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शनिवार, 17 अप्रैल 2010

कविता: आदमी कहलाने लायक नहीं हूँ

मै एक आदमी हूँ ......

मै एक आदमी हूँ,
लेकिन आदमी कहलाने लायक नहीं हूँ
मेरे पास दिमाग है,
लेकिन वह बेकार है।
उन्नति तो हमने बहुँत किया,
मगर समाज को कुछ दिया।
इस हरी भरी दुनिया को,
छिन्न - भिन्न कर गया।
एक दिन ऐसा आएगा,
दुनिया खत्म हो जायेगा।
इसका कारण एक है,
किन्तु वह अनेक है।
दो हाथो दो पैरो वाला है,
खोज-बीन करने वाला है।
दुनिया में पता नहीं क्या क्या बनाया,
इस पूरी धरती पर प्रदूषण फैलाया।
जिस मिटटी में हम पैदा हुए,
उसी को हम सब लूट लिए।
इन्सान से अच्छा जानवर है,
प्रकृति के हरदम साथ है।
अच्छा भोजन खाता है,
अपनी बात फरमाता है।
जंगल जमीन में रहता है,
जंगल का साथ निभाता है।
मै एक आदमी हूँ ,
लेकिन अपने आप पर शर्मिंदा हूँ

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ८, अपना घर




सोमवार, 28 सितंबर 2009

कविता: खाई गधे की लात

खाई गधे की लात

एक लड़का जिसका नाम था सोहन,
वो दिन रात करता था आलसीपन...
कुछ दिन बाद आया जाड़ा,
खूब याद किया उसने पहाड़ा...
एक दिन घर में बैठा वो अन्दर,
अपनी जेब में रखे चुकंदर...
जमके उसने चुकंदर खाया,
दायें बाएं जो भी पाया....
चुकंदर में थे बड़े- बड़े कीड़े,
सोहन के पेट में पड़ गए कीड़े....
सोहन फ़िर तो चला बाज़ार,
गधे पर हुआ जमके सवार....
अक्ल से था वो निपट गंवार,
बिन के लगाम के हुआ सवार....
गधे ने फ़िर मारी लात ,
सोहन ने खाई चार गुलाट....
लेखक: मुकेश कुमार (स्टुवर्ट), क्क्श८, अपना घर

बुधवार, 26 अगस्त 2009

कविता: बन्दर और कलेंडर

बन्दर और कलेंडर

आसमान में टंगा कलेंडर,
उसको पढ़ रहे थे हाथी बन्दर....
आसमान से गिरा जब बन्दर,
चिपका गया धरती के अन्दर
धरती के अन्दर थे तीन बन्दर,
तीनों ने मारे जम के थप्पड़ ...
बन्दर भगा किचन के अन्दर,
खाने लगा घी और मक्खन....
लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा ८, अपना घर

सोमवार, 15 जून 2009

कविता: एक किसान गया कलकत्ता

एक किसान गया कलकत्ता

एक किसान गया कलकत्ता।
उसने खाया पान का पत्ता॥
मुंह हो गया उसका लाल।
रात में किया मुर्गे को हलाल॥
जमकर उसने मुर्गा खाया।
किसी को घर में नही बताया॥
घर में मांस की बदबू आई
उसकी पत्नी सह नही पाई॥
पत्नी उसकी पड़ी बीमार।
किसान ने मन में किया विचार॥
मांस कभी खाऊँगा।
नहीं किसी को सताऊंगा॥
अबकी बार गया कलकत्ता।
नहीं खाऊँगा पान का पत्ता

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा , अपना घर


रविवार, 17 मई 2009

कहानी: मास्टरनी रीना ने बदली गाँव के तस्वीर

मास्टरनी रीना ने बदली गाँव के तस्वीर
एक समय की बात है। एक गाँव में एक गरीब आदमी रहता था, जिसका नाम दयाशंकर था। वह बहुत ही निर्धन आदमी था, उसका जन्म १७ जनवरी १९६६ को हुआ था। वह किसानी का काम करता था। उसके गाँव का नाम रामपुर था, वह गाँव बहुत साफ - सुथरा और खुशहाल था, लेकिन वंहा के लोग बहुत गरीब थे। उस गाँव में शिक्षा का कोई प्रबंध नही था। दयाशंकर अनपढ़ आदमी था, इस कारण जब वह पास के शहर में काम करने जाता तो ठेकेदार उसे पूरी मजदूरी न देकर सिर्फ़ आधी मजदूरी देता था। दयाशंकर अपने चारो बेटों को पढ़ना चाहता था, लेकिन रामपुर में कोई स्कूल ही नही था। वहां के प्रधान उमाशंकर बड़े ही दुष्ट प्रकार के इन्सान थे। वे सिर्फ़ लोगों से वोट मांगते थे मगर गाँव की समस्याओं की तरफ कोई ध्यान नही देते थे। गाँव के सड़क, नाली लोगो को रासन, स्कूल आदि किसी समस्याओ का निदान नही करते थे। दयाशंकर के पत्नी रीना थोड़ा बहुत पढ़ी - लिखी थी। रीना ने अपने बच्चो को ख़ुद पढ़ना शुरू किया, पास के और बच्चे पढ़ने आने लगे, दयाशंकर के घर में ही स्कूल शुरू हो गया। गाँव के और बच्चे सुनीता, मोनी, राजेश, ब्रिजेश, महेश, सोनू, रानी, गीता और अन्य सभी बच्चे स्कूल आने लगे। गाँव के सब लोग रीना को अब मास्टरनी जी कहके बुलाने लगे। गाँव के सभी बच्चें मन लगाकर पढ़ाई करने लगे, रीना भी उन्हें खेल खिलाकर , गीत, गाना के माध्यम से पढाने लगी, धीरे - धीरे सभी बच्चे लिखना, पढ़ना और जोड़- घटना आदि सब सीख गए। पढ़लिखकर बच्चे अब बड़े हो गए थे, वे शहर में जाकर मजदूरी करने लगे, पढ़े - लिखे होने के कारण उन्हें अब पूरी मजदूरी मिलाने लगी। अगले साल चुनाव आया सभी लोगो ने मिलकर मास्टरनी रीना को प्रधान के चुनाव में खड़ा किया। गाँव के सभी लोगो ने मास्टरनी रीना को अपना वोट दिया, वो चुनाव जीत कर रामपुर गाँव की प्रधान बन गई। अब गाँव में विकास के सारे काम शुरू हो गए। गाँव में पक्की सड़क और नाली बन गई मास्टरनी जी के प्रयास से उस गाँव में एक सरकारी स्कूल भी खुल गया। अब गाँव के सभी बच्चे स्कूल जाने लगे और पढ़ाई करने लगे। गाँव के लोगों को अब पूरी मजदूरी भी मिलने लगी, धीरे - धीरे पूरे गाँव के तस्वीर ही बदल गई। इस तरह से रामपुर गाँव एक शिक्षित और खुशहाल गाँव बन गया।
कहानी: मुकेश कुमार, कक्षा ७, अपना घर
पेंटिंग: आदित्य कुमार, कक्षा ६ , अपना घर