शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

kavitaa :bhor mausaphir ghar se nikala

भोर मुसाफिर घर से निकला

भोर मुसाफिर घर से निकला , 
संग में लेके एक थैला ....
आगें बढ़ा तो पड़ा मिला झोला,
जैसे ही उसने उसको खोला ....
जिन हां-हां कर निकला ,
 बोला जो हुक्म मेरे आका ....
कोई न कर पायेगा आपका बाल भी बांका ,
तुमने मेरी जान कैद से छुड़ाई ....
जो मागोगे सब कुछ दूंगा चाहे हलुआ हो या मिठाई,
मुसाफिर बोला यदि तुम हो जिन .....
तो मुझको करो मालामाल रातो-दिन ,
मैं बन जाऊं इतना अमीर ....
और कोई न हो मुझ जैसा बीर ,

लेख़क :आशीष कुमार 
कक्षा :८
अपना घर 

1 टिप्पणी:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

मजेदार है कविता ....