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सोमवार, 10 सितंबर 2012

शीर्षक:- कुछ पल की बातें

शीर्षक:- कुछ पल की बातें 
हर पल एक बात। 
नयी शुरू होती है।। 
दो पल की बातें है। 
जो हर पल होती है।। 
शुरू में वे मीठी लगती है। 
घुल मिल जाने के बाद।। 
वही बात बुरी लगती है। 
हा-हा ही-ही की बातों में।। 
वही बात बुरी लग जाती है।
वही बात सभी से होती है।। 
जो मिलता उसी पर चर्चा होती है। 
जब भी होती चर्चा।। 
एक नयी बात जुडती है।
हर पल एक बात।। 
नयी शुरू होती है। 
कवि:- अशोक कुमार 
कक्षा:- 10 
अपना घर 

सोमवार, 20 अगस्त 2012

शीर्षक :- हमें दुःख है अपनी आँख से

शीर्षक :- हमें दुःख है अपनी आँख से 
हमें बड़ा दुःख है....
अपनी आँख से,
आँख से आँख से....
इसकी चाहत से,
इसकी कुदरती चाल से....
लोग बड़े परेशान है,
आँख से आँख से....
क्या-क्या नहीं होता,
आँख से आँख से....
क्या सोंचा है आपने?,
अपनी आँख से....
बड़े नज़ारे देखे है,
आपने आपने....
अपनी आँख से,
आँख से आँख से....
हमें बड़ा दुख है,
अपनी आँख से.... 
आँख से आँख से,
कवि:- अशोक कुमार 
कक्षा:-10
अपना घर 

सोमवार, 13 अगस्त 2012

शीर्षक :- कब तक याद रखेगा

शीर्षक :- कब तक याद रखेगा 
कब तक याद रखेगा....
तेरा ये गाना वो ज़माना,
कभी तो आएगा अपना गाना....
जो गायेगा ये जमाना,
हिंसा मुक्त जहाँ मजदूरी हो....
सबको बोलने की आजादी हो,
न बीजा हो न बाडर हो....
सब को जाने की आजादी हो,
पी0 एम0 हो डी0 एम0 हो....
न कोट बूट न सूट हो,
तन में खादी कुर्ता हो....
न नेता अफसर गुंडा हो,
न स्विज बैंक में पैसा हो....
जितना भी हो कार्य देश में,
उसका विवरण हो जनता के हाथ में....
न छोटा कोई न बड़ा हो नाम में,
सबको बराबर अधिकार हो....
कब तक याद रखेगा,
तेरा ये गाना वो जमाना....
कवि :-अशोक कुमार
कक्षा :-10 
अपनाघर

सोमवार, 6 अगस्त 2012

शीर्षक :- दुःख सुख

शीर्षक :- दुःख सुख 
दुःख तेरे हम दर्द है....
सुख तेरे दर्द है,
ये किस्मत का खेल है....
ये तेरे कर्म है,
जो तेरे साथ है....
दुःख सुख का खेल है,
सारे जग मे दोनों का मेल है....
खेलते ये सब खेल मिलके,
हर के लिए शुरू होता है खेल....
जो आता इस जग में,
उससे होता है इसका मेल....
सुख दुःख को वे क्या जाने,
जो यूरो-डालर कमाते है....
दुःख सुख तो उनसे पूछो,
जो कड़ी धूप में फसलें रोपा करते है....
दुःख तेरे हम दर्द है,
सुख तेरे दर्द है....
ये किस्मत का नहीं,
ये तेरे कर्म है....
जो तेरे साथ,
कवि :अशोक कुमार 
कक्षा :10 
अपनाघर 

रविवार, 8 जुलाई 2012

शीर्षक :- हर बात की शुरुआत ही गाली है

शीर्षक :- हर बात की शुरुआत ही गाली है 
गर्मी के मौसम ने....
एक ऐसा चक्रव्यूह रचा है, 
जिसे देखने वाला ही.... 
परेशान हो गया है,
बरसात के मौसम में....
बारिश तो हो नहीं रही,
जो भी आसमान को देखता है....
गाली ही दे रहा है,
बरसात बहुत दिनों के बाद....
आयी तो जरुर है,
लेकिन उसके आने के अंदाज....
तो वाही पुराने हैं,
जिसकी बूंदों से....
लोग ही परेशान है,
जब बारिश की बूंद नहीं थी....
तब मानसून को गाली दिया करते थे, 
जब बारिश की बूंद आयी....
तो बूंदों को गाली दिया करते है,
इस जग के लोग भी....
बहुत परेशान रहा करते है,
जहाँ देखो जिस बात को सुनो....
उसकी शुरुआत ही गाली से किया करते है,
कवि : अशोक कुमार 
कक्षा : 10  
अपना घर

