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सोमवार, 20 जुलाई 2009

कविता:- कोई कुछ सुनता नही

कोई कुछ सुनता नही....
हम जगा रहे थे, कोई जागे तो।
हम डर रहे थे, कोई डरे तो।।
हम बाँध रहे थे, कोई बंधें तो।
हम रुला रहे थे, कोई रोये तो॥
हम हंसा रहे थे, कोई हंसे तो।
हम पढ़ा रहे थे, कोई पढ़े तो॥
हम लिखा रहे थे, कोई लिखे तो।
हम नचा रहे थे, कोई नाचे तो॥
हम घुमा रहे थे, कोई घूमे तो।
हम नहला रहे थे, कोई नहाये तो॥
हम खिला रहे थे, कोई खाए तो।
हम बुला रहे थे कोई आए तो॥
हम मुस्करा रहे थे, कोई मुस्कराए तो।
हम सुला रहे थे, कोई सोये तो॥

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

बुधवार, 8 जुलाई 2009

कविता: यादें गाँव और बचपन की

यादें गाँव और बचपन की
याद हमें आती है हर पल अपने गाँव की बातों की
याद हमें आती है हर पल, बचपन की उन बातों की.
गाँव की गलियां, गाँव के रस्ते, खुशबु अपने माटी की.
याद हमें आती है हर पल अपने गाँव की बातों की.
गुल्ली डंडा, चोर सिपाही, कुकडू कू और भाग-भगाई.
चिक्का, कबड्डी, लाली बेटा, खेल थे अपने गांवों की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातो की.
आम के पेडों पर वो चढ़ना, खेल-खेल में लड़ना-झगड़ना.
रात हुई तो जंगल परियां, थे किस्से, कहानी बाबा की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातो की.
फूलों पर तितली को पकड़ना, रात को मिलके जुगुनू पकड़ना.
बारिस होते ही तैराते, कागज की उन नावों की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
भालू का हम नाच देखते, जादू की वो बात सोचते.
ध्यान लगा रहता था दिल में, आइसक्रीम की घंटी की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
भैस के ऊपर चढ़ना-उतरना, बकरी और पिल्ले को पकड़ना.
खेतों की उस पगडण्डी पर, झरबेरी के पेडों की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
लकड़ी की पाटी ले जाना, खट्टी मिठ्ठी इमली खाना.
यारो के संग एक दूजे को, चिढ़ने और चिढ़ाने की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
गाँव के कुत्तो को दौड़ाना, पेडों से बन्दर को भगाना.
चरता गधा मिल जाये तो, मजा थी उसकी सवारी की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
सबके संग में मेला जाना, चोरी-चुपके चाट खाना.
यारो के संग एक दूजे को, हंसने और हँसाने की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.
याद हमें आती है हर पल, बचपन की उन बातों की.
गाँव की गलियां, गाँव के रस्ते, खुशबु अपने माटी की.
याद हमें आती है हर पल, अपने गाँव की बातों की.

