शनिवार, 30 अगस्त 2025

कविता "एक न एक दिन वो भी आएगा "

  "एक न एक दिन वो भी आएगा "
लोगो ने उन जमीनों को कवजा लिया ,
जो उनके कभी थे ही नहीं। 
नदी का झोका फिर से आया ,
सबकुछ बहा ले गया छोड़ा कुछ भी नहीं। 
सब को पता था एक वो भी आएगा ,
एक न एक दिन सब कुछ बहा ले जाएगा। 
वो लेगी अपनी हिस्से की ज़मीन ,
देने में अगर की लापरवाहीं तो वो लेगी सबकुछ छीन। 
की जब न मिले शेर को उसका हिस्सा तो चिल्लाता हैं ,
तो उसे दहाड़ कहते हैं। 
ठीक उसी प्रकार नदी को न मिले तो बहा ले जाती सबकुछ ,
 तो उसे हम सभी बाढ़ कहते हैं। 
वो लेते अपने हिस्से का हक ,
जो की छीन ली गए थी वो आएगा सब को पता था ,
बहा ले जाएगी किसी को नहीं पता था। 
कवि: नवलेश कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर। 

कविता: "शायद हम बड़े होने लगे है "

 "शायद हम बड़े होने लगे है "
समय बदल गया और दोस्त भी बदल गए हैं  ,
और परेशानियों से खुद लड़ने लगेहैं।  
शायद हम बड़े होने लगे हैं। 
परेशानीयों का सामना अकेले ही करना पड़ता हैं ,
न किसी का हाथ होता है न किसी का साया। 
अब तो परेशानी को देख मुस्कुराने लगे हैं,
शायद हम बड़े होने लगे हैं। 
पढ़ाई के लिए कुरवानी होती हैं ,
और दोस्तों से भी परेशानी होती हैं। 
और परेशानियों से  खुद लड़ने लगे ,
शायद हम बड़े होने लगे हैं। 
कक्षा: गोविंदा कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर। 

बुधवार, 27 अगस्त 2025

कविता: "विचार"

 "विचार" 
बाढ़ से भी तीव्र गति से चलता ,
यह मन के विचार।
 यह शब्दों से आरपार कर जाते। 
एक ही पल में रुख बदल जाता है। 
सिक्के के दो पहलू गिना जाता।  
बाढ़ से भी तीव्र गति से जाता , 
 यह मन के विचार। 
यह हर दिलो का मालिक होता। 
लाखों प्रयास  बाद ,
यह अपने शब्दों को जीत दिलाता। 
यह अपना एक नया इतिहास रचता। 
अपने दिलो में बस जाता है। 
बाढ़ से भी तीव्र गति से चलता ,
 यह मन के विचार। 
कवि: अमित कुमार, कक्षा: 11th,
अपना घर।  

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

कविता: "आज कल का मौशम"

"आज कल का मौशम"
 चन मिंटो में मौशम ने मुँह मोड़ लिया ,
धुप काम होते ही पानी की बरसा किया।
प्यासे पौधे को पानी दिया ,
कच्चे सड़को को कीचड़ दिया, 
अचानक जब बारिश हुआ।  
रह - रह कर क्यों बरसया है ?
थोड़ा - थोड़ा सा ही पानी देता हैं। 
बारिश ने ला दिया मौशम में थोड़ा सा बदलाव ,
जिसने दिया बीमारियों को दावत,
बुखार का तो कोई समय नहीं। 
जिसका कोई कहर नहीं। 
फिर भी बरसने नाम नहीं लेता।
जिससे नदियाँ है बेहाल। 
कवि: अजय कुमार, कक्षा: 11th, 
 अपना घर। 

सोमवार, 25 अगस्त 2025

कविता: "जिन्दगी में कुछ करो "

 "जिन्दगी में कुछ करो " 
जिन्दगी में कुछ करना सीखो ,
पड़ - लिख कर कुछ ज्ञान सीखो। 
अगर जिन्दगी में कुछ करना है तो ,
उस हथियार को अपना अपना हथियार बनाना सीखो। 
हिम्मत हमें कभी हरनी नहीं है ,
कठिनाई का जम कर सामना करना सीखो। 
जिन्दगी में कुछ करना सीखो। 
अगर सफलता पानी हैं तो ,
हथियार को अपना हथियार बनाकर लड़ना सीखो ,
जिन्दगी में कुछ करना सीखो।
कवि: विष्णु कुमार, कक्षा: 6th,
अपना घर। 

कविता: "हवाए आ चली"

 "हवाए आ चली"
 ठंडी सी हवा गुजरी पैरो से ,
जो ऐसा ठंडक दे गया। 
दिल को दहका दिया इस तरह ,
जो दिल को भी भयभीत हो गया। 
रूह काँप उठे थे मेरे ,
जब देखा परछाई काले - सुनहरे बदल को ,
बस आँखे तिकी थी मेरी उस पर। 
हिम्मत तो मर गई ,
धीरे - धीरे पास आती गई। 
मैं खामोश था धड़ कने बढ़ती गई ,
चिल्लाने कि कोशिश तो थी मेरी। 
बस आवाज अटका था , 
पैर काँप रहे थे मेरे। 
पर मैं खामोश था। 
कवि: सुल्तान कुमार, कक्षा: 11th, 
अपना घर। 
 