रविवार, 10 जून 2012

शीर्षक :- स्वप्न

शीर्षक  :- स्वप्न 
ह्रदय में हैं अनेक स्वप्न....
किन्तु घूम रहे हम लेकर उन्हें,
कब हो जाये ये अधूरे....
उनका नहीं कोई ठिकाना,
चलते है जैसे चार कदम....
बढ़ते स्वप्न हजार कदम,
जब स्वप्न हुए अधूरे....
नहीं देता कोई सहारा,
गिर जाते खाइयों पर....
नहीं कोई उठाने वाला,
देख नजारा जग मुस्कुराये....
जो चलते थे संग वो खुद न आये,
जब तक थी दौलत अपने संग....
लोग भी चलते थे संग,
ऐसे स्वप्नों को देखने से....
ह्रदय हुआ उदास,
न हुयी मन अभिलाषा....
पूरी हो गई प्यास,
ऐसे स्वप्नों को क्यों देखे....
जिनसे हो गए दिल उदास,
कवि : अशोक कुमार 
कक्षा : 10 
अपना घर

शुक्रवार, 8 जून 2012

शीर्षक :- शिक्षा

शीर्षक :- शिक्षा 
वह शिक्षा किस कम की....
जिसमें कोई सम्मान नहीं,
वह शिक्षा किस कम की....
जिसमें परसेंटेज नहीं,
वह सोंच विचार किस काम की....
जिसमें हर इन्सान की बात नहीं,
शिक्षा अब वही शिक्षा है....
जिसमे नंबर हो शानदार,
करें तारीफ हजार बार....
लग जाये कार्ड में हजार चाँद,
चमके जब एक साथ....
फैले प्रकाश चारों ओर,
जिसमें पथ दिखे हजारों मील....
जिसमे कहीं भी चल सको,
बंद करके अपनी आखें....
चल सको खुद को लेकर,
बनो सबका सहारा....
न खुद बनो वैशाखी का सहारा,
रहो हर पल खुद के सहारे....
शिक्षा वही शिक्षा है,
जिसमें खुद की पहचान हो....
नाम : अशोक कुमार 
कक्षा : 10 
अपना घर  

गुरुवार, 3 मई 2012

कविता :-किसी को कुछ याद नहीं

किसी को कुछ याद नहीं 
वृक्ष बड़े कोमल होते है....
ये भी मानों जैसे रोया करते है,
फर्क खाली इतना है कि.... 
ये सभी दुखों और सुखों में शामिल होते है,
इंसान की तरह नहीं कि रूठ जाते....
और किसी के यंहा जाया ही नहीं करते,
यही बड़ी इनकी खासियत की पहचान है कि....
ये किसी को दुःख देते नहीं,
इंसान भी क्या इन्सान है....
वृक्षों की उनको कोई परवाह नहीं,
जब मर्जी उनको गिरा दिया करते है....
यह उनको तो पता नहीं कि,
वृक्षों से ही यंहा इंसान है....
यह किसी इंसान को याद ही नहीं है, 
नाम :अशोक कुमार
कक्षा:9
अपना घर  

सोमवार, 29 अगस्त 2011

कविता : हम किसे कहें आजादी

 हम किसे कहें आजादी

हम किसे कहें आजादी ,
हम तो हैं बचपन से गुलामों के बंधन में.....
कभी घर के तो कभी बाहर के,
यह क्या है फिर आजादी......
सारा जीवन तो है गुलामी में,
फिर हम किसे कहें आजादी......
हम हैं बचपन से गुलामों के बंधन में,
कभी घर के तो कभी बाहर के.......

लेखक : अशोक कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर

रविवार, 10 अप्रैल 2011

कविता : मानव-दानव का आधार मूल

मानव-दानव का आधार मूल 

मानव भी इस दुनियाँ में ,
दानव का आधार मूल ....
दानव जो हरकत करता,
वो मानव में हैं छुपी हुई....
जब-जब करता वो इस्तेमाल ,
होते दंगे और फसाद.....
दोनों में से कोई एक जीता ,
फिर वह अपना आतंक फैलाता ....
 न वह किसी को मानता ,
वह अपने खोया रहता .....

लेखक : अशोक कुमार 
कक्षा : 8
 अपना घर