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रविवार, 25 अक्टूबर 2020

दशहरा का त्योवहार आया है।

 "दशहरा का त्योवहार आया है "
दशहरा का त्योवहार आया है।
बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाया है।।
नये -नये तरह के खिलौने लाया है।
झूले भी बहुत लगवाया है ।।
झूला देख बच्चों के चेहरों पर मुस्कान आया है।।
बुराई का सच्चाई पर जीत का मौका आया है।
चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ छाया है।।
दशहरा का त्योवहार आया है।
बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाया है।। 
 कविः -सार्थक कुमार ,कक्षा -10th ,अपना घर ,कानपुर 


 

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

मौसम मस्ताना हो चला है

" मौसम मस्ताना हो चला  है "
मौसम मस्ताना हो चला है।
बारिश  का स्तर बढ़ चला है।।
रिमझिम - रिमझिम बरस रहा है।
काली घटा का बवन्डर मड़रा रहा है।।
नदी तालाब सब भर चला है।
पूरे शहर में सड़कों पर पानी भर चला है।।
नदियों का स्तर बढ़ चला है।
किनारे पड़े घर फसल बह चला।।
 नदियों का स्तर बढ़ चला है ।
मौसम मस्ताना हो चला है।।
हर तरफ हरियाली  बढ़ चला है।।
मौसम मस्ताना हो चला है।
कविः - प्रांजुल कुमार ,कक्षा - 11th , अपना घर ,कानपुर ,

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

गरजने दो बादल को अब

" गरजने दो बादल को अब "

  गरजने दो बदल  को अब ,
बरसने दो पानी को अब |
मौसम है  हरियाली  का ,
 गायेंगे सब गीत खुशहाली  का ,
मेंढक खूब बोलेंगे | 
अपने  दिल की  राज  खोलेंगे ,
बच्चे कागज के कस्ती संग | 
 करेंगे मस्ती और तंग ,
बच्चे बूढ़े  और जवान |
 चलेंगे जब सीना तन ,
गिराने से चली जाएगी शान |
गरजने दो बादल को  अब,
बरसने दो  पानी को अब | 

कविः - शनि कुमार ,कक्षा, 9th, अपना घर,  कानपुर

 

 

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

कविता : नदियों के बीच से आती वो

" नदियों  के  बीच से  आती वो "

 नदियों के  बीच से  आती वो।
किलकारिंयो भरी आवाज।।
भरी गोद , अब याद  आती है।
खिलखिलाहट भरी मुस्कान।।
 आती है वो पुरानी  साड़ी  का मखमल।
भरा वो आँचल।।
लोरिंयो से भरी  वो रात।
माँ की सिखायी हर बात।।
बहुत याद आती  है।
छोटे - छोटे पैरों से बने पद चिन्ह।।
बचपन की  करते शरारते।
ननिहाल में बिताये वो दिन।।
बहुत  याद आते है ,
नदियो के बीच से  वो। 
किलकारियों भरी अवाज।।

कविः राज कुमार ,कक्षा :11th , अपना घर, कानपुर 

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

शीर्षक :- पानी

  "पानी"

  रिम -झिम -रिम झिम ,
 पानी बरस रहा है ।
 बच्चे  स्कूल जा रहे है ,
 बच्चा उठाता बर्तन धोता ।
 बर्तन धोकर पढ़ने जाता ,
 और कक्षा मे प्रथम है आता ।
 और मम्मी पापा को पढ़ाता ,
 पानी बरसे झम -झम ।
 स्कूल रोज जायेंगे हम ,

नाम :चन्दन कुमार, कक्षा :7, अपना  घर  ,कानपुर

शीर्षक :-मौसम

शीर्षक :-मौसम
मौसम सुहाना ,
मन   सुहाना ।
बदल को है आना ,
जल को है बरसाना।
मन को है  नहलाना ,
बरसात मौज मस्ती करना ।
दोस्तों को खुंशिया बाटना,
ये दिन हो अनमोल ।
इसका न कोई मोल ,
ये रतन बड़ा है अनमोल ।
नाम : हंसराज कुमार , कक्षा : 9, अपना घर ,कानपुर

शनिवार, 6 अगस्त 2011

कविता - जल

जल 
पानी जीवन हैं सबका 
 आदमी हो या बच्चा  
 जल तो होता हैं तरल 
 बहे तभी जब ढाल 
 H और O का मिश्रण  
 साथ में होता हैं लवण  
 रसायन  में जाना हमने 
  दो H और O इसमे 
 फ्री  में जल मिलेगा भइया 

गुरुवार, 9 जून 2011

कविता: वर्षा का मौसम आया है ...

