हुए अपने गलतियों के लिए छंगू से माफ़ी मांगने लगा, छंगू ने उसे गले लगाते हुए कहा धत पगले दोस्तों में माफ़ी मांगते है, इतना कहते-कहते छंगू के भी आँखों से आंसू टपकने लगेदोनों दोस्त वापस अपने गाँव आये और खूब मजे से प्रेम पूर्वक रहने लगे

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

बुधवार, 29 जुलाई 2009

कविता: कालू बन्दर

कालू बन्दर

एक था कालू बन्दर,
रहता था नाले के अन्दर...
एक दिन खा रहा था चुकंदर,
मस्ती में था नाले के अन्दर...
उतने में एक सांप आया,
उसने अपना फन जो उठाया...
बन्दर जी की घिघ्घी बन गई,
हालत उनकी पतली हो गई...
कालू बन्दर भागे अन्दर,
उनके हाथ से गिरा चुकंदर...
आगे मिल गई नागिन रानी,
बोली बन्दर भैया पीलो पानी...
कालू बन्दर नाले से भागे,
पेड़ पर चढ़ कर जम के हाफें...
याद गई बन्दर को नानी,
खत्म हो गई अपनी कहानी...

लेखक: मुकेश, कक्षा ८, अपना घर

कविता: रात का अँधेरा

रात का अँधेरा

रात का अँधेरा था,
पास के घर में उजेला था...
ऐसा लग रहा था,
जैसे कोई पढ़ रहा था...
मन में मै डर रहा था,
अपने आप से लड़ रहा था...
भूत है ये मन कह रहा था,
अँधेरा और बढ़ रहा था...
मै चद्दर ओढ़ कर सो गया,
सपनो में जाके खो गया...
सपनो में परियाँ थी,
फूलों की बगिया थी...
तभी अचानक सूरज उग आया,
चारो ओर उजाला फैलाया...
उजाले में सबने की पढ़ाई,
और मैंने ये कविता बनाई...
लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर


मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कविता: जीवन

जीवन

जीवन के हर उमंगों से,
तितली उसके पंखों से...
आसमान में उड़ती नीली- पीली पतंगों से,
यह धरती है तो मनुष्यों से...
पक्षियों से , जीव- जंतुओं से,
आसमां के हर तारों -सितारों से...
अगर जीवन है तो पेड़-पौधों से,
सूरज से, चन्दा की रोशनी से...
हवा से, मिटटी से, पानी से,

शान्ति से, दोस्ती से, मोहब्बत से...
जीना है तो जियो मुस्करा के,
मरना है तो मरो मुस्करा के...

लेखक: आदित्य, कक्षा ७, अपना घर

कविता: बारिस का मौसम आया

बारिस का मौसम आया

बरसात का है ये मौसम आया,
हरियाली से धरती को है सुंदर बनाया...
बरसात हुई तो पक गई जामुन,
खाने में लोगों को बड़ा मजा आया...
बरसात में हरी भरी घास से,
क्यारियों को लोगों ने खूब सजाया...
रंग बिरंगे सुंदर फूलों ने मिलकर,
इस संसार को है ऐसा महकाया...
आज हुई है जमकर खूब बरसात ,
सब लोगों ने मिलकर खूब नहाया...
बरसात का है मौसम आया,
धरती को है सुंदर बनाया...

धर्मेन्द्र कुमार, कक्षा ७, अपना घर

सोमवार, 27 जुलाई 2009

कविता:- लोगों के विचार

लोगों के विचार
लोगों की वाणी अनेक विचार वाली,
कभी अच्छी तो कभी बुरी वाली...
घर में बैठा था सांप,
काले -सफेद थे उसके दाग....
लोगों ने जब उसको देखा,
घर से निकाल फेंका...
जब घर के बाहर लोगों ने देखा,
झट से उनके मुंह से निकला...
महीना है सावन का,
भोले शंकर दानी का....
सर्प को मारो
मत,
उसको छेड़ों मत...
सांप तब तक ईट में चला गया,
लोगों को चिंतित छोड़ गया...
सर्प कुछ देर में बाहर निकला,
लोगों के मुंह से फ़िर वाणी निकला...
छोटे - छोटे बच्चे घर में,
निकलेंगे जब अंधरे में....
ये बच्चों को काटेगा,
मौत सभी को बाँटेगा...
झट से इसको खत्म करो,
आग लगा के भस्म करो....
अच्छी लगी कभी बुरी लगी,
लोगो की वाणी कैसी लगी.......

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा ७, अपना घर



सोमवार, 20 जुलाई 2009

कविता:- कोई कुछ सुनता नही

कोई कुछ सुनता नही....
हम जगा रहे थे, कोई जागे तो।
हम डर रहे थे, कोई डरे तो।।
हम बाँध रहे थे, कोई बंधें तो।
हम रुला रहे थे, कोई रोये तो॥
हम हंसा रहे थे, कोई हंसे तो।
हम पढ़ा रहे थे, कोई पढ़े तो॥
हम लिखा रहे थे, कोई लिखे तो।
हम नचा रहे थे, कोई नाचे तो॥
हम घुमा रहे थे, कोई घूमे तो।
हम नहला रहे थे, कोई नहाये तो॥
हम खिला रहे थे, कोई खाए तो।
हम बुला रहे थे कोई आए तो॥
हम मुस्करा रहे थे, कोई मुस्कराए तो।
हम सुला रहे थे, कोई सोये तो॥

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर