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मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

बेजुबान जानवर

बेजुबान जानवर 
क्या आप इन बेजुबानो....
को सुन  सकते है,
क्या आप इनकी भलाई....
में कुछ कर सकते हैं,
क्या है इनकी आशा....
इन भले इंसानों से,
क्या आप समझ सकते....
हैं दर्द बेजुबानों के ,
ये बेजुबान जानवर....
कुछ बोल रहे है,
इनकी बातों को क्या....
आप सुन रहे हैं,
दिन पर दिन बड़े-बड़े....
जंगल क्यों काटे जा रहे,
इन बेजुबान जानवरों के....
घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं,
पल-पल क्षण-क्षण....
अब ये घटते जा रहे,
मनुष्य जैसे इस दुनिया में....
अत्याचारी बढते जा रहे,
मरे जा रहे हैं जानवर....
बनाये जा रहे हैं बंदी,
आज कल इनके लिए भी....
उपलब्ध है सुविधा चकबंदी,
अब इनकी सुविधा के लिए भी....
अपने हाथ बढाओ,
इस हरियाली हीन धरती पर....
बेजुबानों की दुनिया बसाओ,
इनकी भलाई तुम करो....
तो जरा मन से,
कैसा हो रहा है महसूस....
पूछ कर तो देखो इनसे,
मन ही मन दे रहे होंगे....
ये बेजुबान दुआएं,
शब्दों को नहीं इनकी भावनाओं को....
समझने का कष्ट उठायें,
लेखक :-सोनू कुमार 
कक्षा :-10 
 अपना घर

रविवार, 8 अप्रैल 2012

बसंत ऋतु

बसंत ऋतु
बादल आ गए फिर....
पानी भर कर अपने अंदर,  
रात में था खूब उजाला....
सुबह दिखा आसमान सिर्फ काला-काला,
फिर तो चली हवा-हवाई....
खेतों में सरसों लहराई,
पक्षी उड़े हैं बिना लगाये जोर....
चारों ओर मचा है सर्दी का शोर,
सभी पौंधो में लगी है डाली.... 
किसने पौंधो के पत्ते किये खाली,
फिर बादल जोर-जोर से गरजा....
मम्मी बोली बेटा जल्दी सो जा,
बरसा पानी बहे सभी नाले नाली....
फिर देखा तो पौंधो में कोपें निकली,
देख कर ये सौन्दर्य नजारा मेरे में को भाया....
क्योंकि अब बसंत ऋतु का मौसम आया,
लेखक :-आशीष कुमार 
 कक्षा :-9 
अपना घर   

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

विद्यार्थी

कविता : विद्यार्थी

एक विद्यार्थी....
जो है बड़ा स्वार्थी ,
और एक विद्यार्थी....
जो है सबका सार्थी ,
विद्यार्थी जीवन....
जिसमें बिता सारा बचपन ,
ये पीढ़ी है प्रथम श्रेणी....
कहीं सुलभ है तो कहीं दुर्लभ  ,
इस श्रेणी का है जो मुकाम....
मत होना ऐ तू नाकाम ,
ऐ विद्यार्थी ....
तू न बन स्वार्थी
नाम :आशीष कुमार 
 कक्षा :9 
अपना घर,    

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

कविता - बरसात का मानसून

कविता - बरसात का मानसून 
 ठंडी में हैं क्या पानी बरसा .
जीव जंतु की हो गयी अब दुर्दशा.....
वर्षा से जब धरती पर गिरी बुँदे ,
 उस समय मुझे ऐसा लगा ......
जैसे आ गया हैं बरसात के ,
 महीने का मानसून ......
 अब धूप भी नहीं निकल रही हैं ,
 जमीन में अब पैर फिसल रहे .......
 कही धोखा न हो जाये ऐसा ,
 जिसमे लग जाये ढ़ेर सारा पैसा .......
 लेखक - ज्ञान कुमार  
 कक्षा - 8  अपना घर , कानपुर 

कविता -मौन को हैं तोड़ना

कविता -मौन को हैं तोड़ना
तू चला हैं ,
 किस रह पे  ......
दुनिया भर में झमेला हैं,
तूने गमों को झेला हैं....
 मासूमियत झलकती हैं ,
तेरे चेहरे पर .....
रहम करेगा कौन ,
तू तो हमेशा रहता हैं मौन .....
अब न चलेगा बहाना,
तुझे है यदि आगे बढ़ना ......
तो पड़ेगा तुझे मौन तोड़ना........
लेखक - आशीष कुमार 
कक्षा -9 अपना घर , कानपुर  

कविता - पावन अवसर पर

कविता - पावन अवसर पर 
 नये साल के पावन अवसर पर ,
 रह -रहे हैं  इस  धरती पर ......
 कुछ न कुछ कर के जाना हैं ,
 ना की नये साल पर खुशी मानते रहना हैं,
 सब कुछ कर सकता हूँ आने वाले हर पल में....  
 नये साल को खुसी से मना सकता हूँ ,
 तो समाज के लिए नये साल पर .......
 कुछ नहीं कर सकता हूँ ,
 हर नये साल पर हम कुछ न कुछ.......
सकल्प लेते है अपनी जिन्दगी के लिये,
 तो क्या समाज के लिए कुछ करने का ......
एक और सकल्प नहीं ले सकते हैं ,
नये साल के पावन अवसर पर .....
रह- रहे है इस धरती पर........
लेखक - सागर कुमार 
कक्षा - 8  अपना घर ,कानपुर  

रविवार, 8 जनवरी 2012

कविता - कृषि और विज्ञान

कविता - कृषि और विज्ञान 
 इस समय की कृषि ,
विज्ञान से बढ़ी ....
 विज्ञान ने इसको  कहाँ पहुँचाया,
 कृषि ने अपना स्थान बनाया....
प्राचीन कृषि को मिला,
हैं अब बढ़ावा .....
अब आप देखिए तो जगह- जगह,
 पर मिलेगे ढावा .....
 हर प्रकार के उधोग का,
 कृषि हैं आधार ......
 भारत में तो कृषि ,
 कि ही हैं भरमार ......
 इस समय की कृषि ,
 विज्ञान से बढ़ी ......
लेखक -सोनू  कुमार 
 कक्षा - 10  अपना घर ,कानपुर 


शनिवार, 7 जनवरी 2012

कविता - मानव अधिकार

कविता - मानव अधिकार 
 आज का नहीं यह संसार हैं ,
आज हैं मानव अधिकार हैं......
 जिसने मनाया जश्न विश्व   मानव   अधिकार का ,
 उसे यही नहीं पता होता क्या हैं मानव अधिकार .....
मानव अधिकार में मानव अपने ढंग से जीते हैं ,
 मानव अधिकार मानव के लिए होता हैं ......
 लेखक - चन्दन कुमार
 कक्षा - 6  अपना घर कानपुर

कविता - हुए हम सफल

कविता - हुए हम सफल 
 दर- दर की ठोकरे खाकर ,
 हम हुए घर से बेघर .....
 न मिली हमें  कोई मंजिल,
 हमेशा होते गए विफल .....
 जो सोचा वह हुआ नहीं ,
 जो न सोचा वही हुआ .....
 जिसे पाना चाहा वह न मिला,
 जिसे न चाहा वही मिला .....
 जिस रास्ते से गया पाये कांटे ही कांटे,
 जितने भी दुःख मिले किसी ने न बांटे ......
 दुःख के गमों को सहकर मिली एक पहल ,
 जिस पहल से हुए हम सफल ........
लेखक - आशीष कुमार 
 कक्षा - 9 अपना घर , कानपुर

बुधवार, 4 जनवरी 2012

कविता - असफलता

कविता - असफलता 
 असफलता एक चुनौती   हैं, 
 उसे स्वीकार करो  .....
 उसमे  क्या कमी रह गयी,
 जब तक सफलता न मिले......
 नींद ,  चैन, आलस, को त्याग दो,
 जो हमें कार्य करने हैं उसमे मन को लगा दो  ......
 तभी आप सफलता की सीडी चढ़ पायेगे,
 हर कठिन कार्य को सरलता से कर पायेगे.......
लेखक - मुकेश कुमार 
 कक्षा - १० अपना घर , कानपुर

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

स्त्री

कविता - स्त्री 
 स्त्री को समाज में क्यों बुरी नजर से देखा जाता हैं ,
 क्यों उन्हें घरो में मारा पीता जाता हैं ......
 क्या यही हमारी सभ्यता हैं ,
 क्यों लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता हैं......
क्या मरना ही हमारा विकल्प हैं ,
 लेकिन स्त्री प्रत्येक कामो में आगे हैं..... 
 क्यों न वो खेल हो या शिक्षा ,
 उनका प्रत्येक कार्यो में दबदबा हैं......
 इस समाज को अपनी सोच बदलनी चाहिए,
 स्त्री को माँ की तरह समझाना चाहिए .....
 लेखक - मुकेश कुमार 
 कक्षा - १० अपना घर ,कानपुर

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

कविता - गलती

कविता - गलती 
 गलती  करते हैं सभी   ,
 इस संसार में ....
 गलती से आगे बढते हैं सभी,
 इस संसार में ......
 जो करता हैं गलती,
 इससे कुछ सीखता हैं हर व्यकित.......
 जो न सीखे कर के गलती  ,
 वो भोगे खाकर दुलत्ती .......
 हर प्रकार की गलती अच्छी नहीं होती हैं,
 हर गलती सजा लायक नहीं होती ......
 हर गलती पर माफ़ नहीं किया जा सकता ,
 हर गलती को समझकर साफ किया  .....
 नहीं जा सकता .....
 लेखक - सोनू कुमार 
 कक्षा - १० अपना घर ,कानपुर

