कविता
पानी का बहाओ
बांध टूटते ही थिरक उठते है
पानी का बहाओ
पाथर में भी रास्ता बनाते है
मुश्किलों में भी साथ रहते है
एक दूसरे का हाथ पकड़कर
जो हर मंजिल तक साथ निभाते है
पानी का बहाओ
जो अपना लिया है लोगों ने उनका रास्ता
अब बरी है उनकी बहने के
टूट जाये सरै मंजिले
या टूट जाये घर गिरना
पानी का बहाओ
बांध टूटते ही थिरक उठते है
पानी का बहाओ
पाथर में भी रास्ता बनाते है
मुश्किलों में भी साथ रहते है
एक दूसरे का हाथ पकड़कर
जो हर मंजिल तक साथ निभाते है
पानी का बहाओ
जो अपना लिया है लोगों ने उनका रास्ता
अब बरी है उनकी बहने के
टूट जाये सरै मंजिले
या टूट जाये घर गिरना
पानी का बहाओ
कविता हमारे कवी सुल्तान कुमार द्वारा लिखी गयी है | ये अपना घर में 201 3 में आये थे सुल्तान इस समय कक्षा १२ में पढ़ते है | अपना घर में 14 साल से रह रहे है | ये बड़े होनहार छात्र है यहाँ के ये बहुत छोटे ही उम्र में कवितायेँ लिखने लगे है
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