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गुरुवार, 11 नवंबर 2010

कविता: चलो रण भूमि पर

चलो रण भूमि पर

उठो मेरे भारत वासी,
करो न तुम अब देरी।
लेकर इस वतन की मिट्टी,
बांध लो अपनी मुट्ठी ।
अपने पथ पर चलते हुए ,
पहुचो रण भूमि पर।
आज दुश्मन है अपना ही कोई ,
जो देश को चला रहे है ।
जो लूट रहे है खसोट रहे है,
देश की मिटटी पानी को बेच रहे है।
आज करो तुम अपनी माटी की रक्षा,
चुकी खतरे में हैं आज अपनी यह भूमि।


लेख़क : अशोक कुमार
कक्षा : ८
अपना घर , कानपुर

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

कविता: क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह

इसके बारे में तुम्हे पता है क्या

बना बना कर तमाम फैक्टरिया,
क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह
इस धरती को कर रहे हो ख़राब,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या ?
इन फैक्टरियों से निकलता धुआं,
पर्यावरण को असंतुलित बना रहा
जल जमीन वायु प्रदूषित हो रहा,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या ?
साँस लेने में हो रही है घुटन सी,
मन बेचैन और आँख में जलन सी
बड़ी नदिया भी दिख रही नाला सी,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या ?
इन्सान ने ये कौन सा रोग पाला,
जिन्दगी को मौत के मुहं में डाला
हरे भरे जंगल को बंजर बना डाला,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या?
बना बना कर तमाम फैक्टरिया,
क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह
लेखक: सागर कुमार, कक्षा ६, अपना घर


बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

कहानी: चूहा और बिल्ली कि दोस्ती

चूहा और बिल्ली कि दोस्ती

एक बार कि बात है कि एक बिल्ली थी, जिसक नाम बाटी था और एक चूहा जिसका नाम चोखा था। उन दोनों में बहुँत अच्छी दोस्ती थी। वे जँहा भी जाते एक साथ जाते और एक दूसरे के ऊपर मुसीबत जाने पर सहायता करते थे। एक दिन बिल्ली किसी के घर दूध पीने गई। उसने देखा कि दूध भरा हुआ कटोरा रसोई घर में हुआ है, वो रसोई घर में घुस गयी, तभी चूहा भी पीछे से धमका, बाटी ने दूध कटोरा गिरा दिया। दूध जमीन पर गिर गया बाटी और चोखा दोनों मस्त होकर दूध पीने लगे। थोड़ी देर में चूहे का पेट भर गया वो एक तरफ जाकर आराम फरमाने लगा। तभी बाटी के ऊपर किसी ने जाल डाल दिया, और उसे जाल में बांधकर रसोईघर के एक कोने में रखदिया। उस आदमी के जाने के बाद चोखा धीरे से बाहर आया और बाटी को आजाद करने के लिए जल्द से उस जालको काट दिया, और बाटी को मरने से बचा लिया। घर का कोई आदमी फिर आकर मारे उससे पहले दोनों वंहा से भाग लिए। इस तरह से चूहे ने बिल्ली कि जान बचा ली और अपनी मित्रता कि शान बढा ली।

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

कविता: तुलसी प्यारी

तुलसी प्यारी

कितनी न्यारी कितनी प्यारी,
बड़ी सुन्दर है इसकी क्यारी
छोटी छोटी इसकी डाली,
खिल रही देखो हरियाली।
लगती है ये बड़ी ही प्यारी,
इसकी पत्ती बड़ी ही न्यारी।
इससे बनती दवा है सारी,
इसकी खुश्बू बहुत ही प्यारी।
इसका नाम है बड़ा ही प्यारा,
तीन अक्षर का नाम है सारा।
सभी प्यार से कहते तुलसी,
सबके आंगन में रहती तुलसी।
कितनी न्यारी कितनी प्यारी,
जिसको चाहे दुनिया सारी।

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

कविता : पान ने बनाया सबसे बड़ा "डान"

पान ने बनाया सबसे बड़ा " डान "


एक था पान का पत्ता
दिखने में लगता जैसे लत्ता
सब इसको खाते कलकत्ते में,
अधिक दबाते इसको मुंह में।
पान सबका मुंह करता लाल,
तब तक मेरे फोन में आई काल।
हमने उठाया और बोला कौन ?,
उसने बोला मै हूँ मुंबई का " डान"।
फिर मैंने बोला अरे चुप हो जा मौन,
मै हूँ इस भारत का सबसे बड़ा " डान" ।

लेखक: चन्दन कुमार, कक्षा ४, अपना घर

कविता: चिड़िया के घोसले में अंडा

चिड़िया के घोसले में अंडा

एक दिन मैंने देखा था ,
चिड़ियों के घोसले में अंडा था ।
उस अंडे में बच्चे थे,
बच्चे सबसे अच्छे थे।
चिड़िया जब जब आती थी ,
बच्चों के मुहं में दाना दे जाती थी ।
बच्चे अच्छे से खाते थे ,
घोसले में मौज उड़ाते थे ।

