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सोमवार, 20 मार्च 2017

कविता: होली


"होली"

होली आई होली आई ,
रंगों की बरसात लाई |
तरह तरह के रंग लाई,
होली के रंग मुझको भाई |
पिचकारी से जब निकली होली,
ऐसा लगा बन्दूक से निकली गोली |
सुबह भूलो ,शाम को भूलो,
पर होली में रंग लगाना न भूलो |

बाल कवि: अजय कुमार,  कक्षा 2nd, कानपुर

 

अजय (Ajay) "अपना घर" परिवार के सदस्य है। ये बिहार के नवादा जिले के रहने वाले है। इनका परिवार ईट भठ्ठों में प्रवासी मजदूर का कार्य करते है. अजय यंहा "आशा ट्रस्ट" के कानपुर केंद्र "अपना घर" में रहकर, शिक्षा ग्रहण कर रहे है। वर्तमान में ये कक्षा 2nd के छात्र है। अजय को कविता लिखने में बहुत रूचि नहीं है, पर कभी-कभी लिख देते है। भारतीय क्रिकेट टीम के बहुत बड़े फैन है| अजय को हँसना बहुत पसंद है, इसलिए इनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है. उम्मीद है कि आपको इनकी होली पर लिखी कविता पसंद आएगी | 

शनिवार, 11 मार्च 2017

कविता: होली


"होली"

होली आया होली आया,
साथ में रंगों की गोली लाया |
दुश्मनी भूल हाथ मिलाया,
दुश्मनी को दूर भगाया |
जिन्दगी में खुशियाँ लाया,
दोस्तों को जलवा दिखाया|
अबीर लगा गले मिलाया,
रंगों के साथ खुद को भिगोया|
होली आया होली आया,
सबके दिल को बहलाया|

कवि: कामता, कक्षा 5th, कानपुर


कामता (KAMTA) "अपना घर" परिवार के सदस्य है। ये बिहार के नवादा जिले के रहने वाले है। इनका परिवार ईट भठ्ठों में प्रवासी मजदूर का कार्य करते है. कामता यंहा "आशा ट्रस्ट" के कानपुर केंद्र "अपना घर" में रहकर, शिक्षा ग्रहण कर रहे है। वर्तमान में ये कक्षा 5th के छात्र है। कामता को कविता लिखने में बहुत रूचि नहीं है, पर कभी-कभी लिख देते है। भारतीय क्रिकेट टीम के बहुत बड़े फैन है | किताबें से बहुत दोस्ती है उनके बीच रहना अच्छा लगता है. हमें उम्मीद है कि आपको इनकी होली पर लिखी कविता पसंद आएगी | 

गुरुवार, 9 मार्च 2017

कविता: मैंने देखा एक सपना


"मैंने देखा एक सपना"

जन्नत जैसा घर है अपना,
मैंने देखा रात को सपना |
सपने में एक चिड़िया आई, 
उसने बोला सुन मेरे भाई |
तोता आम है मीठा खाता ,
मुझको है बहुत ललचाता |
तब तक तोता उड़ कर आया ,
अपने साथ वो आम भी लाया |
तोते ने फिर मुझसे कहा ,
मै कभी न चुपचाप रहा  |
हरे रंग का है मेरा बाल ,
चोच मेरी है मिर्च सी लाल |
आओ आम मिलकर खाए ,
दोस्ती के हम गीत गाएँ|

                                                    कवि: समीर कुमार, कक्षा 6th, कानपुर


समीर कुमार (Sameer) "अपना घर" परिवार के सदस्य है। ये उत्तर प्रदेश के इलहाबाद  के रहने वाले है। इनका परिवार ईट भठ्ठों में प्रवासी मजदूर का कार्य करते है. समीर यंहा "आशा ट्रस्ट" के कानपुर केंद्र "अपना घर" में रहकर, शिक्षा ग्रहण कर रहे है। वर्तमान में ये कक्षा 6th के छात्र है। समीर को गीत गाना और लिखना अच्छा लगता है। क्रिकेट के दीवाने है, विराट कोहली इनके आदर्श है। हमें उम्मीद है कि आपको इनकी ये नवीन रचना पसंद आएगी।


 



मंगलवार, 7 मार्च 2017

कविता: चाँद के उस पार

"चाँद के उस पार"