महेश, कानपूर

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

कहानी: पॉँच साहसी दोस्त

पॉँच साहसी दोस्त....
बहुँत समय पहले की बात है एक घना जंगल था उसी जंगल के पास एक गाँव था, गाँव के लोगों का मानना था कि इस जंगल में कई भूत, जंगली जानवर और बड़े - बड़े सांप रहते है, पर उस जंगल में ऐसा कुछ नही था बहुँत ही सुंदर और प्यारा जंगल था मगर गाँव के जितने बड़े लोग थे वह अपने बच्चों से कहते थे कि उस जंगल में मत जाना वर्ना कोई जंगली जानवर तुम्हे मार कर खा जाएगा या फ़िर तुम्हें भूत पकड़ लेगा सभी गाँव के बच्चे उस जंगल में जाने से डरते थे उसी गाँव में एक बच्चों कि टोली थी, उन पांचो बच्चों में आपस में बहुत ही अच्छी दोस्ती थी वे थोड़े शैतानी जरुर करते थे मगर निडर और साहसी थे एक दिन उन्होंने ने आपस में सलाह कि चलो उस जंगल में जाकर देखा जाय कि क्या है वंहा पर, हो सकता है ये बड़े लोग ऐसे ही झूठ बोल रहे हो फ़िर पांचो दोस्त गाँव में बिना किसी को बताये उस जंगल कि तरफ चल दिए जंगल में चलते - चलते वो बहुत दूर निकल आए मगर अभी तक उन्हें कंही भी कोई भूत, सांप ये जंगली जानवर नजर नही आया, रस्ते में उन्हें मोर, खरगोश, हिरन, तोते, जंगली कबूतर और ढेर सारे रंग बिरंगी चिड़िया दिखी आगे चलने पर उन लोगो ने देखा कि पेड़ों के बीच एक बहुत ही सुंदर महल बना है , और उस महल के आस-पास ढेर सारे बच्चे खेल रहे थे, पांचो दोस्त उन्ही बच्चों के साथ खेलने लगे महल के पास वाले बगीचे में ढेर सारे फल के पेड़ लगे थे, सभी ने पेड़ से तोड़ कर ढेर सारे फल खाया और झूला भी झूला अब शाम हो चली थी बातचीत में उन बच्चों ने बताया कि ये हम लोगो का स्कूल हैऔर हम लोग यंहा रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे है हमारे परिवार के लोग इसी जंगल में रहते है सभी बच्चों के साथ इनकी दोस्ती हो गई पांचो दोस्तों ने सभी बच्चों से बिदा लेकर अपने गाँव कि तरफ़ चल दिए इस तरफ़ बहुत देर से बच्चों के गाँव में होने से गाँव वाले परेशान हो गए थे उन्हें लग रहा था कि हो हो ये बच्चे उस जंगल में गए होंगे और वनः पर उन्हें जंगली जानवर या भूत मार डाला होगा जंगल में उन्हें खोजने डर के मारे कोई नही जा रहा था तभी जंगल से वो पंचों बच्चे आते हुए दिखाई दिए गाँव वाले सभी खुश हो गए, पांचो दोस्तों ने जंगल के बारे में और वहाँ के स्कूल के बारे में बताया अगले दिन सभी गाँव वाले उस जंगल में गए उन्होंने वहां पर स्कूल देखा सभी से मिले और बहुँत खुश हुए उन्होंने अपने गाँव के सभी बच्चों को उस स्कूल में भेजने लगे अब उन्हें पता चला कि जंगल के बारे में कितनी झूठी अफवाह फैली हुई थी अब उस गाँव में बड़े लोग उन पांचो दोस्तों कि साहस कि कहानी अपने बच्चों को सुनाने लगे

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर, कानपूर

कविता: पानी काले बादल में

पानी काले बादल में
नीले नीले आसमान में॥
पानी काले बादल में
बादल है या कोई छाया।
ये तो है प्रकृति की माया॥
कब ये पानी बरसाएगा।
हमको कब तक तरसाएगा॥
जब यह पानी बरसेगा
धरती को पहले सींचेगा॥
हम भी नहायेंगे पानी में।
नाव चलाएंगे नाली में॥
पानी की बुँदे गिरेंगी तन पे।
मेरे मन को लगेंगी छन से॥
पानी में झम - झम कूदेंगे।
हम मस्ती में सब डूबेंगे॥
हम सब झूम के नाचेंगे।
संग में सबके गायेंगे॥
सबके संग नहायेंगे।
पानी से बाहर आयेंगे॥
पानी पाकर धरती होगी हरियाली।
घर- घर में आयेगी खुशियाली

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर, कानपूर



रविवार, 5 जुलाई 2009

कविता: मेहनत का दर्द

मेहनत का दर्द
कच्ची कच्ची मिटटी खोदी ।
खोदकर पानी में फुला दी ॥
गोल करके फिर सांचे में डाली ।
ईट हुई गड़बड़ मालिक ने दी गाली॥
गाली सुनकर गुस्सा आया ।
गुस्से को मन में भड़काया ॥
तब पता चला मालिक होते है कंजूस।
गाली देकर मन को पहुचाते है ठेस ॥

आदित्य कुमार कक्षा ७, अपना घर

कविता: आसमान में छाये बादल

आसमान में छाये बादल
आसमान में छाये बादल ।
काले नीले सफ़ेद
काले बादल ने ये बोला
मै पानी बरसाऊंगा
झट नीले बादल ने बोला
मै पानी भर लाऊँगा
सफ़ेद बादल भी पट से बोला
मै रस्ता दिखलाऊँगा