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

कविता - शोर

कविता - शोर 
 शोर -शोर में ,
सब हो गए बोर.....
 कहने लगे बंद करो ये शोर,
 बंद हुआ जब मुख का शोर .....
 शुरू  हो गया मोबाइल का शोर ,
 शोर -शोर में .....
 सब हो गए बोर ,
बनाना पड़ेगा कोई ऐसा फोन.....
 जिससे हो न कही शोर ,
 लोग भी न हो बोर.....
करे हम सब ऐसा विचार,
जिससे बन जाये ऐसा टेलीफोन........
लेखक - अशोक कुमार 
 कक्षा -९ अपना घर ,कानपुर

कविता - बात

कविता - बात 
 एक बार की बात हैं  ,
 यह बात कुछ खास हैं....
 जब भी आती हैं ठण्डी ,
 तो कपड़ो की लग जाती हैं मंदी ....
अगर ठण्डी से सबको बचना ,
 तो मोटे कपड़ो से तन हैं ढकना.....
 एक बार की बात हैं ,
 यह बात कुछ खास हैं......
 लेखक - ज्ञान कुमार 
 कक्षा - ८ अपना घर ,कानपुर

तारे और सितारे


कविता -तारे और सितारे 
 रात में तारे ,
 दिन में सितारे.....  
 कहाँ से आते हैं ,
कौन हैं इनको लाते.....
 यदि पता चले हमको ,
 तारे सितारे तोड़ के बांटू  सबको.......
 चाहे दिन हो या हो रात  ,
 न करने देगे चंदा सूरज से बात......
 जब मन करेगा तब उनको निकालेगे,
 जहाँ अँधेरा होगा वहां उजाला कर देगे......
 लेखक - आशीष कुमार 
कक्षा - ९ अपना घर, कानपुर 

रविवार, 27 नवंबर 2011

बस्ती में मस्ती

बस्ती में  मस्ती 
 बस्ती झूमे मस्ती में ,
 बच्चे घूमे बस्ती में .....
  बाँकी जो बचे बस्ती में,
 वो भी जाते मस्ती में ......
 बूढ़े बैठे खटिया  में ,
 कर रहे बाते मस्ती में.....
 जो भी दिखा बस्ती में ,
 कर रहा मस्ती बस्ती में....
 बस्ती झूमे मस्ती में ,
 बच्चे घूमे बस्ती में ......
 लेखक - अशोक कुमार 
 कक्षा -९ अपना घर,कानपुर

सोमवार, 21 नवंबर 2011

गलती स्वीकारेगे

कविता -गलती स्वीकारेगे 
धमकियाँ कौन  देते हैं,
  नेता पड़े सोते हैं .....
गलती हमने नहीं की हैं,
 घूस हमने नहीं ली हैं ....
 कुछ गलती esee होती हैं,
jo sabako दुःख detee हैं ....
नहीं कयेगे ab ham गलती ,
yah हैं nara  kal  ka......
स्वीकारेगे apnee गलती,
yah हैं nara ab ka
.
धमकियाँ कौन  देते हैं,
  नेता पड़े सोते है......
 lekhak - gyan 
kaksha - 8 apna ghar ,kanpur 
 

रविवार, 13 नवंबर 2011

सुन्दर प्रकृति

कविता - सुन्दर प्रकृति 
 कितनी बड़ी हैं यह प्रथ्वी हमारी ,
जिस पर हैं ये दुनिया सारी .....
हर तरफ इसके पानी हैं,
दुनिया जो जानी पहचानी हैं....
बिखरा पड़ा हैं यहाँ सौन्दर्य अपार,
फूलो की घाटी, हिमालय और पहाड़......
नष्ट न होने दो इस सौन्दर्यता को  ,
 ख़त्म करो न तुम इसकी जड़ता को .....
जम्मू के इस प्राकृतिक सौन्दर्य को ,
देख हर्षित होता हैं सबका मन .....
अच्छा लगता हैं सभी को ,
बस ऐसा ही जीवन .....
लेखक - धर्मेन्द्र कुमार 
कक्षा - ९ अपना घर ,कानपुर  

मंहगाई

कविता - मंहगाई
 मंहगाई का आया जमाना ,
 महंगा को गया खाना-दाना.....
 घोटाले बाजों का कहना ,
मंहगाई में हमको रहना .....
इसी बात तो देख मंहगाई ,
गरीबों को याद आयी नानी .....
बन्द को गया दाना- पानी,
आम आदमी भोला भाला .....
2g ने किया घोटाला,
मंहगाई का आया जमाना .....
 महंगा हो गया खाना- दाना.....
 लेखक - सोनू कुमार  
कक्षा - १० अपना   घर ,कानपुर  

-आस -पास परिवर्तन

कविता -आस -पास परिवर्तन 
 ये मौसम में क्या परिवर्तन को रहा हैं ,
हर चीज में परिवर्तन हो रहा हैं ....
परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं ,
 प्राकृतिम  कृत्रिम होते हैं....
 कभी हवा तेज चलती हैं,
 कभी गर्म चलती हैं ....
 जो तीव्र गति से चलतीa हैं,
 वह तीव्र पवन कहलाती हैं .....
 जो परिवर्तन  मंद गति से होता हैं ,
वह  मंद परिवर्तन कहलाता हैं......
 लेखक -चन्दन कुमार 
 कक्षा -६ अपना घर ,कानपुर