वर्षा का मौसम आया है. 
संग ठंडी   हवाएं लाया हैं ..
छाता  लेकर निकले घर से. 
रपट पड़े हैं हम सर से.. 
अब हमको कौन उठाएगा.
कीचड़ से कौन बचाएगा..
अब तो हैं पानी बरस रहा. 
फिर डंडे हम पर बरसेगे..
अब घर हम कैसे जायेंगे.
माँ को कैसे समझाएँगे ?

साक्षी अवस्थी, कक्षा ६, 
पुत्री: बलराम अवस्थी, 
पता: नई बस्ती, लखीमपुर खीरी 

रविवार, 30 जनवरी 2011

कविता: हम बच्चे हैं..............

 हम बच्चे हैं......

बच्चे हैं, हम बच्चे हैं ,  हम बच्चे हैं हम ....
हम अच्छे हैं, हम सच्चे हैं,
हैं थोड़ा कच्चे हम .
हम करते हैं शैतानी, थोड़ा हैं नटखट,
धमा चौकड़ी खूब मचाते, करते उठा पटक.
हम बच्चे हैं, हम बच्चे ....
सपने हमको खूब हैं आते,
परियों के हम देश में जाते.
चाट और टाफी हमको भाते ,
पंख लगा कर हम उड़ जाते .
हम बच्चे हैं, हम बच्चे हैं .....
करते हैं नादानी  हम, पीते खूब हैं पानी हम, 
नानी के घर जाते हम, मिलकर मजे उड़ाते हम. 
हम बच्चे हैं, हम बच्चे हैं ......
आओं तुम भी मिल जाओ ,
हम संग बच्चे बन जाओ .
छुक -छुक कर के रेल चले जब,
तुम भी डब्बे बन जाओ .
हम बच्चे हैं, हम बच्चे हैं ,
हम बच्चे हैं हम ......

हम अच्छे हैं, हम सच्चे हैं,
है  थोड़ा  कच्चे हम.... 


लेख़क: महेश, अपना घर 

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

kavita: अब न गुस्सा करूँगा भाई.....

अब न गुस्सा करूँगा भाई.....

ऐसी खवाई जिसने की रोटी खाई.
उसकी खवाई मेरी समझ में नहीं आई.. 
रोटी खाकर उसने ली जब अंगडाई. 
उसकी खटिया बड़ी जोर से चरमराई.. 
जब देखा उसने खटिया से उठकर. 
चारो पाये अलग गिरे टूटकर ..
खटिया में लगी थी नकली लकड़ी.
गुस्से में उसने बीबी की चोटी पकड़ी..
पत्नी रोई, चिल्लाई खूब शोर मचाई.
इस झगड़े में बीबी को खो गई बाली..
बीबी बोली ढूंढ़कर दो मेरी बाली.
नहीं तो यह घर हो जायेगा खाली..
उसने बीबी को किसी तरह मनाया .
सोनार से सोने की बाली बनवाया ..
कान पकड़ कर उसने कसम खाई.
अब किसी से गुस्सा नहीं करूँगा भाई..


लेख़क: आशीष कुमार, कक्षा 8, अपना घर

बुधवार, 12 जनवरी 2011

कविता: जब भी देखू आकाश को............

जब भी देखू आकाश को ......

इस भूमि के हर किनारे से
देखों इस आकाश को॥
कंही काला कंही सफ़ेद।
क्यों है इसका ऐसा रंग॥
क्या किसी ने सोचा है।
उसको पास से देखा है॥
क्या किसी ने उसको समझा
पत्थर है या भाप का गोला
काश की
मै भी नभ उड़ जाता
आकाश को पूरा देख के आता
मेरी समझ में जाता आकाश।
जिससे मेरा भ्रम हो जाता साफ॥
जब भी देखू आकाश को
मन मचले उड़ जाने को

लेख़क: अशोक कुमार, कक्षा , अपना घर

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

कविता: राजा ने किया रानी से मजाक

राजा ने किया रानी से मजाक

एक
दिन राजा बोले रानी से ,
आलू लाओ जाकर खेतो से
रानी बोली मै नहीं जाउंगी खेतो में,
चाहे मुझको रखो तुम अपने घर में
सुनकर रानी की ऐसी बानी,
राजा पीने लगे जल्दी से पानी
राजा बोले मैंने तो मजाक किया,
तुमने उसको सच मान लिया
तुम तो हो इस घर की रानी,
समझा करो तुम मेरी बानी
रानी बोली ऐसा मजाक मुझसे करना,
चली जाउंगी मायके तब पछताते रहना।
राजा बोले माफ़ करो चुप हो जाओ रानी,
भूख लगी है लाओ जल्दी दे दो खाना पानी
किसकी कविता किसकी कहानी,
राजा रानी की ख़त्म हुई कहानी

लेखक: आशीष कुमार, अपना घर, कक्षा ७