ये कहानी ही है बड़ी अजीब,
मेरे नहीं है कुछ भी नसीब .
हर चीज में मेरी आती है रुकावट,
मैं भरता हूँ हर हौसलों से आहट .
दुनियाँ है मेरी उस चाँद के पार,
फिर मैं क्या कर रहा हूँ इस पार .
मै कोशिश करता हूँ हर बार,
पहुँच जाऊ चाँद के उस पार .
कई बार लगता पहुँच गया हूँ पास,
पर चाँद बहुत दूर हो जाता हर बार.
क्या करूं नसीब ही नहीं मेरा कुछ पाने को,
पर मैं कोशिश करूँगा मंजिल तक जाने को.

कवि: देवराज "डीवी' , कक्षा 6th, कानपुर

कवि का परिचय: देवराज "अपना घर" परिवार के सदस्य है। ये बिहार के रहने वाले है। इनका परिवार ईट भठ्ठों में प्रवासी मजदूर का कार्य करते है. देवराज यंहा "आशा ट्रस्ट" के कानपुर केंद्र "अपना घर" में रहकर, शिक्षा ग्रहण कर रहे है। वर्तमान में ये कक्षा 6th के छात्र है। देवराज को कवितायेँ लिखना अच्छा लगता है। क्रिकेट के दीवाने है, ए वी डिविलयर्स इनके आदर्श है। देवराज को डांस करना बहुत पसंद है। हमें उम्मीद है कि आपको इनकी ये नवीन रचना पसंद आएगी।
 
 
 

सोमवार, 6 मार्च 2017

कविता : उम्मीदों को मत छोड़ो




"उम्मीदों को मत छोड़ो"

उम्मीदों को मत छोड़ो,
हकीकत को मानो ।
पथ को पहचानो,
उस पथ  पर  चलना सीखो।
उम्मीदों पर खुद को जीना सीखो।।
 बात को मानो तो ,
खुद को पहचानो तो ।
न मिले कोई तो,
अकेले ही चल दो ।
थोडा कष्ट  होगा जरूर,
लेकिन पथ  को पहचान होगी ।।
चलने का अनुभव होगा,
न  भोजन हो तो भी ।
जल से भूख मिटा लेंगे,
हिम्मत करके रस्ते बना लेंगे।
मंजिल पर पहुँच कर दिखा देंगे ।।
जो होगा उसको झेलेंगे,
लेकिन उम्मीदों को न छोड़ेंगे ।
इस जग में भूखे ही सो लेंगे,
नींदों को भी छोड़ देंगे ।
न मिलेगा कंही इंसान तो,
पौधों को ही मित्र बना लेंगे ।
इस धरती को स्वर्ग सा बना देंगे,
अगर उम्मीद को हम अपना लेंगे ।।

कवि: अशोक कुमार "गाँधी", कक्षा 10th, कानपुर, सन 2012

अशोक कुमार, "अपना घर" के पूर्व छात्र है। "आशा ट्रस्ट" कानपुर, के केंद्र पर 2006 से 2015 तक रहकर शिक्षा ग्रहण किये है। अशोक वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय से  BA LLB की पढाई कर रहे है। अशोक शुरू से वैचारिक रूप से बहुत मज़बूत और आत्मविस्वाश से भरे रहते थे। कवितायें लिखना उनका शगल रहा है। आज उनकी एक पुरानी कविता नजर आ गई, आप सभी से साझा कर रहा हूँ। उम्मीद है आप को उनकी कविता अच्छी लगेगी। अशोक को भी ये कविता पढ़कर अपना बचपना याद आएगा, और शायद फिर से कविता लिखने की इक्षा हो जाय। अशोक को अनंत शुभकामनायें आने वाले भविष्य के लिए। यूँ ही मुस्कराते रहोगे, अपनी कविताओं की तरह उम्मीद जागते रहोगे, इस विस्वाश के साथ ...

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

कविता: सरकार बनाम सामाजिक कार्यकर्ता

सामाजिक कार्यकर्ताओ का हाल...

समझ में आए,
इस देश की नीति।
जो दिलाये गरीब को इंसाफ,
उसकी बंद कर दी गई जुबान
करे जब वह कोई ऐसा काम,
जिससे लोगो को हो लाभ
सरकार गुस्साए कर दे भन्डा,
पुलिस आये जोर से मारे डंडा।
ले जाये पकड़ के अपने साथ,
फिर कर दे जेल के अन्दर।
जब जेल से छूटे वह बन्दा,
करे धरना और भूख हड़ताल
सरकार और अफसर हो गए लाल,
करने लगे जनता पर खूब अत्याचार।
जब भी जनता अन्याय पे आवाज उठाती,
पुलिस मारके डंडे ले जाये अपने साथ।
इतने से भी सरकार माने,
उसके ऊपर बंदूक है ताने।
झट उसको देशद्रोही बना दे,
कितने सारे मुकदमे करवा दे।
समझ में आये,
इस देश की नीति
जो दिलाये गरीब को इंसाफ ,
उसकी बंद कर दी गई जुबान

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर

सम्पादकीय : "दुश्मन बनी सरकार भगवान बने डकैत"

प्यारे दोस्तों,
वर्त्तमान समय में अपने देश की जो स्थिति है उसके एक हिस्सा बुंदेलखंड की कहानी मै आपको सुनाने जा रहा हूँ जिस तरह से मैंने देखा और समझा हैचुकी मै भी बुंदेलखंड से जुड़ा हुआ हूँ और वहां की पीड़ा को महसूस करताहूँ

" सरकार दुश्मन, भगवान डकैत"

भारत का नाम दुनिया के हर कोने पर लिया जाता है, कि भारत एक शांतिप्रिय, लोकतान्त्रिक और मानवता का पक्षधर देश हैऐसा माना जाता है कि यहाँ कि सरकार लोगो कि आम सहमती से बनती है और इस देश के हर नागरिक को समानता का अधिकार हैइस देश का हर नागरिक अपने को सरकारी कर्मचारियों के समक्ष सुरक्षित और निर्भय महसूस करे ऐसा वातावरण बनाने का काम भी इस देश कि सरकार का हैमगर दुर्भाग्यवश ऐसा माहौल अपने देश और प्रदेश कि सरकारे नहीं बना पाई हैवर्तमान समय में तो बुंदेलखंड कि गरीब जनता चम्बल के डकैतों के सामने अपने आप को ज्यादा निर्भय और सुरक्षित महसूस करती है, बजाय वहां के पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारियों केबुंदेलखंड कि गरीब जनता सरकारी दफ्तरों के बजाय अपने मामले और समस्याओं को सुलझाने के लिए डकैत के पास जाते है, और उन्ही को अपना भगवान या मददगार मानते हैइस देश में प्रतिदिन भ्रष्टाचार, अत्याचार, लूटपाट और बेतहासा बढती हुई महगाई से इस देश कि आम जनता परेशान हो गई हैसरकार और सरकारी कर्मचारी मासूम, बिना दोषी आम आदमी का उनका घर उजाड़ कर, जमीन छीनकर, कभी जेल में, कभी थाने में, तो कभी डकैत, माओवादी कहकर उन पर अत्याचार करती है और अपनी तोंद भरती रहतीहैथाने में रोज किसी बेगुनाह को पकड कर ले आते है और उनसे पैसे वसूल कर चाय, कोका कोला पीने के साथ साथ अपने घर में पैसा जमा करते हैइस देश के जनता के तथाकथित सेवक नेता और अफसर सी में बैठतेहै विस्लरी का बोतल बंद पानी पीते है, और इस देश का आम जनता जो इस देश का असली मालिक है, वो बिनाबिजली के अन्धेरें में दिया जलाकर और साफ पानी की जगह नाली तथा नहर का गन्दा पानी पीकर अपना गुजरबसर कर रही हैक्या इसी को लोकतान्त्रिक देश कहते है, मुझे तो लगता है की ये अत्याचार और भ्रष्टाचार का देशहै जंहा आम आदमी परेशान होकर डकैत या माओवादी के शरण में जाते हैरोज़ अख़बार देखता हूँ आज कुछ अच्छी खबर मिल जाये पढ़नें को मगर नहीं वही रोज हत्या, लूट, दहेज़, बलात्कार, घूस, चोरी, अपरहण, छेड़खानी, गुंडागर्दी की बुरी खबरे पढ़ने को मिलती हैकब हमारा देश सच में लोकतान्त्रिक होगा और अपने देश का आमआदमी सुखी, समृद्ध और निडर महसूस करेगा
लेखक: अशोक कुमार, कक्षा ७, अपना घर
"संपादक "
बाल सजग पत्रिका




