सोमवार, 13 अगस्त 2012

शीर्षक :- कब तक याद रखेगा

शीर्षक :- कब तक याद रखेगा 
कब तक याद रखेगा....
तेरा ये गाना वो ज़माना,
कभी तो आएगा अपना गाना....
जो गायेगा ये जमाना,
हिंसा मुक्त जहाँ मजदूरी हो....
सबको बोलने की आजादी हो,
न बीजा हो न बाडर हो....
सब को जाने की आजादी हो,
पी0 एम0 हो डी0 एम0 हो....
न कोट बूट न सूट हो,
तन में खादी कुर्ता हो....
न नेता अफसर गुंडा हो,
न स्विज बैंक में पैसा हो....
जितना भी हो कार्य देश में,
उसका विवरण हो जनता के हाथ में....
न छोटा कोई न बड़ा हो नाम में,
सबको बराबर अधिकार हो....
कब तक याद रखेगा,
तेरा ये गाना वो जमाना....
कवि :-अशोक कुमार
कक्षा :-10 
अपनाघर

रविवार, 12 अगस्त 2012

शीर्षक :- कैसी ये जिन्दगी है

शीर्षक :- कैसी ये जिन्दगी है 
कैसी ये जिन्दगी है.... 
कुछ समझ में नहीं आता, 
रात दिन सुबह शाम.... 
सिर्फ पेट ही सबको भाता, 
सोचता हूँ कुछ पल.... 
दूसरों के  लिए जी लूं, 
पर ये पेट है जो मेरा पीछा नही छोड़ता.... 
और कहता पहले खुद के लिए जियो, 
फिर दूसरों के लिए जीना.... 
कैसी ये जिन्दगी है, 
कुछ समझ में नहींआता.... 
कवि : सागर कुमार 
कक्षा : 9 
अपनाघर 

शनिवार, 11 अगस्त 2012

शीर्षक:- प्रकृति

शीर्षक:- प्रकृति
प्रकृति को इस वक्त....
जो दिया जा रहा धोखा,
एक दिन जरुर आएगा....
प्रकृति का दिया हुआ झोका,
जिसमें होगा सब कुछ....
मर मिटने को तैयार,
इसीलिए तो मैं कहता हूँ....
इतने अत्याचारी न बनो यार,
प्रकृति को जब अपना....
खुमार आ जायेगा,
तो इन हत्यारों को....
बुखार आ जायेगा,
उस खुमार की आंधी में....
जब सब कुछ उठ जायेगा,
तब किसी कोने में बैठ....
वही हत्यारा चिल्लाएगा,
तब जो भी उस वक्त....
रोता हुआ पाया जायेगा,
तो शायद वह केवल गीत गायेगा....
मैं तो चाहता हूँ की तुम,
अभी से गीत गाते रहो....
प्रथ्वी यूँ ही सुख चैन से चलाते रहो,
उस समय जो भी....
गुमसुम सा जायेगा पाया,
उसके द्वारा यही....
गीत जायेगा गुनगुनाया,
इन खुबसूरत फूलों से....
सजी इस धरती को मत उजाड़ो,
इस न्यारी सी धरती को....
कवि :- सोनू कुमार
कक्षा :- 11
अपनाघर

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

शीर्षक :- बात

शीर्षक :- बात 
बात की भी क्या बात है....
बातों से भी बड़ी बात है,
बात का बड़ा प्रभाव है....
बात से भी होता घाव है....
किसी बात पर आता है गुस्सा ,
तो किसी बात पर आता हँसना....
बड़ा ही कठिन है भाई,
बात के इस अर्थ को समझना....
सिर्फ एक ही बात से हुई,
इस महाभारत की रचना....
पता नहीं कौन सी बात, किसको बुरी लग जाये,
भाई मुंह की इस बात से बचना....
बात के है बहुत प्रकार,
छोटी बात, बड़ी बात, मीठी बात, कडवी बात....
इन बातों ही बातों में तो हो जाती है घूंसा लात,
कवि : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9 
अपनाघर

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

शीर्षक :- आसमान

शीर्षक :- आसमान 
आसमान क्यों नीला-नीला....
आम क्यों हैपीले-पीले,
बादल क्यों है काले-काले....
क्या हमने कभी ये सोंचा है,
क्या हमने कभी ये जाना है....
रूप को पहचाना है,
आखिर इनमे क्या है खास....
ये बात मुझे नहीं आ रही रास,
उनके विषय में जानना एक कला है....
उनको पहचानना एक राज है,
आसमान क्यों नीला-नीला....
हरा भरा और रसीला,
कवि मुकेश :कुमार 
कक्षा : 11 
अपनाघर 

बुधवार, 8 अगस्त 2012

शीर्षक :- कदम

शीर्षक :- कदम 
इन छोटे-छोटे हाथों को....
ऊपर उठने की आजादी दो,
बंध कर धागों में....
उन पतंगों को उड़ने दो,
इन छोटे-छोटे पैरों को....
कब चलने की आजादी दो,
अब समय आ गया इनका भी....
अब ये कुछ भी करेंगे,
रुक-रुक कर जो इनके....
नन्हे-नन्हे कदम आगे बढ़ेंगे,
इनके कदमों के बढ़ने से....
यदि ये हो गए सफल,
क्योंकि ये इन्साफ की....
डगर पर, जो रहे है चल,
चल पड़े है तो अब....
ये  नहीं रुकने वाले,
क्योंकि इनके कदम है....
संभल-संभल कर आगे बढ़ने वाले,
आंधी में भी ये....
तूफान की तरह बढ़ रहे है,
इनको तो अब देख-देख....
घूंसखोर भी अब डर रहे है,
चल पड़े है तो अब....
ये नहीं रुकने वाले,
क्योंकि इनके कदम संभल-संभल....
कर आगे बढ़ने वाले,
कवि : सोनू कुमार 
कक्षा : 11 
अपनाघर

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

शीर्षक :- दिन ने कहा

शीर्षक :- दिन ने कहा 
दिन ने दिनकर से कहा....
दिनकर हो तुम बड़े महान,
सुबह होते ही....
तुम मेरी गोद में,
कर देते हो उजाला....
और हो जाता है,
सभी प्राणियों का बसेरा....
तब दिनकर ने कहा,
मैं नहीं इतना महान....
मुझसे भी है कुछ और,
जो फैले चारों ओर....
कवि : ज्ञान कुमार
कक्षा : 9 
अपना घर 

सोमवार, 6 अगस्त 2012

शीर्षक :- दुःख सुख

शीर्षक :- दुःख सुख 
दुःख तेरे हम दर्द है....
सुख तेरे दर्द है,
ये किस्मत का खेल है....
ये तेरे कर्म है,
जो तेरे साथ है....
दुःख सुख का खेल है,
सारे जग मे दोनों का मेल है....
खेलते ये सब खेल मिलके,
हर के लिए शुरू होता है खेल....
जो आता इस जग में,
उससे होता है इसका मेल....
सुख दुःख को वे क्या जाने,
जो यूरो-डालर कमाते है....
दुःख सुख तो उनसे पूछो,
जो कड़ी धूप में फसलें रोपा करते है....
दुःख तेरे हम दर्द है,
सुख तेरे दर्द है....
ये किस्मत का नहीं,
ये तेरे कर्म है....
जो तेरे साथ,
कवि :अशोक कुमार 
कक्षा :10 
अपनाघर 

रविवार, 5 अगस्त 2012

शीर्षक :- ये सब सपने में

शीर्षक :- ये सब सपने में 
तपती धरा उबलता रवि....
प्रकृति पर लिखता है कवि,
ये क्या संसार है.... 
सबको अपने जीवन से प्यार है,
ये संसार हमारा है....
संसार में जो आता है,
वह जरुर ऊपर जाता है....
ये कवि का कहना है,
कवि रवि से कहता है....
तू क्यों ? अकेला रहता है,
तुमसे दुश्मन डरता है....
या दोस्ती नहीं करना चहता है,
तू रवि...................
तुझसे कवि कहता है,
प्राणी मानवों को इतनी रोशनी देता है....
उदास क्यों रहता है,
तुम्हे ठंडी में लोग देखने को तरसे है....
गर्मी में क्यों आग बरसते हो,
मैं हूँ एक मात्र कवि....
तुम दोस्ती करोगे रवि,
इतने में घनघोर गगन छाया....
मैं निकल पड़ा अपने आगन में,
मैंने खूब की बरसात में मस्ती....
देखते ही देखते डूब गई पूरी बस्ती,
कवि ने रवि को आवाज लगाई....
तू क्यों सुन नहीं रहा भाई,
लगता मुझसे डर गया भाई....
ये तो थी कवि की रचना,
सोया जो रात में, देख रहा सपना....
कवि : चन्दन कुमार
कक्षा : 7 
अपना घर  