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

कविता: थोड़ी सी कर ले पढाई

थोड़ी सी कर ले पढाई

मैदान में लगी है कितनी घास ,
जिसमें लगती है रोज लात।
जानवर उसको खाते है ,
अपना पेट फुलाते है ।
उसी घास में सब खेलते है ,
मौज मस्ती करते है ।
मौज मस्ती नहीं ज्यादा करना ,
सबको थोडा है पढाई करना ।

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

कविता: समझ में न आता

समझ में न आता

मुझे समझ में नहीं आती,
मेरे मन में एक बात...
बड़े बड़े आफिसर,
चलते फोर्स को लेकर...
फोर्स में मानव ही होते,
कोई जानवर नही होते...
अगर बीच में कभी युद्ध,
तो मानव ही मारे जाते...
आफिसर बैठ गाड़ी में,
आफिस को चले जाते...
दुख होता है,
इन अफसरों से.....
जो अपनी जान बचाकर,
चुपके से निकल जाते...
आम लोग ही मरते है,
वह अपने ख्यालो में है....
डूबे रहते है,
मुझे समझ में नही आती...



लेखक -अशोक कुमार, kksha 6, apna घर, 15/12/2009

कविता: तितली


तितली

जब -जब आती तितली प्यारीं
मन को भाती तितली प्यारी ॥
रंग -बिरंगी तितली प्यारी
फूलो से भी है सबसे न्यारी
फूलो पर मडराती है
यहा-वहा उड़ जाती है
हाथ में हमारे आती है
पख फैलाकर उड़ जाती है

लेखक: ज्ञान, कक्षा ६, अपना घर, १३/१२/२००९



गुरुवार, 26 नवंबर 2009

कविता: आओ मिलकर खेले खेल

आओ मिलकर खेले खेल

आओ सब मिल खेले कोई खेल,
जिससे हो जाए सबका मेल...
सोच के बोलो कौन सा होगा खेल,
जिससे हो जाएगा सभी का मेल....
ना कोई बल्ला ना कोई जेल,
होगा वह लुका छुपी का खेल....
कुछ बने चोर कुछ बने सिपाही,
बाकि सब बन जायें राही....
बीच में चोर आगे राही,
पीछे दौड़े पुलिस सिपाही....
जोर लगाकर भागो चोर,
आओ मिलकर मचाये शोर.....
यही है सबसे बढ़िया खेल,
जिससे होगा सबका मेल....


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर, १८/११/२००९

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

कविता: बागड़ बिल्ला लेके बल्ला

बागड़ बिल्ला

बागड़ बिल्ला लेके बल्ला,
दिन रात करता रहता हल्ला....
कभी बिल्ली तो कभी चूहे को मारे,
उसकी मार से डरते सभी बेचारे....
एक दिन एक नन्हा चूहा आया,
उसने बिल्ले को बातों में फंसाया....
तब तक सब बिल्ली चूहों ने घेरा,
सबने उसकी बांह पकड़ कर मोड़ा....
मिलकर सबने इतना मारा,
बिल्ला हो गया अधमरा बेचारा....
अब बिल्ले को अक्ल है आई,
सबको कहता बहना - भाई....
अब तो सबकी सेवा करता,
सबके संग में मिलकर रहता....

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

सोमवार, 16 नवंबर 2009

कविता: आम खाए पड़े बीमार

आम खाए पड़े बीमार

एक पेड़ पर डाले चार...
उस पर बैठे तोते एक हजार,
सबने मिलकर आम खाए चार हजार...
खाते ही एक साथ पड़ गए सभी बीमार,
बीमारी का नाम था अमवां ,
सब पहुचें घबरा के नगवां....
नगवां में रहते थे घोंचू डाक्टर,
उसने लगाई सूई सबको जमकर...
सूई लगी तो दर्द से बोला सबने,
टाँव टाँव की जोर लगाई सबने...
दर्द हुआ तो डक्टर लगे कसाई,
पर उसने सबकी जान बचाई...
जिस पेड़ पर छिडकी हो दवा अब जाना,
डाक्टर बोला हरदम फल धोकर ही खाना...
एक पेड़ में डाले चार,
उस पर बैठे तोतें हजार ....

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा 7, अपना घर



सोमवार, 2 नवंबर 2009

कविता: रिश्ते नाता

रिश्ते नाते

पापा के पापा है हमारे दादा ,
बिहार मे पड़ता है जिला नवादा ...
चाचा की बहन को कहते बुआ ,
हम सब खायेगे बुआ के हाथो से पुआ ...
मम्मी के भाई को कहते हम मामा ,
दिल्ली चले बन्दर मामा पहन पजामा ...
मम्मी की मम्मी है हमारी नानी ,
हमने राजा - रानी की सुनी बहुत कहानी ...
बहन के पति को कहते है जीजा ,
गर्मी मे खायेगे हम सब खरबूजा ...
भइया की पत्नी को कहते है भाभी ,
आज पराठे मे खाया हमने गोभी ...
लेखक: आदित्य पाण्डेय, कक्षा ७, अपना घर


शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

कविता: जंगल में घुस गई एक बकरी

जंगल में घुस गई एक बकरी

सुनो सुनो एक खुशखबरी,
घुस गई जंगल में एक बकरी....
शेर को ये जब संदेशा आया,
उसके समझ में कुछ आया....
डर से हालत हो गई पतली,
शेर को आने लग गई मितली....
तभी एक बिल्लौटा आया,
शेर को एक तरकीब बताया....
शेर को बाते समझ में आई,
उसने झट से मीटिंग बुलाई....
बन्दर हाथी भालू आए,
गदहा घोड़ा मिलकर गाये....
सबने मिलकर सोच लगाई,
बन्दर की बुद्धि काम में आई....
बन्दर बोला सुनो रे भाई,
बकरी से क्या डरना भाई....
बकरी खाती घास और दाना,
इसमें अपना क्या है जाना....
शेर की जान तब जान में आई,
सबने जंगल में खुशी मनाई....


लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ८, अपना घर




शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

कविता: सूर्य

सूर्य

सूर्य एक तारा है,
यह उजाले का सहारा है...
इससे रोशनी पाती दुनिया है,
सौर मंडल की मज़ेदार दुनिया है...
सूर्य होता आज अगर,
हम होते दुनिया पर...
सूर्य तो जान से प्यारा है,
चाहता इसको संसार सारा है...
जिन्दगी का बहता जो धारा है,
इसकी वजह सूर्य हमारा है....
लेखक: सोनू कुमार, कक्षा , अपना घर



गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

कविता: आसमान क्या रंग बदलता

आसमान क्या रंग बदलता


ऊपर देखो तारे देखो,
आसमान के नज़ारे देखो...
नीचे देखो बजारें देखो,
बच्चों के भी मजाके देखो...
आसमान भी क्या रंग बदलता,
हम बच्चों का मन बदलता...
तन है कैसा मन है कैसा,
ये आसमान का रंग है कैसा...

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ४, अपना घर

सोमवार, 28 सितंबर 2009

कविता: खाई गधे की लात

खाई गधे की लात

एक लड़का जिसका नाम था सोहन,
वो दिन रात करता था आलसीपन...
कुछ दिन बाद आया जाड़ा,
खूब याद किया उसने पहाड़ा...
एक दिन घर में बैठा वो अन्दर,
अपनी जेब में रखे चुकंदर...
जमके उसने चुकंदर खाया,
दायें बाएं जो भी पाया....
चुकंदर में थे बड़े- बड़े कीड़े,
सोहन के पेट में पड़ गए कीड़े....
सोहन फ़िर तो चला बाज़ार,
गधे पर हुआ जमके सवार....
अक्ल से था वो निपट गंवार,
बिन के लगाम के हुआ सवार....
गधे ने फ़िर मारी लात ,
सोहन ने खाई चार गुलाट....
लेखक: मुकेश कुमार (स्टुवर्ट), क्क्श८, अपना घर

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

कविता: पापा और बेटा

पापा और बेटा

पापा कहते है बेटा,
तुम भी पढ़ने जाया करो...
पढ़ लिख कर अच्छा काम करोगे,
जग में अपना नाम करोगे...
पापा कहते है बेटा,
तुम भी पढ़ने जाया करो...
पापा ने पूछा एक सवाल,
बेटा बोलो मेरे कमाल....
तुम कौन सा ऐसा काम करोगे,
जिससे जग में नाम करोगे....
मैंने काफी सोच के बोला,
अपना छोटा सा मुंह खोला....
पापा मै अच्छा इन्सान बनूँगा,
हर गरीब की मदद करूँगा....
जिससे उनका होगा काम,
जग में होगा मेरा नाम....
पापा कहते है बेटा,
तुम भी पढ़ने जाया करो....


लेखक: सागर कुमार, कक्षा , अपना घर

कविता: प्रार्थना

प्रार्थना

हे प्रभू....
हम है तेरे बंधू,
घूम रहे है लिए तम्बू...
दे दो हमको काम और ज्ञान,
रहे हम घर परिवार के साथ...
हम है तेरे बन्दे और बंधू,
फ़िर क्यो लिए घूम रहे है तम्बू...
दे दो हमको ऐसा ज्ञान,
घूम के बांटे सबको ज्ञान....
भगवन तुम तो हो सूपर,
एक छत कर दो हमारे ऊपर...
करेंगे ज्ञान का प्रचार,
होगा अच्छाई का प्रसार...
इतन सा तू कर दे काम,
लेंगे हरपल तेरा नाम....

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर

कविता: गुरु जी की मार

गुरु जी की मार

गुरु जी हमारे कितने प्यारे,
हरदम पाठ पढाते प्यारे...
हम भी पढ़ते जाते सारे,
याद हमको होते प्यारे...
कक्षा में जब गुरु जी बोले,
पाठ सुनाओ बेटा भोले...
हम तो भइया गए भूल,
सोचा क्यो आए स्कूल...
गुरु जी को गुस्सा आया,
खूब पड़े फ़िर मुझको रूल...
याद गई मेरी नानी,
ख़त्म हुई अब मेरी कहानी...

लेखक :चंदन कुमार, कक्षा ४, अपना घर