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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

जाड़ा

कविता - जाड़ा
सायंकाल में गिरि हैं ओस ,
जिसके कारण सब हो गए ठोस.....
आया हैं मौसम जाड़े का,
मोटा कपड़ा पहनो भाड़े का......
जाड़े में सभी हो जाओ शार्तक,
वरना लेट जाओगे विस्तर पकड़कर.....
सायंकाल में गिरि हैं ओस,
जिसके कारण सब हो गए ठोस.....
लेखक - ज्ञान कुमार
कक्षा - अपना घर ,कानपुर

शनिवार, 7 जनवरी 2012

कविता- मामा जी

कविता- मामा जी 
 उल्टा पहन पजामा जी ,
आये मेरे मामा जी .....
 मामा जी भाई मामा जी ,
 दाने -दाने पर मरते हैं....
करते हैं हंगामा जी ,
 सीधे- साधे मामा जी....
खम्भे जैसे लम्बे हैं ,
कहलाते हैं मामा जी....
 बड़े जोर से चलते हैं ,
गाते सारे गाना जी ....
उल्टा पहन पजामा जी,
 आये मेरे मामा जी ....
लेखक - जीतेन्द्र कुमार 
कक्षा - 8 अपना घर ,कानपुर 

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

कविता - कर देगे हमको बदनाम

कविता - कर देगे हमको बदनाम 
 आये व्यापारी चार ,
 समान लाये आठ ......
 गये वे बाजार ,
 व्यापारी गये रूठ.....
 मीच के वे आँख ,
 पीटने लगे वे ढोल.... 
 हल्ला सुनकर आये चोर,
ले गये समान ......
 वे गये थाने ,
 बोले हजूर लुट गये हम....... 
 इतने में आये थाना इनचार्ज,
 बोले क्या हुआ यार .......
 ले आओ डंडे चार ,
 कर दो इनको बे हाल........
 जा न पाये अपने यहाँ ,
 मर जाये यही यार ......
 क्योकि हम हैं चोर यार,
 नहीं कर देगे हमको बदनाम ........
 लेखक - अशोक कुमार 
 कक्षा - 9  अपना घर , कानपुर

रविवार, 25 दिसंबर 2011

अधूरी कविता

कविता -अधूरी कविता 
 कविता अब बन नहीं रही हैं,
 शब्द कोई मिल नहीं रहे .....
 जब बैठता हूँ मैं कविता लिखने,
 तो मन मचल उठता हैं कही और.....
 सोचा मैंने देख लूँ कुछ पुरानी कविताये,
सीख लूँ कुछ उनसे जान लूँ कुछ उनसे ....
 नहीं आया समझ में कुछ ,
 तो लिख  डाला ......
 कुछ टूटे फूटे शब्दों से,
 फिर एक अधूरी कविता......
लेखक - ज्ञान कुमार 
 कक्षा - ८ अपना घर ,कानपुर

रविवार, 27 नवंबर 2011

बच्चा

बच्चा 
 वे  कहते है बच्चा ,
 हम में, तुम में कौन है? अच्छा..... 
 किलकारी मार कर हंसना है ,
 गोद में कभी नहीं आता हैं.....
अन्दर- अन्दर मुस्काता हैं ,
 तन का हैं कितना अच्छा .....
 मुस्काता है मन के अन्दर ,
 भेद भाव बिलकुल नहीं समझता.....
 लगा हैं लार चुवाने में ,
 कभी नहीं हम उसको लेते हैं.....
हमेसा  गोद को रोता हैं ,
  वे कहते हैं बच्चा ......

 लेखक - जीतेन्द्र कुमार
 कक्षा - ८ अपना घर ,कानपुर

दूर देश से आया हैं बादल

दूर देश  से आया हैं  बादल

दूर देश  से आया हैं  बादल,
 दिन दुपहरियां में छाया हैं बादल......
 कितनी गर्मी हो रही हैं ,
 लोग निकलना भी भूल गए हैं.....
 घर में ही सो रहे हैं  ,
 किरणों से थे सब घायल......
 दुपहरियां में भी छाया हैं बादल,
 दूर देश से आया हैं बादल......
 लेखक - चन्दन कुमार 
 कक्षा - ६ अपना घर ,कानपुर

 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

जवानी

जवानी 
प्राण लिए खड़ी है पागल जवानी....
कौन कहता है दूध पीते है या पानी|
पहन ले नर गोलियों की माल....
चल उठ बन जा देश का रखवाल|
रक्त है या नसों में कायर पानी....
देख क्र पता चल जायेगा क्या है कहानी|
चढ़ा दे प्राण अपना स्वतंत्रता पर....
सबको पता चल जायेगा क्या है पागल जवानी|
प्राण लिए खड़ी है पागल जवानी....
कौन कहता है दूध पीते है या पानी|
नाम :सागर कुमार 
कक्षा :8 
अपना घर , कानपुर
 

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

मैं सोचता हूँ

मैं सोचता हूँ 
क्या लिखूं  क्या याद करूँ ,
मन में कुछ उमंग सी उठती है....
ह्रदय में कुछ स्फूर्ति सी आती है ,
मस्तिष्क में आवेग सा उत्पन्न होता है ....
मुझे कविता लिखना ही पड़ता है ,
उस समय नहीं रहती किसी विषय की चिंता ....
कोई भी विषय क्यों न होता ,
उसमे अपने मन को आवेग से भर देते है ....
और जो कविता मन में उठती है,
हम उसको लिख देते हैं ....
लिखावट कितनी भी ख़राब हो ,
हमें लिखने की कोशिश करनी चाहिए ...
उठते हैं जो हमारे मन में विचार ,
उन्हें लिखना  ही चाहिए ....
नाम :मुकेश कुमार 
    कक्षा :10                
अपना घर ,कानपुर 