सोमवार, 19 अप्रैल 2010

कविता: क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह

इसके बारे में तुम्हे पता है क्या

बना बना कर तमाम फैक्टरिया,
क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह
इस धरती को कर रहे हो ख़राब,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या ?
इन फैक्टरियों से निकलता धुआं,
पर्यावरण को असंतुलित बना रहा
जल जमीन वायु प्रदूषित हो रहा,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या ?
साँस लेने में हो रही है घुटन सी,
मन बेचैन और आँख में जलन सी
बड़ी नदिया भी दिख रही नाला सी,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या ?
इन्सान ने ये कौन सा रोग पाला,
जिन्दगी को मौत के मुहं में डाला
हरे भरे जंगल को बंजर बना डाला,
इसके बारे में तुम्हे पता है क्या?
बना बना कर तमाम फैक्टरिया,
क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह
लेखक: सागर कुमार, कक्षा ६, अपना घर


रविवार, 28 मार्च 2010

बाल विवाह आज भी जारी है

बचपन खोया सिंदूर के रंगों में ........

खेल खिलौने पढना लिखना,
सब छूटा इस बचपन
में ....
धमा चौकड़ी उछल कूद,
खोया सिंदूर के रंगों में....

हुई पराई सब अनजाना,
देखो मेरे इन आँखों में....
घर के चौके घर के चूल्हे,
खेल बने अब आँगन में ......
तुमसे बस इतना मै पुछू,
ये सजा दिया क्यों बचपन में

क्या लौटा पाओगे तुम ,
मुझको मेरे बचपन में....?????

महेश कुमार, अपना घर





शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

कविता: अब नहीं किसी का जुल्म सहेंगे

अब नहीं किसी का जुल्म सहेंगे

जुल्म क्या है ? जुल्म से लड़ना सीखो,
मुल्क क्या है ? मुल्क में रहना सीखो।
कोई किसी को मारे ये जुल्म है,
कोई खड़ा देखे ये तो और जुल्म है।
अपना मुल्क तो अपना भारत देश है
टोपी, चश्मा, हाथ में लाठी ये गाँधी जी का वेश है।
लक्ष्मी बाई और भगत सिंह ने भारत में जन्म लिया,
इस देश कि खातिर अपने प्राणों को गंवा दिया।
गोरे हम पर जुल्म ढाने आये,
साथ में गोला, बारूद, बम लाये
सारा देश फिर एक हुआ,
जुल्म के खिलाफ साथ हुआ।
जनता बोली नहीं सहेंगे जुल्म किसी का,
गोरा काला सरकार या और किसी का।
आओ मिलकर फिर से लड़ेंगे,
गलत हुआ तो चुप रहेंगे।
अब किसी का जुल्म सहेंगे,
आजाद है हम आजाद रहेंगे
लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर



गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

कविता: जब मानव आपस में लड़ता है

जब मानव आपस में लड़ता है

जब मानव आपस में लड़ता है ,
तब जुल्म सितम बढ़ता है
कौन बचाए उनको कौन छुड़ाये,
ये सारा जमाना कहता है
कुछ लड़ते है इस देश के खातिर,
कुछ मरते है बस रुपयों के खातिर
सब मांगते है बस अपने लिए ,
कोई जीता नहीं जिए दूजे के लिए
इस देश पर जताए जो सिर्फ अपना हक़ ,
इनको भी सिखायेंगे अब हम सबक
चारो ओर फैलाओ सबको यह बात ,
नहीं है अलग कोई धर्म जात -पांत
हम है सभी एक इन्सान भाई,
क्यों करते हो आपस में लडाई।
गले मिल जाएँ एक दूजे के हम,
दुनियाँ में सुखमय जीवन जिएँ हम


