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रविवार, 8 अप्रैल 2012

बसंत ऋतु

बसंत ऋतु
बादल आ गए फिर....
पानी भर कर अपने अंदर,  
रात में था खूब उजाला....
सुबह दिखा आसमान सिर्फ काला-काला,
फिर तो चली हवा-हवाई....
खेतों में सरसों लहराई,
पक्षी उड़े हैं बिना लगाये जोर....
चारों ओर मचा है सर्दी का शोर,
सभी पौंधो में लगी है डाली.... 
किसने पौंधो के पत्ते किये खाली,
फिर बादल जोर-जोर से गरजा....
मम्मी बोली बेटा जल्दी सो जा,
बरसा पानी बहे सभी नाले नाली....
फिर देखा तो पौंधो में कोपें निकली,
देख कर ये सौन्दर्य नजारा मेरे में को भाया....
क्योंकि अब बसंत ऋतु का मौसम आया,
लेखक :-आशीष कुमार 
 कक्षा :-9 
अपना घर   

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

विद्यार्थी

कविता : विद्यार्थी

एक विद्यार्थी....
जो है बड़ा स्वार्थी ,
और एक विद्यार्थी....
जो है सबका सार्थी ,
विद्यार्थी जीवन....
जिसमें बिता सारा बचपन ,
ये पीढ़ी है प्रथम श्रेणी....
कहीं सुलभ है तो कहीं दुर्लभ  ,
इस श्रेणी का है जो मुकाम....
मत होना ऐ तू नाकाम ,
ऐ विद्यार्थी ....
तू न बन स्वार्थी
नाम :आशीष कुमार 
 कक्षा :9 
अपना घर,    

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

kavita: अब न गुस्सा करूँगा भाई.....

अब न गुस्सा करूँगा भाई.....

ऐसी खवाई जिसने की रोटी खाई.
उसकी खवाई मेरी समझ में नहीं आई.. 
रोटी खाकर उसने ली जब अंगडाई. 
उसकी खटिया बड़ी जोर से चरमराई.. 
जब देखा उसने खटिया से उठकर. 
चारो पाये अलग गिरे टूटकर ..
खटिया में लगी थी नकली लकड़ी.
गुस्से में उसने बीबी की चोटी पकड़ी..
पत्नी रोई, चिल्लाई खूब शोर मचाई.
इस झगड़े में बीबी को खो गई बाली..
बीबी बोली ढूंढ़कर दो मेरी बाली.
नहीं तो यह घर हो जायेगा खाली..
उसने बीबी को किसी तरह मनाया .
सोनार से सोने की बाली बनवाया ..
कान पकड़ कर उसने कसम खाई.
अब किसी से गुस्सा नहीं करूँगा भाई..


लेख़क: आशीष कुमार, कक्षा 8, अपना घर

रविवार, 26 दिसंबर 2010

कविता: सर्दी का ये मौसम...

सर्दी का ये मौसम.....

सर्दी का ये मौसम बड़ा ही ठंढा- ठंढा।
फिर भी टीचर मारे बड़े जोर से डंडा॥
डंडा पड़ते ही अंगुली अकड़ जाती।
जब हाथों में गर्मी पड़ जाती॥
तब दर्द वह हमको लगती ।
अंगुलिया दर्द से हमें तड़पाती॥
मौसम तो है ये सबसे अच्छा।
पर ठंढ़ाती है हर एक कक्षा॥
अगर सर्दी का मौसम न आता।
तो स्वेटर, जैकेट पहनने को पछताता।।


लेख़क: आशीष कुमार सिंह, कक्षा ८, अपना घर

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

कविता: बिन पानी सब सून

बिन पानी सब सून

इस धरती पर है पानी की मारामार
तभी तो लोग करते पानी का व्यापार
क्या है ये गन्दा कोका कोला।
दिखने में लगता है काला-काला
गरीबो को लूटने वाला।
ये है लोगो की मौत का प्याला
फिर भी लोग इसी को पीते।
मना करो तो सीना तान के अड़ जाते
कहते मेरा पैसा हम कुछ भी पीये।
जीना हमें है हम कैसे भी जिए.. ?
पानी है धरतीवासियों का जीवन।
लोग सोचते है रूपए ही है जीवन
भला पानी हो इस धरती पर।
रुपया ही रुपया हो सबके घर
किसी नहीं ये सोचा होगा।
की बिन पानी तब क्या होगा
बिन पानी उगता अन्न बनता भोजन
तब असंभव हो जायेगा जीना सबका जीवन
पानी है तो ये धरती है जीवन सबको देती है
बिन पानी के रहने वालो की संख्या घटती है
अप्रैल, जुलाई, सितम्बर हो चाहे दिसंबर और जून
क्या होगा इनका मतलब जब बिन पानी सब सून


आशीष कुमार, कक्षा , अपना घर

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

कविता: राजा ने किया रानी से मजाक

राजा ने किया रानी से मजाक

एक
दिन राजा बोले रानी से ,
आलू लाओ जाकर खेतो से
रानी बोली मै नहीं जाउंगी खेतो में,
चाहे मुझको रखो तुम अपने घर में
सुनकर रानी की ऐसी बानी,
राजा पीने लगे जल्दी से पानी
राजा बोले मैंने तो मजाक किया,
तुमने उसको सच मान लिया
तुम तो हो इस घर की रानी,
समझा करो तुम मेरी बानी
रानी बोली ऐसा मजाक मुझसे करना,
चली जाउंगी मायके तब पछताते रहना।
राजा बोले माफ़ करो चुप हो जाओ रानी,
भूख लगी है लाओ जल्दी दे दो खाना पानी
किसकी कविता किसकी कहानी,
राजा रानी की ख़त्म हुई कहानी

लेखक: आशीष कुमार, अपना घर, कक्षा ७