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बुधवार, 29 जुलाई 2009

कविता: कालू बन्दर

कालू बन्दर

एक था कालू बन्दर,
रहता था नाले के अन्दर...
एक दिन खा रहा था चुकंदर,
मस्ती में था नाले के अन्दर...
उतने में एक सांप आया,
उसने अपना फन जो उठाया...
बन्दर जी की घिघ्घी बन गई,
हालत उनकी पतली हो गई...
कालू बन्दर भागे अन्दर,
उनके हाथ से गिरा चुकंदर...
आगे मिल गई नागिन रानी,
बोली बन्दर भैया पीलो पानी...
कालू बन्दर नाले से भागे,
पेड़ पर चढ़ कर जम के हाफें...
याद गई बन्दर को नानी,
खत्म हो गई अपनी कहानी...

लेखक: मुकेश, कक्षा ८, अपना घर

मंगलवार, 26 मई 2009

कविता: पेड़.

पेड़
पेड़ है देखो कितने प्यारे।
ये तो है सबसे न्यारे ॥
पेड़ के सहारे सब जीते है।
पंछी तेरा रस पीते है ॥
फल को खाकर हम जीते है ।
छाँव में तेरे सुख पाते है ॥
तुम तो हो स्वपोषी ।
जीते तुमसे परपोषी ॥
तुमसे बहती जीवन की धारा ।
तुम तो हो जीवन का तारा ॥
तुमको हमें बचाना है ।
पेड़ों को खूब लगाना है ॥
कविता: सागर कुमार, कक्षा ५, अपना घर

सोमवार, 18 मई 2009

कविता: गर्मी


गर्मी
हवा चल रही है क्या पुरवाई ।
झूम रही है हर पेड़ की डाली॥
सन - सन चल रही गरम लपट।
पतंग हमारी उड़ रही है फटाफट॥
ऐसे में पतंग भला कौन न उडाये।
इतनी गर्मी में भला कौन न नहाये॥
चलो गर्मी के बहाने लस्सी पिया जाए।
लस्सी पीकर चलो पेड़ के नीचे बैठा जाए॥

कविता: आदित्य कुमार, कक्षा ६, अपना घर
पेंटिंग: अक्षय कुमार, कक्षा ६, अपना घर