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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

kavitaa :bhor mausaphir ghar se nikala

भोर मुसाफिर घर से निकला

भोर मुसाफिर घर से निकला , 
संग में लेके एक थैला ....
आगें बढ़ा तो पड़ा मिला झोला,
जैसे ही उसने उसको खोला ....
जिन हां-हां कर निकला ,
 बोला जो हुक्म मेरे आका ....
कोई न कर पायेगा आपका बाल भी बांका ,
तुमने मेरी जान कैद से छुड़ाई ....
जो मागोगे सब कुछ दूंगा चाहे हलुआ हो या मिठाई,
मुसाफिर बोला यदि तुम हो जिन .....
तो मुझको करो मालामाल रातो-दिन ,
मैं बन जाऊं इतना अमीर ....
और कोई न हो मुझ जैसा बीर ,

लेख़क :आशीष कुमार 
कक्षा :८
अपना घर 

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

कविता: एक नया देश बना दो .....

एक नया देश बना दो .....

चाँद से सूरज को मिला दो।
दिलो में जमी बर्फ पिघला दो॥
मै बहुत जोर से प्यासा हूँ।
मुझे थोड़ा पानी पिला दो॥
जमी को आसमां से मिला दो।
दिल की हर नफरत भुला दो॥
पर्दे तो हिलते ही है हवाओ से।
ताकत है तो दीवारों को हिला दो॥
बादल को बादल से लड़ा दो।
आकाश में बिजली चमका दो॥
क्योकि ये जमी है बहुत प्यासी।
इसे जी भर पानी पिला दो॥
हर भरे गोदामों को तोड़ दो।
अनाजों की बोरियां खोल दो॥
हर कोई है यंहा पर भूखा।
हर भूखे को खाना खिला दो॥
सत्य और न्याय को जगा दो।
शांति और प्यार फैला दो॥
हर कोई जी सके सुख से।
ऐसे एक नया देश बना दो॥

लेख़क : आशीष कुमार, अपना घर, कक्षा 8

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

कविता -रेल

रेल

रेल चली भाई रेल चली
दस दस डिब्बे साथ में ले चली
रेल के डिब्बे बड़े ही भारी
उस पर बैठी जाने कितनी सवारी
रेल का लगता बड़ा ही भाड़ा
लोग फैलाते जाने कितना कूड़ा
रेल है भारत की सम्पत्ती
जब चलती है तो धरती- हिलती
किसी के रोके से रुकती
ऐसा लगता मानो गई कोई विपत्ती
रेल किसी को नहीं जानती
जो भी आगे आता ,उस पर चढ़ जाती

लेखक आशीष कुमार, कक्षा , apna ghar