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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

कविता :चंपक है कितनी सुंदर

चंपक है कितनी सुंदर

चंपक है किताब कितनी अच्छी ,
ज्ञान जो हमको देती सच्ची ....
कहानी अच्छी लाती है ,
खुश हमको कर जाती है ....
हंसती और हंसाती है ,
मोटापन हमारा घटाती है ....
नज़र तेज कराती है ,
दिमाग लगाने को कहती है ....
हमारा डर दूर भगाती है ,
हिम्मत हममें जगाती है ....
चंपक है किताब कितनी अच्छी ,
ज्ञान जो हमको देती सच्ची ....

लेख़क :सोनू कुमार 
कक्षा :9
अपना घर

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

नीम बड़ी उपयोगी है

नीम बड़ी उपयोगी है,
औषधि के काम आती है...
बड़े बड़े फर्नीचर बनते,
कीड़े उसमें कभी लगते....
मानव सुबह उठता है,
दातून उसी से करता है....
फ़िर अपना कार्य करता है,
नीम बड़ी उपयोगी है....
औषधि के काम आती है,


लेखक: अशोक कुमार, कक्षा ७, अपना घर, २५/११/२००९

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

कविता: फूल

फूल

फूल हैं ये कितने कोमल,
सुंदर दिखते हैं ये हर पल....
फूल की जातियां हैं अनेक,
फ़िर भी सब मिलकर रहते एक....
कमल को कीचड़ में भी उग आता,
फ़िर भी इतना सुंदर है दिखलाता....
किसी फूल से भेदभाव नही करता,
इसलिए भारत का राष्ट्रीय फूल कहलाता....
फूलों से मिलकर रहना सीखो,
आपस में खुश रहन सीखो....
फूल हैं ये कितने कोमल,
सुंदर दिखते हैं ये हर पल
....

लेखक: धर्मेन्द्र कुमार, कक्षा ७, अपना घर १९/११/२००९

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

कविता: भालू भइया मंत्री बन गए .....

भालू भइया मंत्री बन गए

जंगलवासी सुनो एक ख़बर,
करना ना कोई अगर - मगर....
लोमड़ी एक दिन रोती आई,
शेर से अपनी बात बताई....
शेर ने पूछा क्या हो गया,
लोमड़ी बोली पूँछ कट गया....
शेर ने झट डाक्टर बुलवाया,
दौड़ के डाक्टर जल्दी आया....
डाक्टर थे भाई भालू लाला,
ढूंढ़ के फेविक्युक ले आया....
झट से उसके पूँछ में लगाई,
लोमड़ी रानी खूब चिल्लाई....
उसकी झट से पूँछ जुड गई,
डाक्टर भालू की चर्चा फ़ैल गई....
शेर राजा झूम के गाये,
लोमड़ी रानी खुशी से नाचे....
शेर राजा खुश हो गए,
भालू भइया मंत्री बन गए....
जंगलवासी सुनो एक ख़बर,
करना ना कोई अगर - मगर....

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ७, अपना घर, २०/११/२००९


बुधवार, 25 नवंबर 2009

कविता: सर्दी का अमरुद्ध

सर्दी का अमरुद्ध

अमरुद्ध लगे हैं कितने प्यारे,
लगता है मुँह में जाए सारे...
पर डर लगता है सर्दी का,
डाक्टर लेगा पैसा फर्जी का...
पैसा नहीं लगाना अब फर्जी का,
अमरुद्ध नही खाना अब सर्दी का....


लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर , १६/११/2009

रविवार, 22 नवंबर 2009

कविता: कद्दू और मिर्च की हुई लडाई

मिर्चा और कद्दू

मिर्चा भइया मिर्चा भइया,
कद्दू बोले राम -राम भइया....
कद्दू बोला मै तुझे खा जाऊंगा,
मिर्चा बोला मै तुझे चबा जाऊंगा....
कद्दू बोला इतना मोटा हूँ,
मिर्च बोला मै बस छोटा हूँ....
मुँह में तेरे घुस जाउँगा,
कड़वाहट फैला आऊँगा....
कद्दू सुनकर जोर से भागा,
मिर्चा भइया सोकर जागा....

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ८, अपना घर

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

कविता: हिंदुस्तान हमारा है........

हिंदुस्तान हमारा है

हिंदुस्तान हमारा है,
हमको जान से प्यारा है....
इसकी खातिर लोगो ने दी क़ुरबानी,
तब जाकर मिली हम सबको आजादी....
देश के खातिर जो मिट गए,
अंग्रेजों को देश से खदेड़ गए.....
अंग्रेज तो कब के चले गए,
पर अपनी अंग्रेजियत छोड़ गए ....
आज काले अंग्रेज करते है राज,
नही सुनता कोई गरीबों की आवाज....
क्या इस अंग्रेजियत से पार पाएंगे,
जाने कब इनको मार भगायेंगे ....

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर



सोमवार, 2 नवंबर 2009

कविता: सबसे अच्छा क्या

सबसे अच्छा क्या

तारों मे अच्छा तारा,
वह है सूर्य हमारा...
रातों मे सबसे अंधेरी रात,
वो है अमौस्या की रात...
गीतों में वह गीत,
वो है अपने देश का राष्ट्रीय गीत...
दीवारों में है दीवार,
वह है चीन की दीवार...
मीनारों में वह है मीनार,
वह है दिल्ली में कुतुबमीनार....
ज्ञानों में वह ज्ञान जिससे मिले सभी को ज्ञान,
जिसको हम सभी कहते है विज्ञान ...
नारों में है वह नारा,
वो है इन्कलाब का है नारा...
झंडों में है सबसे प्यारा,
वो है तिरंगा हमारा...
देशो में है सबसे न्यारा,
वो है भारत है देश है हमारा...
सप्ताह में छुट्टी वाला दिन,
वो है रविवार का दिन...
बातों में वह है बात,
मज़ेदार की बात...
दानों में वह दानी,
जिसकी सुनी है सभी ने कहानी...
हम सबकी है मुजबानी,
कोई नही है हरिश्चंद्र जैसा दानी...

