रविवार, 6 फ़रवरी 2011

शीर्षक- गंगा

कविता - गंगा
गंगा हमारी कितनी प्यारी ,
पानी होता न्यारा.....
गंगा हैं साफ और निर्मल,
गंगा हैं मेरी कितनी शीतल.....
लगता हैं बिलकुल  हैं पीतल,
एक बात हैं बड़ी निराली ......
नहीं हैं यह सुनने वाली ,
गंगा हमारी कितनी हो गयी मैली......
क्यों की सभी लोग फेकते हैं थैली ,
लोग कितनी गन्दगी फैलाते हैं ....
गंगा को प्रदूषित कर देते हैं ,
गंगा को साफ स्वच्छ बनाना हैं....
 गन्दगी को दूर हटाना हैं ,
तब हमारी गंगा साफ स्वच्छ हो जायेगी......
तब सभी के लिए खुशी की बात हो पायेगी......
लेख़क -मुकेश
कक्षा -९
अपना घर कानपुर

3 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर कविता....

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुंदर कविता|

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (7/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com