कविता बाल सजग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता बाल सजग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

कविता: आख़िर क्या......?

आख़िर क्या....

कुछ नही बोलता,
फालतू में चिल्लाता...
दूसरो को जगाता,
सबकी नींद भगाता...
फटी जेब सिलता,
सभी से यह मिलता...
हलवा पूड़ी खाता,
रात को अपने घर में सोता...
आख़िर क्या....?


लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर

सोमवार, 28 सितंबर 2009

कविता: खाई गधे की लात

खाई गधे की लात

एक लड़का जिसका नाम था सोहन,
वो दिन रात करता था आलसीपन...
कुछ दिन बाद आया जाड़ा,
खूब याद किया उसने पहाड़ा...
एक दिन घर में बैठा वो अन्दर,
अपनी जेब में रखे चुकंदर...
जमके उसने चुकंदर खाया,
दायें बाएं जो भी पाया....
चुकंदर में थे बड़े- बड़े कीड़े,
सोहन के पेट में पड़ गए कीड़े....
सोहन फ़िर तो चला बाज़ार,
गधे पर हुआ जमके सवार....
अक्ल से था वो निपट गंवार,
बिन के लगाम के हुआ सवार....
गधे ने फ़िर मारी लात ,
सोहन ने खाई चार गुलाट....
लेखक: मुकेश कुमार (स्टुवर्ट), क्क्श८, अपना घर