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

कविता: बैगन के है नसीब फूटे

बैगन के है नसीब फूटे

बैगन जी कि दिल्ली गई बरात,
पहुचते पहुचते हो गई आधी रात ।
मूली जी दुल्हन बनी थी ,
मन ही मन वो सोच रही थी ।
कब आयेंगे दुल्हे राजा ,
उन्हें खिलाऊंगी हलुआ ताजा।
तब तक आ गए दुल्हे राजा ,
मूली ने देख रुकवाया बाजा।
क्योकि दूल्हा थे बैगन काला ,
मूली बोली मै नहीं डालूंगी माला ।
दूल्हा काला दुल्हन गोरी ,
टूट गई शादी कि डोरी ।
बैगन बोला हमारे नसीब है क्यों फूटे,
मूली झट से बोली क्योकि तुम हो काले कलूटे।


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

कहानी: चूहा और बिल्ली कि दोस्ती

चूहा और बिल्ली कि दोस्ती

एक बार कि बात है कि एक बिल्ली थी, जिसक नाम बाटी था और एक चूहा जिसका नाम चोखा था। उन दोनों में बहुँत अच्छी दोस्ती थी। वे जँहा भी जाते एक साथ जाते और एक दूसरे के ऊपर मुसीबत जाने पर सहायता करते थे। एक दिन बिल्ली किसी के घर दूध पीने गई। उसने देखा कि दूध भरा हुआ कटोरा रसोई घर में हुआ है, वो रसोई घर में घुस गयी, तभी चूहा भी पीछे से धमका, बाटी ने दूध कटोरा गिरा दिया। दूध जमीन पर गिर गया बाटी और चोखा दोनों मस्त होकर दूध पीने लगे। थोड़ी देर में चूहे का पेट भर गया वो एक तरफ जाकर आराम फरमाने लगा। तभी बाटी के ऊपर किसी ने जाल डाल दिया, और उसे जाल में बांधकर रसोईघर के एक कोने में रखदिया। उस आदमी के जाने के बाद चोखा धीरे से बाहर आया और बाटी को आजाद करने के लिए जल्द से उस जालको काट दिया, और बाटी को मरने से बचा लिया। घर का कोई आदमी फिर आकर मारे उससे पहले दोनों वंहा से भाग लिए। इस तरह से चूहे ने बिल्ली कि जान बचा ली और अपनी मित्रता कि शान बढा ली।

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

कविता: तुलसी प्यारी

तुलसी प्यारी

कितनी न्यारी कितनी प्यारी,
बड़ी सुन्दर है इसकी क्यारी
छोटी छोटी इसकी डाली,
खिल रही देखो हरियाली।
लगती है ये बड़ी ही प्यारी,
इसकी पत्ती बड़ी ही न्यारी।
इससे बनती दवा है सारी,
इसकी खुश्बू बहुत ही प्यारी।
इसका नाम है बड़ा ही प्यारा,
तीन अक्षर का नाम है सारा।
सभी प्यार से कहते तुलसी,
सबके आंगन में रहती तुलसी।
कितनी न्यारी कितनी प्यारी,
जिसको चाहे दुनिया सारी।

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

कविता: चिड़िया के घोसले में अंडा

चिड़िया के घोसले में अंडा

एक दिन मैंने देखा था ,
चिड़ियों के घोसले में अंडा था ।
उस अंडे में बच्चे थे,
बच्चे सबसे अच्छे थे।
चिड़िया जब जब आती थी ,
बच्चों के मुहं में दाना दे जाती थी ।
बच्चे अच्छे से खाते थे ,
घोसले में मौज उड़ाते थे ।

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

कविता: थोड़ी सी कर ले पढाई

थोड़ी सी कर ले पढाई

मैदान में लगी है कितनी घास ,
जिसमें लगती है रोज लात।
जानवर उसको खाते है ,
अपना पेट फुलाते है ।
उसी घास में सब खेलते है ,
मौज मस्ती करते है ।
मौज मस्ती नहीं ज्यादा करना ,
सबको थोडा है पढाई करना ।

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

कविता: भालू भइया मंत्री बन गए .....

भालू भइया मंत्री बन गए

जंगलवासी सुनो एक ख़बर,
करना ना कोई अगर - मगर....
लोमड़ी एक दिन रोती आई,
शेर से अपनी बात बताई....
शेर ने पूछा क्या हो गया,
लोमड़ी बोली पूँछ कट गया....
शेर ने झट डाक्टर बुलवाया,
दौड़ के डाक्टर जल्दी आया....
डाक्टर थे भाई भालू लाला,
ढूंढ़ के फेविक्युक ले आया....
झट से उसके पूँछ में लगाई,
लोमड़ी रानी खूब चिल्लाई....
उसकी झट से पूँछ जुड गई,
डाक्टर भालू की चर्चा फ़ैल गई....
शेर राजा झूम के गाये,
लोमड़ी रानी खुशी से नाचे....
शेर राजा खुश हो गए,
भालू भइया मंत्री बन गए....
जंगलवासी सुनो एक ख़बर,
करना ना कोई अगर - मगर....

