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रविवार, 18 मार्च 2012

कविता : मौसम

 मौसम 

धूल,मिटटी,ककंड के संग ,
 ईंट,भट्टों के बीच गुजर रहा था जीवन......
ईंट की भट्टियां और भयानक गर्मी में,
बीता जा रहा था ये अपना बचपन......
धूल मिट्टी और कंकड़ के संग,
घुल मिल सा गया था ये मन .....
पड़ने का था शौक बहुत मुझे,
इस जीवन से न थी कोई आशा ......
सुबह-२ बच्चों को स्कूल जाते देख,
होती मन में बड़ी जिज्ञासा......
एक रोज है वो बात,
मैं कर रहा था भट्टेपर काम ......
तभी आयी एक खबर मेरे पास ,
पड़ने का था एक वो पैगाम.........      

लेखक : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर  
  
 

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

कविता: बागड़ बिल्ला लेके बल्ला

बागड़ बिल्ला

बागड़ बिल्ला लेके बल्ला,
दिन रात करता रहता हल्ला....
कभी बिल्ली तो कभी चूहे को मारे,
उसकी मार से डरते सभी बेचारे....
एक दिन एक नन्हा चूहा आया,
उसने बिल्ले को बातों में फंसाया....
तब तक सब बिल्ली चूहों ने घेरा,
सबने उसकी बांह पकड़ कर मोड़ा....
मिलकर सबने इतना मारा,
बिल्ला हो गया अधमरा बेचारा....
अब बिल्ले को अक्ल है आई,
सबको कहता बहना - भाई....
अब तो सबकी सेवा करता,
सबके संग में मिलकर रहता....

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर