बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

कविता: चाय गरम

चाय गरम

चा बनी है गरम - गरम,
ठंढ़ी लगे नरम - नरम।
चाय पीये हम गरम - गरम,
ठंढ़ी लागे हमको गरम
ठंढ़ी से हम सबको बचना होगा,
इसका हमको ध्यान रखना होगा


लेखक: ज्ञान कुमार, कक्षा ६, अपना घर

1 टिप्पणी:

मनोरमा ने कहा…

बहुत अच्छा प्रयास है आपलोगों का, अपने सपनों पर यकीन रखो आैर हकीकत बने सारे ख्वाब तुम्हारे इसके लिए मेहनत करो, सब अड़चनें दूर होंगी आैर मंजिल जरूर मिलेगी।