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सोमवार, 27 जुलाई 2009

कविता: बरसते पानी में

बरसते पानी में
बरस रहा है पानी,
कैसे मै बाहर निकलू ....
इस पानी को कैसे बंद करें,
ये है ऊपर वाले की मेहरबानी.....
बरसते हुए पानी में,
बहते हुए पानी में....
नहाने का मन कर रहा है,
पर अन्दर से डर लग रहा है.....
पानी खूब बरस रहा है,
खेलने को मन तरस रहा है...

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

कविता: पानी काले बादल में

पानी काले बादल में
नीले नीले आसमान में॥
पानी काले बादल में
बादल है या कोई छाया।
ये तो है प्रकृति की माया॥
कब ये पानी बरसाएगा।
हमको कब तक तरसाएगा॥
जब यह पानी बरसेगा
धरती को पहले सींचेगा॥
हम भी नहायेंगे पानी में।
नाव चलाएंगे नाली में॥
पानी की बुँदे गिरेंगी तन पे।
मेरे मन को लगेंगी छन से॥
पानी में झम - झम कूदेंगे।
हम मस्ती में सब डूबेंगे॥
हम सब झूम के नाचेंगे।
संग में सबके गायेंगे॥
सबके संग नहायेंगे।
पानी से बाहर आयेंगे॥
पानी पाकर धरती होगी हरियाली।
घर- घर में आयेगी खुशियाली

लेखक: आदित्य कुमार, कक्षा ७, अपना घर, कानपूर



रविवार, 5 जुलाई 2009

कविता: आसमान में छाये बादल

आसमान में छाये बादल
आसमान में छाये बादल ।
काले नीले सफ़ेद
काले बादल ने ये बोला
मै पानी बरसाऊंगा
झट नीले बादल ने बोला
मै पानी भर लाऊँगा
सफ़ेद बादल भी पट से बोला
मै रस्ता दिखलाऊँगा

लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर