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शनिवार, 18 अगस्त 2012

शीर्षक :- मेरा बचपन

शीर्षक :- मेरा  बचपन 
कहाँ गया वो मेरा बचपन....
छोटी सी इस दुनिया में,
जाने कहाँ खो गया वो बचपन....
मेरा बचपन बस अब एक,
याद बनकर ही रह गया....
सोंचता हूँ काश! वापस लौट आये,
मेरा वो प्यारा बचपन....
बचपन है एक ऐसा पल,
न होती इसकी सुबह, न आता कल....
याद आते हैं अब वो पल,
सोंचता हूँ कि काश!....
वहीँ ठहर जाता वो बचपन,
वो बारिश का पानी वो सावन के झूले....
वो पल भुलाये न भूले,
पीपल की वो छाँव....
कागज की वो नाव,
याद आता अपना गाँव....
पता नहीं कहाँ गया वो मेरा बचपन,  
अब एक याद बनकर ही रह गया....
कवि :- धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा :- 9 
अपना घर 

बुधवार, 1 अगस्त 2012

शीर्षक :- ओलम्पिक

शीर्षक :- ओलम्पिक 
शुरू हुआ अब ओलम्पिक का खेल....
आ गए सब दूर देशों के खिलाडी,
हुआ कम्पटीशन निशानेबाजी का....
पड़ गया चीन का पलड़ा भारी,
चार साल के बाद शुरू होता है खेल....
खिलाडी करते है खूब मेहनत,
जीत-जीत स्वर्ण पदक ये....
बटोरते है खूब शोहरत,
एक बार जो चूक गये....
करना पड़ता है लम्बा इंतजार,
चार साल की ये मेहनत....
हो जाती है बेकार,
कवि : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9 
अपना घर  

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

शीर्षक :- यही है हम नेताओं का चरित्र

शीर्षक :- यही है हम नेताओं का चरित्र 
हम नेता जब सत्ता में आते हैं....
अपने वादों को हम धूल में मिलाते हैं,
लूटते खूब जनता का पैसा....
ये सब लगता, एक खेल जैसा,
घोटाले पर घोटाला करके....
भ्रष्टाचार खूब फैलाते हैं, 
जाति-पाति के नाम पर....
वोट हमें मिल जाते है,
सोर्स शिफारिस और रिश्वत देकर....
नेता हम बन जाते है,
नेता बनने के बाद फिर हम....
पैसा खूब कमाते है,
स्विस बैंक से हमारा  नाता....
स्विस बैंक में ही खुलता खाता,
फिर भ्रष्टाचारी और घूंसखोरी बन जाते हमारे मित्र....
यही है, हम सब नेताओं के चरित्र,
कवि : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9 
अपना घर 

बुधवार, 20 जून 2012

शीर्षक :- गर्मी

शीर्षक :- गर्मी 
कड़ाके की इस गर्मी में....
हो रहा सब हाल बेहाल,
पर्यावरण के प्रति मनुष्य के इस व्यव्हार से....
हो रहा है सूरज पीला,लाल ,
मनुष्य अपने लाभ के लिए....
इन बेजुबान पेड़ों को काट रहें है,
काट काट इन पेड़ों को....
मौत सभी को बाँट रहे है,
प्यारी सी इस अपनी धरती को....
क्यों कर रहे हरियाली से दूर,
खूब सारे पेड़ पौधों को लगाकर....
आनन्द हम लें इसका भरपूर,
कवि : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर

गुरुवार, 14 जून 2012

शीर्षक :- नेता और महगाईं

शीर्षक :- नेता और महगाईं 
महगाईं का दौर है भईया....
नेताओं का है जमाना,
घोटाले पर घोटाला करके....
भर रहें हैं ये खजाना,  
इधर इस महगाईं से....
आम जनता इतनी तंग है,
आलू,बैगन,टमाटर,प्याज से....
छिड़ती आज उनकी जंग है,
पेट्रोल का बढ़ गया इतना दाम....
कहीं न लगता अब जाम,
कैसी है भाई ये नेता की चाल....
जिसने कर रखा सबको बेहाल,
कवि : धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा : 9
अपना घर  

बुधवार, 2 मई 2012

कविता:-मंहगाई

मंहगाई 
मंहगाई का भईया ये जमाना....
तो क्या छोड़ दें खाना खाना,
लेकिन अब ऐसा ही हो रहा....
मानव मंहगाई का बोझा ढो रहा,
वायरस की तरह फैलती है, मंहगाई....
इसी कारण भारत में गरीबी आई,
नेता तो हो गए हैं, भ्रष्टाचारी....
परेशान हैं, इससे सब नर-नारी, 
गरीबों का बचा था, सहारा आलू.... 
उसे भी खा मोटे हो गये लालू,
जनसंख्या का भी इस पर पड़ा प्रभाव....
रेसे से कैसे चलेगी गरीबों की नाव,
नाम :धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा :9 
अपना घर