शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

कविता -रेल

रेल

रेल चली भाई रेल चली
दस दस डिब्बे साथ में ले चली
रेल के डिब्बे बड़े ही भारी
उस पर बैठी जाने कितनी सवारी
रेल का लगता बड़ा ही भाड़ा
लोग फैलाते जाने कितना कूड़ा
रेल है भारत की सम्पत्ती
जब चलती है तो धरती- हिलती
किसी के रोके से रुकती
ऐसा लगता मानो गई कोई विपत्ती
रेल किसी को नहीं जानती
जो भी आगे आता ,उस पर चढ़ जाती

लेखक आशीष कुमार, कक्षा , apna ghar

1 टिप्पणी:

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छी कोशिश !!