बुधवार, 1 अगस्त 2012

कहानी :- लालची महापुरुष

कहानी :-  लालची महापुरुष 
आप सभी लोंगो ने बहुत सी कहानियां पढ़ी होंगी और सुनी भी होंगी हो सकता है। कि आप ने लिखा भी हो, आज मै आपको जिस कहानी से परिचित कराने जा रहा हूँ। वह वाकई में सुनने और सुनाने लायक है।
         भयानक घना जंगल था। और उस जंगल में से अजीब-अजीब सी चीखें और डरावनी आवाजें सुनाई दे रही थी। जंगल इतना घना था, कि धोखे से यदि एक पक्षी भी किसी झाड़ी में फंस जाये तो उसे निकलने में काफी वक्त लग जायेगा। आखिर उस जंगल में घुसने की चेष्टा कौन करेगा। आइये आगे बढ़ते है, कि आगे क्या हुआ ? यह जो जंगल था, उस जंगल तह पहुँचने के लिए सर्वप्रथम पहाड़ों पर चढ़ना और उन पहाड़ों को पार कर कटीली झाडियों से चौड़ी नदी पड़ती थी। जो भी उस नदी के किनारे पहुँच जाता था। तो उस नदी को पार करने के लिए बहुत देर तक इंतजार करना पड़ता था। क्योंकि उस नदी में केवल एक ही नाव चलती थी, वो भी मुफ्त में बिना पैसे लिए वह नाव ही किसी भी व्यक्ति को उस पार ले जाने और इस पार लाने के लिए उपलब्ध थी। लेकिन एक शर्त थी जो भी उस नाव में बैठता नाव चलाने वाला उससे प्रश्न करता था। यदि सही जवाब होता तो नाव नदी में डूब जाती थी। इस तरह से बहुत से व्यक्ति गए और जंगल में पहुँचने से पहले ही नदी में डूब कर मर गए। मैं आप लोगों को यह बताना भूल ही गया कि आखिरकार उस जंगल में लोग जाते ही क्यों थे ? वो इस लिए की उस जंगल में जो भी एक बार यदि धोखे से भी पहुँच जाये। तो उसका भला ही भला होता था। वैसे तो वहां पर पहुँचाना ही मुश्किल था। पर  कुछ भी हो एक पढ़े लिखे व्यक्ति ने दिमाग लगाया। एक न बोलने वाले( गूंगा ) को पढ़ा-लिखा कर उस जंगल में भेजा। जिससे नाविक उससे कोई भी प्रश्न पूछे तो वह जवाब ही न दे पाए क्योंकि वह तो  गूंगा था। इस तरह  से उस होशियार व्यक्ति ने उस गूंगे को लेकर नदी के तट तक किसी तरह से पहुँच गया। और उसने गूंगे को बैठा दिया। गूंगा बैठ गया लेकिन नाव आगे ही नहीं बढ़ रही थी। क्योंकि शर्त यह थी, कि नदी के पास जितने भी व्यक्ति होंगे वह सभी एक साथ ही एक बार में जायेंगे और एक बार जो बैठ गया तो उसका उतरना तभी संभव है। जब तक कि वह एक बार नदी पार कर जंगल में घूमकर वापस न आए अत: उन होशियार महापुरुष को भी बैठना पड़ा। जब नाव बीच में पहुँचने ही वाली थी। कि तभी उस नाविक नें एक प्रश्न पूछा ? एक ही प्रश्न अभी से पूछा जाता था। और उसमे शर्त यह थी कि जो पहले नाव में बैठेगा वही जवाब देगा अब वह जवाब कैसे देता ? क्योंकि वह तो गूंगा था। अत: इस प्रकार से वह दोनों नदी को पार कर उस घने जंगल में पहुँच ही गए। जंगल में प्रवेश करते ही उनको अचानक अचंभा हुआ। आज तक उन लोगों ने इतना घना जंगल कभी नहीं देखा था खैर छोडिये इन बातों में क्या रखा है। जंगल में पाई जाने वाली शक्ति( रहस्य ) के अनुसार वह दोनों बदल गए गूंगा बोलने लगा और दिमाग से भी तेज हो गया। होशियार महापुरुष तो इतने ज्ञाता हो गये कि कुछ कह ही नहीं सकते अंत में जब वह दोनों वापस नाव में बैठकर वापस हो रहे थे। तब नाविक ने पुन: वही प्रश्न किया। इस बार अचानक से गूंगे ने जवाब दे दिया क्योंकि जंगल की शक्तियों के अनुसार अब वह बोलने लगा था।  अत: गूंगे के जवाब देते ही नाव डगमगाने लगी। और नाव अब डूब रही थी अंत में नाव डूब ही गई। और वह दोनों बचते-बचते मारे गए वाकई में हमें इतना लालच नहीं न करना चाहिए कि हमें अपनी जान तक कि परवाह न हो। 
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें "लालच नहीं" करना चाहिए  

लेखक : आशीष कुमार , कक्षा : 10 , "अपना घर" 

शीर्षक :- ओलम्पिक

शीर्षक :- ओलम्पिक 
शुरू हुआ अब ओलम्पिक का खेल....
आ गए सब दूर देशों के खिलाडी,
हुआ कम्पटीशन निशानेबाजी का....
पड़ गया चीन का पलड़ा भारी,
चार साल के बाद शुरू होता है खेल....
खिलाडी करते है खूब मेहनत,
जीत-जीत स्वर्ण पदक ये....
बटोरते है खूब शोहरत,
एक बार जो चूक गये....
करना पड़ता है लम्बा इंतजार,
चार साल की ये मेहनत....
हो जाती है बेकार,
कवि : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9 
अपना घर