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ७, अपना घर, २०/११/२००९


कविता: आओ मिलकर खेले खेल

आओ मिलकर खेले खेल

आओ सब मिल खेले कोई खेल,
जिससे हो जाए सबका मेल...
सोच के बोलो कौन सा होगा खेल,
जिससे हो जाएगा सभी का मेल....
ना कोई बल्ला ना कोई जेल,
होगा वह लुका छुपी का खेल....
कुछ बने चोर कुछ बने सिपाही,
बाकि सब बन जायें राही....
बीच में चोर आगे राही,
पीछे दौड़े पुलिस सिपाही....
जोर लगाकर भागो चोर,
आओ मिलकर मचाये शोर.....
यही है सबसे बढ़िया खेल,
जिससे होगा सबका मेल....


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर, १८/११/२००९

बुधवार, 25 नवंबर 2009

कविता: सर्दी का अमरुद्ध

सर्दी का अमरुद्ध

अमरुद्ध लगे हैं कितने प्यारे,
लगता है मुँह में जाए सारे...
पर डर लगता है सर्दी का,
डाक्टर लेगा पैसा फर्जी का...
पैसा नहीं लगाना अब फर्जी का,
अमरुद्ध नही खाना अब सर्दी का....


लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर , १६/११/2009

बुधवार, 18 नवंबर 2009

सम्पादकीय

सम्पादकीय
हमारा "बाल सजग" अच्छे से चल रहा है, और आगे बढ़ते जा रहा है। जिस तरह से एक पौधे का बीज अंकुरित होकर विकसित होत है... आज देश में प्रद्योगकी के साथ साथ बेरोजगारी भी बढ़ती जा रही है, इसका मुख्य दोष हमारी शिक्षा का तरीका है । क्योकि एक मजदूर का बच्चा एक प्राइवेट स्कूल का फीस नही दे सकता है, क्योकि मजदूर की एक दिन की मजदूरी लगभग १०० रुपए है। इसी सौ रुपये में वो दिन का रासन और अन्य सामान लाताहै। मजदूर का ८० रूपये रासन में खर्च होता है॥ उसके पास प्रति दिन २० रुपये बचता है जिसमे में वो बीमार पड़ने पर दवा, पहनने का कपड़ा आदि में खर्च करता है .... सौ रुपये उसके गुजारे के लिए भी कम पड़ता है तब वो कर्ज लेता है और कर्ज को चुकाने में पूरी उम्र ठेकेदार के यंहा गुलामी करता है... वो अपने बच्चों को चाहकर भी अच्छे स्कूल में नही पढ़ा पता है.... एक इंजिनियर की तनख्वाह करीब २०,००० रूपये होती है ... उसमें वो महीने में ८ हजार खाने और रहने में 2 हज़ार में दवा और अन्य खर्च करता है तब भी उसके पास १० हज़ार रुपये बचता है जिसमें वो अपने बच्चे को २ हज़ार रूपये महीना फीस देकर अच्छे से अच्छे से स्कूल में पढ़ता है... और उसके बाद अपनी बचत में बाकि पैसे इकठ्ठा करके भविष्य के लिए निश्चित रहता है. हमरे देश के हम जैसे गरीब आदमी का बच्चा अच्छे स्कूल में नही पढ़ पाता अपनी परिस्थितियों के कारण और देश में सबको एक जैसा स्कूल न होने के कारण अमीर का बच्चा इसलिए पढ़ जाता है क्योकि उसके पास हर चीज की सुविधा होती है.....हम मजदूरों के बच्चे भी पढ़ना चाहते है लिखना चाहते है कंप्यूटर चलाना चाहते है...इस देश को अच्छा बनाना चाहते है...मगर हमें मौका ही नही मिलता है....

"संपादक"
अशोक
कुमार,
कक्षा ७, अपना घर