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शनिवार, 29 सितंबर 2012

शीर्षक :- जिंदगी

शीर्षक :- जिंदगी
 जिंदगी के इस भव सागर का ।
 कोई तो किनारा होगा ।।
 मेरी इस जिंदगी मे ।
 मेरा कोई तो सहारा होगा ।।
 उस किनारे का ही तो ।
 मुझे है इन्तजार ।।
 वो जो आ जाये तो ।
 जिंदगी में मेरे आये बहार ।।
 जिंदगी बड़ी अनमोल है ।
 बिना किनारे के नहीं चलती ।।
 बचपन और बुढ़ापा दो स्टेप है इसके ।
 जो बिना सहारे के नहीं चलते।।
नाम : सोनू कुमार 
कक्षा :11
अपना घर, कानपुर  


गुरुवार, 27 सितंबर 2012

शीर्षक :-नेता




 शीर्षक :-नेता
रात मे एक ,
घनघोर  अँधेरे ।
कुछ आये मच्छर ,
पैसा बटोरे ।
उसने    मेरे हाथ मे,
 एक गड्डी जो  थमाई ।
 आने वाले पाँच साल की ,
 कुर्सी उसने हथियाई ।
 पाने के बाद कुर्सी,
 उसने  ऐसा हड़कंप मचाया ।
 आने वाली सुबह को ,
  न आये आंसू न  जा रहा रोया ।
  अब  तो है  केवल उनके ,
  सिर पर भय सवार ।
  बैठा था इन पांच सालो में ,
  जो नेता हाथ - पांव पसार ।
  उसने अपना मुंह ऐसा  फाड़ा ,
  और ऐसा पांव पसारा ।
  उस नेता के चक्कर मे,
  अपना देश फंसा बेचारा ।
  एक रात ............
  घनघोर  अँधेरे।
    आये मच्छर ,
      पैसा बटोरे ।
  
 नाम :सोनू कुमार 
कक्षा :11
अपना घर ,कानपुर 
  

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

बेजुबान जानवर

बेजुबान जानवर 
क्या आप इन बेजुबानो....
को सुन  सकते है,
क्या आप इनकी भलाई....
में कुछ कर सकते हैं,
क्या है इनकी आशा....
इन भले इंसानों से,
क्या आप समझ सकते....
हैं दर्द बेजुबानों के ,
ये बेजुबान जानवर....
कुछ बोल रहे है,
इनकी बातों को क्या....
आप सुन रहे हैं,
दिन पर दिन बड़े-बड़े....
जंगल क्यों काटे जा रहे,
इन बेजुबान जानवरों के....
घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं,
पल-पल क्षण-क्षण....
अब ये घटते जा रहे,
मनुष्य जैसे इस दुनिया में....
अत्याचारी बढते जा रहे,
मरे जा रहे हैं जानवर....
बनाये जा रहे हैं बंदी,
आज कल इनके लिए भी....
उपलब्ध है सुविधा चकबंदी,
अब इनकी सुविधा के लिए भी....
अपने हाथ बढाओ,
इस हरियाली हीन धरती पर....
बेजुबानों की दुनिया बसाओ,
इनकी भलाई तुम करो....
तो जरा मन से,
कैसा हो रहा है महसूस....
पूछ कर तो देखो इनसे,
मन ही मन दे रहे होंगे....
ये बेजुबान दुआएं,
शब्दों को नहीं इनकी भावनाओं को....
समझने का कष्ट उठायें,
लेखक :-सोनू कुमार 
कक्षा :-10 
 अपना घर