रविवार, 14 जून 2009

कविता: चारो चोर गए सुधर

चारो चोर गए सुधर
एक गाँव में चार थे चोर।
रोज पकड़ते थे वे मोर॥
एक चोर पकड़ गया थाने में।
तीन गिर गए नाले में॥
नाले में भर गया था पानी।
चोरों की हो गई बदनामी॥
छोड़ी चारों ने बईमानी।
ख़त्म हुई उनकी शैतानी॥
चारो अब तो गए सुधर।
भाग के पहुँचे अपने घर॥
खेत में करने लगे वे काम।
गाँव में हुआ फ़िर उनका नाम॥
ख़त्म हुई उनकी बदनामी।
यही है चार चोरो की कहानी

लेखक : ज्ञान कुमार, कक्षा , अपना घर




7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण जाखड़ ने कहा…

जनाब चोरों की कविता तो आपने अच्छी बुन दी, मुझे लगता है आपको ऐसे ब्लागर्स को लेकर काव्य भी बुनना चाहिए, जिसमें पता चले कि रात ग्यारह, बारह बजे शायर और कवियों की ही पोस्ट मिलती है। आप खुद गौर फरमाएं, चिट्ठाजगत पर जुड़े ब्लॉगर्स में मुझे रात में सत्तर फीसदी से ज्यादा कवि और शायर नजर आ रहे हैं।
कुछ कीजिए

प्रवीण जाखड़ ने कहा…

छोटे मियां आप अच्छा लिखते हैं, आपकी उम्र और काव्य को देकर हम पूरे इंप्रेस हो गए भाई।

राज भाटिय़ा ने कहा…

अरे बॆटा बहुत सुंदर कविता लिखी है मजा आ गया.
शावाश

M Verma ने कहा…

आप जैसे कवि होंगे तो चोरो को सुधरना ही पडेगा

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सही!! बालक को बधाई.

स्वप्न मंजूषा शैल ने कहा…

बेटे,
आपकी कविता ने हमारा मन मोह लिया, बहुत अच्छा लिखा है आपने, बस ऐसे ही लिखते रहिये,
और खूब खुश रहिये

बीना ने कहा…

चोरों को सुधारने का अच्छा तरीका बताया।बधाई