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रविवार, 18 मार्च 2012

कविता : मौसम

 मौसम 

धूल,मिटटी,ककंड के संग ,
 ईंट,भट्टों के बीच गुजर रहा था जीवन......
ईंट की भट्टियां और भयानक गर्मी में,
बीता जा रहा था ये अपना बचपन......
धूल मिट्टी और कंकड़ के संग,
घुल मिल सा गया था ये मन .....
पड़ने का था शौक बहुत मुझे,
इस जीवन से न थी कोई आशा ......
सुबह-२ बच्चों को स्कूल जाते देख,
होती मन में बड़ी जिज्ञासा......
एक रोज है वो बात,
मैं कर रहा था भट्टेपर काम ......
तभी आयी एक खबर मेरे पास ,
पड़ने का था एक वो पैगाम.........      

लेखक : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर  
  
 

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

कविता: लालू भइया ........

लालू भइया ........

लालू भइया बड़े दयालू,
खाते जाते हरदम आलू....
घर में पहुंचे बन गए भालू,
इसलिए हम कहते लालू....
लालू भइया बड़े दयालू,
उनके दोस्त है मोटे कालू....
लालू जम के खाते अंडा,
खूब लहराते देश का झंडा....
लालू भइया बहुँत है छोटे,
इसीलिए दिखते है मोटे. ..
लालू भइया बड़े है भोले,
रखते मुंह में पान के गोले....
लालू भइया बड़े दयालू,
दान में हरदम देते आलू....
लालू जब भी खाते आलू,
उनके घर में आता भालू....

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा , अपना घर