सांप लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सांप लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 29 जुलाई 2009

कविता: कालू बन्दर

कालू बन्दर

एक था कालू बन्दर,
रहता था नाले के अन्दर...
एक दिन खा रहा था चुकंदर,
मस्ती में था नाले के अन्दर...
उतने में एक सांप आया,
उसने अपना फन जो उठाया...
बन्दर जी की घिघ्घी बन गई,
हालत उनकी पतली हो गई...
कालू बन्दर भागे अन्दर,
उनके हाथ से गिरा चुकंदर...
आगे मिल गई नागिन रानी,
बोली बन्दर भैया पीलो पानी...
कालू बन्दर नाले से भागे,
पेड़ पर चढ़ कर जम के हाफें...
याद गई बन्दर को नानी,
खत्म हो गई अपनी कहानी...

लेखक: मुकेश, कक्षा ८, अपना घर

सोमवार, 27 जुलाई 2009

कविता:- लोगों के विचार

लोगों के विचार
लोगों की वाणी अनेक विचार वाली,
कभी अच्छी तो कभी बुरी वाली...
घर में बैठा था सांप,
काले -सफेद थे उसके दाग....
लोगों ने जब उसको देखा,
घर से निकाल फेंका...
जब घर के बाहर लोगों ने देखा,
झट से उनके मुंह से निकला...
महीना है सावन का,
भोले शंकर दानी का....
सर्प को मारो
मत,
उसको छेड़ों मत...
सांप तब तक ईट में चला गया,
लोगों को चिंतित छोड़ गया...
सर्प कुछ देर में बाहर निकला,
लोगों के मुंह से फ़िर वाणी निकला...
छोटे - छोटे बच्चे घर में,
निकलेंगे जब अंधरे में....
ये बच्चों को काटेगा,
मौत सभी को बाँटेगा...
झट से इसको खत्म करो,
आग लगा के भस्म करो....
अच्छी लगी कभी बुरी लगी,
लोगो की वाणी कैसी लगी.......

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा ७, अपना घर