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर


शनिवार, 20 जून 2009

कविता: कंप्यूटर भाई

कंप्यूटर भाई
कंप्यूटर भाई कंप्यूटर भाई
तुम क्यो होतो हो हमसे गुस्सा॥
गुस्सा तुमको अब नही करना है।
हमारा काम अब तुमको करना है॥
कंप्यूटर भाई कंप्यूटर भाई।
तुम कहाँ चले गए
बिजली गई तो तुम भी गए
मेरा काम अधूरा छोड़ गए
तुम्हारे सहारे सब काम चल रहा है।
तुम ही हो मेरे काम के साथी॥
अब साथ- साथ तुम्हे रहना है
अब मेरा काम भी करना है॥
कंप्यूटर भाई कंप्यूटर भाई।
तुम क्यो होतो हो हमसे गुस्सा

कविता: सागर कुमार , कक्षा 5, अपना घर

सोमवार, 15 जून 2009

कविता: एक किसान गया कलकत्ता

एक किसान गया कलकत्ता

एक किसान गया कलकत्ता।
उसने खाया पान का पत्ता॥
मुंह हो गया उसका लाल।
रात में किया मुर्गे को हलाल॥
जमकर उसने मुर्गा खाया।
किसी को घर में नही बताया॥
घर में मांस की बदबू आई
उसकी पत्नी सह नही पाई॥
पत्नी उसकी पड़ी बीमार।
किसान ने मन में किया विचार॥
मांस कभी खाऊँगा।
नहीं किसी को सताऊंगा॥
अबकी बार गया कलकत्ता।
नहीं खाऊँगा पान का पत्ता

लेखक: मुकेश कुमार, कक्षा , अपना घर


रविवार, 14 जून 2009

कविता: चारो चोर गए सुधर

चारो चोर गए सुधर
एक गाँव में चार थे चोर।
रोज पकड़ते थे वे मोर॥
एक चोर पकड़ गया थाने में।
तीन गिर गए नाले में॥
नाले में भर गया था पानी।
चोरों की हो गई बदनामी॥
छोड़ी चारों ने बईमानी।
ख़त्म हुई उनकी शैतानी॥
चारो अब तो गए सुधर।
भाग के पहुँचे अपने घर॥
खेत में करने लगे वे काम।
गाँव में हुआ फ़िर उनका नाम॥
ख़त्म हुई उनकी बदनामी।
यही है चार चोरो की कहानी

लेखक : ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर




कविता: चारो ही गए गंजे

चारो हो गए गंजा
चार थे पण्डे।
खाते थे रोज अंडे॥
चारो गए स्कूल।
स्कूल में की शैतानी॥
टीचर को हो गई हैरानी।
टीचर ने मारा दो - दो अंडा॥
चारो के मुंह से निकल पड़ा अंडा।
फ़िर चारो गए पंजाब॥
पंजाब में बिल्ली ने मारा पंजा
चारो का सर हो गया गंजा
कविता: चंदन कुमार, कक्षा , अपना घर

शनिवार, 13 जून 2009

कविता: आओ सीखे गिनती

एक बोलो एक
एक बोलो एक उड़ती चिरैया देख
दो बोलो दो हाथ साफ से धो॥
तीन बोलो तीन बच्चों बजाओ बीन।
चार बोलो चार चलें बाजार
पॉँच बोलो पॉँच बंदरिया नाच।
: बोलो : सब बच्चों की जय॥
सात बोलो सात चले बारात।
आठ बोलो आठ बच्चों बिछाओ खाट॥
नौ बोलो नौ गिनती सीखो सौ।
दस बोलो दस बच्चों चलाओ बस॥
कविता: मुकेश कुमार, कक्षा , अपना घर

सोमवार, 8 जून 2009

कविता: दूध पियो

दूध पियो
दूध पियो दूध पियो।
गरमा - गरम दूध पियो
मीठा - मीठा दूध पियो।
लम्बी -लम्बी उमर जियो
दूध पियो मोटा हो जाओ।
तोंद फुलाओ तोंद पचकाओ॥
आओ जमके दूध चढाओ
पेट भिडाओ पेट लड़ाओ॥
दूध पियो और मस्त हो जाओ।
तन की बीमारी दूर भगाओ
मक्खन खाके पेट फुलाओ।
जिससे चाहे पंजा लड़ाओ॥
दूध पियो दूध पियो
गरमा - गरम दूध पियो॥
कविता: ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर

कविता: गर्मी का मौसम

गर्मी का मौसम
गर्मी का मौसम है आया।
शरीर पसीने से है थरार्या
दोपहर में बड़ी जोर।
चलती है लू घनघोर॥
धूल मिट्टी सर-सर कर।
जाती है अपने घर॥
दोपहर को कड़ी धूप में
बाहर जाता हूँ मुश्किल में॥
ठंढे पानी में मजा है आता।
गर्मी को है दूर भगाता॥
गर्मी का मौसम है आया।
शरीर पसीने से है थरार्या॥
कविता: अक्षय कुमार, कक्षा , अपना घर

रविवार, 7 जून 2009

कविता: धोबी और लोहार

धोबी और लोहार
एक गधे पर चार सवार
उसमें दो धोबी और दो लोहार
घूम - घाम के सब पहुचें मंडी
दोनों धोबी ने खरीदी भिन्डी
दोनों लोहार को गुस्सा आया
दोनों ने दो दर्जन केला खाया
गधे को धोबी ने खिलाया ककड़ी
ककड़ी में छिपी थी काली मकड़ी
गधे की गर्दन में मकड़ी ने बुना जाल
गधे जी दर्द के मारे हुए बेहाल
गधे को देखकर चारो का हुआ बुरा हाल
पाँव उठाके भागे और पहुच गए ननिहाल
कविता: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर


शनिवार, 30 मई 2009

कहानी: मछुआरे और नेवले कि दोस्ती

मछुआरे और नेवले कि दोस्ती
एक समय की बात है कि एक मछुआरा मछली मारने के लिए जाल लेकर अपने घर से नदी की ओर चला, चलते- चलते रास्ते में उसे एक बडा सा सांप मिला, वह सांप बहुत काला और खतरनाक था वह सांप रास्ते में खड़ा हो गया और बोला कि मैं तुम्हें काटूगा इतने में मछुआरे ने कहा कि मैंने आपका क्या बिगाडा है, जो आप मुझे काटेगें सांप ने कहा मैं भूखा हूँ और मुझे कुछ खाने को चाहिए मछुआरे ने कहा ठीक है जब मै मछली मारकर वापस आऊंगा , तब मैं आपको मछली दूंगा, आप उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लेना सांप नें कहा कि अगर मछली मिली तो मैं तुमको काट लूँगा मछुआरे नें कहा कि ठीक है, तो जाओ और जल्दी वापस आना, सांप ने कहा जब मछुआरा वहां से थोडी दूर बढ़ा तो उसने देखा कि एक नेवला प्यास की वजह से चल नहीं पा रहा है तो उस मछुआरे को दया गई, उसने नेवले को उठाया और पहुंच गया नदी के पास ,वहाँ जाकर नेवले को मछुआरे ने पानी पिलाया और चुप चाप एक जगह पर जाल लगाकर बैठ गया नेवले ने पूछा कि क्या बात है तुम इतने उदास क्यों हो मछुआरे ने सारी बात बता दी नेवले ने कहा कि तुम चिंता मत करो सब कुछ ठीक हो जाएगा, जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ तुम्हें कुछ नहीं होगा मछुआरे को वहाँ जाल से एक भी मछली नहीं मिली, अब मछुआरा बहुत उदास हुआ नेवले ने कहा कि तुम घर कि ओर चलो और मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ मछुआरे ने नेवले को अपनी पोटली में रख लिया और घर कि तरफ़ चल दिया, थोड़ी दूर चलते ही वहीं साँप रस्ते में मिला और वह फुंफकारते हुए बोला कि मछलियाँ कहाँ हैंमछुआरे ने पोटली खोलकर नेवले को बाहर निकाल दिया नेवला पोटली से निकलते ही साँप पर टूट पड़ा, नेवले और सांप में खूब लड़ाई होने लगी सांप को काफी चोट भी लग गई सांप वंहा से जंगल कि तरफ़ भाग निकलामछुआरा नेवले को अपने साथ घर ले गया और इस प्रकार से घर में सही सलामत पहुच कर मछुआरे और नेवले ने साथ में कहना खायाइस प्रकार से मछुआरे और नेवले में पक्की दोस्ती हो गईअगले दिन से दोनों दोस्त साथ में मछली मरने जाने लगे
कहानी: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर

गुरुवार, 28 मई 2009

कविता: एक तालाब पर बैठा बगुला

एक तालाब पर बैठा बगुला॥
अपना ध्यान पानी लगाये।
मछली उछले उसको लपकूं॥
ये उसके मन में विचार आए
तभी एक केकड़ा पहुचाँ॥
झट उ़सने बगुले को दबोचा।
तब बगुले को समझ में आया॥
अ़ब करूँगा कभी शिकार।
तब केकड़े ने उसको छोड़ा
छूटते ही बगुले ने भर ली उड़ान।
और जा पहुँचा आसमान
कविता: ज्ञान , कक्षा 5, अपना घर
पेंटिंग: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर


कविता: जल है जीवन

जल है जीवन
जल है मेरा जीवन
क्या इसके बिना जीवन
सदा साफ जल को ही पिए।
खूब जीवन लम्बी जिए॥
सबकी प्यास बुझाता जल।
तन की थकान मिटाता जल॥
जल को बर्बाद करे हम।
जल को बचाए मिलकर हम॥
जाने कितने को देता है जीवन।
इसके बिना बेकार है जीवन॥
जल है मेरा जीवन।
इसके बिना क्या जीवन
कविता: मुहम्मद चंदन तिवारी, कक्षा , अपना घर

मंगलवार, 26 मई 2009

कविता: टेलीफोन

टेलीफोन
कितना अच्छा है टेलीफोन।
बातचीत का साधन टेलीफोन
दूर - दूर से बाते होती
जाने कैसे आवाज पहुँचती॥
सोच - सोचकर यही पछताता।
कैसे टेलीफोन बातें करवाता
टेलीफोन एक ऐसा रस्ता।
जोड़े एक दूजे का रिश्ता॥
इसमे है रुपये का खर्चा।
तभी तो है टेलीफोन का चर्चा

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर


मंगलवार, 19 मई 2009

कविता: चिड़िया खाए पान की पुड़िया

चिड़िया खाए पान की पुड़िया
एक डाल पर बैठी चिड़िया ।
खाके पान की पुड़िया॥
तब आकर बोली एक बुढ़िया।
तुम क्या कर रही हो चिड़िया॥
बोली गुस्से में आकर चिड़िया ।
खाए बैठी हूँ पान की पुड़िया॥
प्यार से कहते मुझको गुड़िया।
दिखता नही क्या तुझको बुढ़िया॥
सुनकर चिड़िया की ऐठी बतियाँ।
गुस्से से फ़िर भर गई बुढ़िया ॥
बोली ले जाउंगी पकड़ के घर में।
तुझसे खाना बनावऊँगी चूल्हे में।।
चिड़िया बोली आसमान में उड़ जाउंगी।
पकड़ न मुझको तुम पाओगी।।
मुहँ बनके रह जाओगी।
खाली हाथ ही घर जाओगी॥
कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर
पेंटिंग: लवकुश कुमार, कक्षा ५, अपना घर


कविता: प्यारे फूल

प्यारे फूल
कितने प्यारे फूल है।
सबके प्यारे फूल है॥
जब यह महके तो जग महके।
बगिया में खिलते हरदम रहके॥
इनको देख के खुलते अक्ल के ताले।
मन के हट जाते सब जाले॥
नही किसी से इनका बैर।
सब देशो से इनका मेल॥
हर देशो से इनका नाता।
फूल सभी के मन को भाता॥
दुनिया करती इनकी सेवा।
सेवा करो तो पाओ मेवा॥
फूल है दुनिया के नन्हें तारे।
तभी तो है ये सबके प्यारे॥
महक है इनकी कितनी न्यारी।
खुशबू देते कितनी सारी॥
सबके मन को लगती न्यारी।
फूल की दुनिया सबसे प्यारी॥

कविता: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर
पेंटिंग: आदित्य कुमार, कक्षा , अपना घर