रविवार, 24 अगस्त 2025

कविता: "बहन तेरी याद आती है"

"बहन तेरी याद आती है"
बहन तेरी याद आती है ,
न जाने क्यों तेरी याद आती है। 
वो खुशहाली के दिन ,
मुझे आज भी  रुलाती है। 
बहन तेरी याद आती है। 
तेरी हर एक स्माइल मेरे मन को मोह लेती है , 
तेरी हर एक उदासी मेरे खुशियाँ छीन लेती हैं। 
तेरी राखी आज भी मेरी तिजोरी में रखी हैं ,
 पर न जाने क्यों ये दिल मेरा किसी और से दुखी है। 
बहन तेरी याद आती है ,
न क्यों तेरी याद  पल सताती है। 
एक समय था जब रोते हुए  को हसाया ,
पर न जाने क्यूँ हसते हुए को रुलाया। 
बहन तेरी याद आती है। 
तू जब दूर होती हो , फिर भी मेरे पास होती हो। 
न जाने क्यों तेरी याद आती है। 
कवि: निरु कुमार, कक्षा: 9th, 
अपना घर। 

शनिवार, 23 अगस्त 2025

कविता: "वो ज़माने का एक पल"

 "वो ज़माने का एक पल"  
वो ज़माने का  एक पल ,
जिसमें  सब के सपने झूला करता था। 
 मैं भी मन ही मन फूला करता था ,  
सोच बड़ी थी और मेहनत कड़ी थी। 
फिर भी उसी रास्ते पर चलना जल्दी पड़ी ,
मुशीबत भी आ बैठी थी सिर पर। 
चलने को ना मिला कोई रास्ता ,
मैं भी यह थान लिया  करना है कुछ खास जरा  ,
वो मंजिल का एक रास्ता। 
जिसमे  पड़ा था कुछ खास जरा ,
वो ज़माने का एक पल। 
कवि: अजय  कुमार, कक्षा: 6th, 
अपना घर। 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

कविता: "सपनो में खोया जहाँ"

"सपनो में खोया जहाँ"
सपनो में खोया जहाँ ,
तपती धुप की परवाह नहीं ,
सीतल हवा चली मन को छूने। 
तीर्व गति से वह बिखराती ,
निर्मल बुँदे अपनी पंखा पसार। 
सपनो में खोया जहाँ। 
गुनगुनाती वह नाजुक कलियाँ ,
बातो - बातो में कुछ कह जाती है ,
कही दूर से चली महकती हवा ,
एक नई सन्देश अभास करती है। 
सपनो में खोया जहाँ ,
तपती धुप की परवाह नहीं ,
सपनो में खोया जहाँ। 

कवि: गोपाल कुमार, कक्षा: 6th,
अपना घर। 

कविता: "कहानी जिक्र का"

 "कहानी जिक्र का"
 मैं हारा तो नहीं मगर ,
अँधेरे की छाया से, 
ताब्यात हल्की सी बेहतर से बत्तर है। 
हँस पाता हूँ आज भी मैं ,
यह जानकर सुन तौबा मेरे, 
कि फिर उग आया बड़े बड़े इरादे से मैं।  
जैसे किसी बीते जन्मो में जरूर कभी ,
न हारने की कसमे  हो खाई। 

आज भी बराबर जोश और जज्बा है। 
एक नया कहानी बोने का जिसे सुन - जान - बूझकर , 
दर चिंता और रोग आएगा। 
मेरे प्रिय शत्रु को। 

अंत तो नहीं मगर, 
कहानी दोहराने जरूरत पर लौटा। 
सुन हुकूमत साहिल को भी होगा ऊंची लहरे से। 
एक कहानी जिक्र का ,
सितारे के बीच छोड़ जाना होगा। 
 मैं हारा तो नहीं मगर ,
अँधेरे की छाया से, 
ताब्यात हल्की सी बेहतर से बत्तर है। 
कवि: पिन्टू कुमार, कक्षा: 10th,
अपना घर 

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

कविता: "कुछ करना है"

"कुछ करना है"
 सिर पर भरी बोझ आ गया है ,
ठान लिया हूँ अब कुछ करने का। 
चला जाऊ कही और नया बसेरा में ,
मन नहीं लगता कुछ करने का। 
वापस चला जाऊ उस स्वतंत्र आकाश में ,
जहाँ कोई रोक - टोक न हो। 
मुक्त हो जहाँ इन मोटी बेड़िया से ,
जहाँ कोई रोक - टोक ही न हो। 
ठान लिया हूँ मन में एक बात जो है, बहुत खास। 
बीत गया वो दो पल मेरे लिए बन के बस राख। 
सिर पर भरी बोझ आ गया है,  
ठान लिया हूँ अब कुछ करने का। 
 कवि: मंगल कुमार, कक्षा:9th,
अपना घर।