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

रविवार, 1 नवंबर 2009

कविता: आजाद देश

आजाद देश

आजादी का दिन आया,
बच्चों के मन में खुशियाँ लाया...
अपना तिरंगा झण्डा फहराया,
अमर शहीदों के नारे थे....
भगत सिंह जिन बच्चों के मन में भाते थे,
उनके मन में इन्कलाब का नारा था...
आजादी का दिन आया,
बच्चों के मन में खुशियाँ लाया ...
जब बच्चों ने मिलकर आवाज उठाईं ,
तब भारत माता ने ली अंगडाई...

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा ७, अपना घर

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

कविता: बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगें

बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगें

हमको तो सब कुछ याद है,
अब तो मार खायेंगे...
जो कुछ याद नही है,
उसे तो बिल्कुल रट लेंगे...
अब होने को है पेपर उसमे लिख देंगे,
जो भी देंगे उसको हल कर देंगे...
ये सब याद हुआ है डंडे के बल पे,
टीचर तो बैठे रहते कुर्सी पे...
हाथ में हरदम ले कर डंडे,
मार से रोज टूटे कितने डंडे...
भोले भाले और मुस्काते सारे बच्चे आते है,
रात को रटते सुबह भूल ही जाते है...
डंडे खाते फिर याद करते,
रोते रोते घर को जाते....
डंडे के बल पर हम कब तक पढ़ पाएंगे,
क्या कोई अब प्यारे टीचर आयेंगे....
बिन मारे क्या हम नही पढ़ पाएंगे,
बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगे....

लेखक: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

कविता: पेन

पेन

पेन हमारा कितना प्यारा,
तुम हो हम सबका सहारा...
तुम से हम सब लिखा पढ़ी करते,
तुमसे ही हिसाब किताब रखते...
पेन हमारा कितना प्यारा,
तुम हो हम सबका सहारा...
पेन जिस कागज पर चलता,
समझो वो तो कभी मिटता...
पेन है हरदम संग संग रहता,
सभी का प्यारा दोस्त है बनता...
पेन हमारा कितना प्यारा,
तुम हो हम सबका सहारा...
पेन खरीदता है हर कोई,
बच्चे बूढे और हो कोई...
साथी है सबके जीवन का,
नीले पीले और सतरंगी सा....
पेन हमारा कितना प्यारा,
तुम हो हम सबका सहारा....

लेखक : सागर कुमार, कक्षा , अपना घर

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

कविता: लालू भइया ........

लालू भइया ........

लालू भइया बड़े दयालू,
खाते जाते हरदम आलू....
घर में पहुंचे बन गए भालू,
इसलिए हम कहते लालू....
लालू भइया बड़े दयालू,
उनके दोस्त है मोटे कालू....
लालू जम के खाते अंडा,
खूब लहराते देश का झंडा....
लालू भइया बहुँत है छोटे,
इसीलिए दिखते है मोटे. ..
लालू भइया बड़े है भोले,
रखते मुंह में पान के गोले....
लालू भइया बड़े दयालू,
दान में हरदम देते आलू....
लालू जब भी खाते आलू,
उनके घर में आता भालू....

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा , अपना घर

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

कविता: आख़िर क्या......?

आख़िर क्या....

कुछ नही बोलता,
फालतू में चिल्लाता...
दूसरो को जगाता,
सबकी नींद भगाता...
फटी जेब सिलता,
सभी से यह मिलता...
हलवा पूड़ी खाता,
रात को अपने घर में सोता...
आख़िर क्या....?


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

रविवार, 20 सितंबर 2009

कवि़त: आओ - आओ नाव में बैठो

आओ - आओ नाव में बैठो

आओ -आओ बच्चों आओ,
नाव में बैठो मजे उडाओं...
पानी देखो मछली देखो,
उपर देखो नीचे देखो...
आओ - आओ भाग के आओ,
नाव में जल्दी बैठ भी जाओ...
पानी की लहरों को देखो,
मछली की चहलों को देखो...
देखो - देखो बच्चों देखो,
आओ मिलके इनसे सीखो...
कहाँ है बगुला कहाँ है कछुआ,
ये मिलकर सब पता लगाओ...
जल्दी आओ जल्दी आओ,
नाव में बैठे मजे उडाओं...

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

कविता: बकरी खाती खीरा ककड़ी

बकरी खाती खीरा ककड़ी

एक थी प्यारी बकरी,
खाती हरदम खीरा ककड़ी...
जब दिन आया मंगल,
वो भाग के पहुँची जंगल...
जंगल में मिले दो भालू,
दोनों खा रहे थे कच्चे आलू...
बकरी को खिलाया कच्चा आलू,
खाकर बकरी बन गई चालू...
भालू ने सोचा बकरी को खा लूँ,
नरम मुलायम मांस मै पा लूँ...
बकरी निकली बहुत ही चालू,
भालू को पिलाया जम के दारू...
दारू पीकर भालू बोला खीरा-खीरा,
बकरी ने झटपट भालू को चीरा...
भालू ने मरते ही बोला जय हो,
भैया बकरी से अब रखो भय हो...
सब भालू अब खाना खीरा ककड़ी,
जैसे हरदम खाती थी वो बकरी..
एक थी प्यारी बकरी,
खाती हरदम खीरा ककड़ी...
लेखक, सागर कुमार, कक्षा , अपना घर