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

कविता - रोटी

  रोटी
रोटी तो भाई रोटी हैं ,
रोटी का अलग इतिहास हैं.....
रोटी का हैं कितना महत्त्व हैं,
काम केवल करते हैं रोटी के लिए.....
मरते हैं जीते हैं रोटी के लिए ,
लडडू पेडा खाने से केवल मन भरेगा ....
रोटी सब्जी खाने से पेट भरेगा ,
रोटी को भिन्न भिन्न नामों से जाना जाता हैं......
रोटी को चपातियाँ .कुलचा .फुलके ,रोगन ,
के नाम से पुकारा जाता हैं .....
रोटी तो मनुष्य की जान हैं,
रोटी तो मनुष्य का भगवान हैं.....
रोटी तो हमारी तो भूख मिटाती हैं,
 रोटी हमें काम करने के लिए उर्जा देती हैं .....
रोटी तो भाई रोटी हैं कितनी अनोखी रोटी हैं ......

लेख़क- मुकेश कुमार
कक्षा - १० 
अपना घर कानपुर

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

कविता - सैर चलो हम करे

  सैर चलो हम करे
चलो हम सैर करे ,
किसी से बैर न करे......
लड़ाई किसी से न करे,
सभी बच्चो ने देखा चीता....
लेकिन मैंने देखी सूत ,
वही से निकल पड़ा भूत.....
हम अब सैर नहीं करेगे ,
क्योकि मिल जाता हैं रास्ते में भूत....

 लेखक  - चन्दन कुमार 
 कक्षा - ६ अपना घर , कानपुर

शनिवार, 6 अगस्त 2011

कविता - पहल होगी चारों ओर

 पहल होगी चारों ओर  
जब सूरज  ढल जाएगा ,
 तब बालक सो जाएगा .....
 सूरज के आते ही ,
वह भी उठ जाएगा......
 कलियाँ खिलेगी पुष्प सुगंध देगे,
 भँवरे उस पर मंडराएगें ......
 कौवा बैठा डालपर बोल उठेगा,
 आम खाता तोता टाव - टाव कर गाएगा   ......
 सब पक्षी चह चाहएंगे    ,
बच्चे शोर मचाएंगे   ......
हवा चलेगी चारों ओर ,
 बच्चो की पहल होगी चारों ओर...... 


लेखक - आशीष कुमार 
 कक्षा - ९ अपना घर कानपुर

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

कविता - हर उमगों से

हर उमगों से 
 मन की हर उमगों से ,
 ये जीवन भरा हैं तरंगो से.....
 हर एक की अपनी उमगें,
निकल रही उसमें तरंगें .....
 कैसी हैं हर उमगें ,
 नहीं निकलेगी ज्वाला की तरंगें.....
 मिला दो उसमे ऐसी उमगें ,
  मिट जाए  उसकी तरंगें .....
 मन की हर उमगों से ,
ये जीवन भरा हैं तरंगों......

 लेखक - अशोक कुमार 
कक्षा - ९ अपना घर, कानपुर

शनिवार, 23 जुलाई 2011

कविता - जिन्दगी हैं एक पल की

शीर्षक - जिन्दगी हैं एक पल की 
 जिन्दगी हैं एक पल की ,
  बन्दे खो मत इसको .....
 जब प्राण ले जायेगे यमराज तुम्हारे,
 नहीं रोक पाओगे तुम उनको ....
 पल भर के लिए ,
 हर एक क्षण जीवन के लिए.......
 धैर्य रखना सीख लो ,
यह एक अच्छा गुण हैं जीवन के लिए.....
 तुम बाधाओ से न घबराओ ,
 काट के जंगल उसमे भी तुम रह बनाओ..... 
हर मुश्किल को आसान करने के लिए ,
 अपने जीवन को सुखमय  बनाने के लिए......
 जिन्दगी हैं एक पल ले लिए ,
 बन्दे खो मत उसको ......
 एक - एक पल क्षण हैं  कीमती,
प्यर्थ न करके प्रयोग कर उनको  ......

 लेखक -आशीष कुमार 
कक्षा - ९ अपना घर, कानपुर

गुरुवार, 30 जून 2011

कविता -ख़त्म हुई छुट्टिया

ख़त्म हुई छुट्टिया
 गर्मी की छुट्टियाँ हुई ख़त्म,
 अब तो रोज जाना हैं स्कूल ....
 छुट्टियों में की हैं जो मस्ती ,
 अब बच्चो उसको जाओ भूल.....
 अब तो रोज जाना हैं स्कूल ,
 पढना- लिखना और मार खाना .....
 नई कक्षा में हैं हम सब को जाना ,
 नई -नई कांपियां और किताबे पाना.....
 रात-दिन हैं अब तो जागना ,
 देर से उठे तो जल्दी स्कूल को भागना ......
अब तो करना होगा खूब पढाई ,
 मस्ती तो ख़त्म हुई अब मेरे भाई....
 लेखक - धर्मेन्द्र कुमार 
 कक्षा - ९ अपना घर ,कानपुर

शनिवार, 4 जून 2011

कविता -मँहगाई

मँहगाई 

बढ़ रहा देश में भष्ट्राचार ,
जिससे पिछड़ रहा यह देश
लोग भष्ट्राचार होने से ही भष्ट्राचार फैलता हैं ,
भष्ट्राचार न फैले तो ......
जिससे देश अच्छे से चले होता ,
अन्ना  हजारे जैसे लोग देश में रहते हैं.....
हर दम देश के  लिए  लड़ते हैं.....

लेखक -चन्दन कुमार 
कक्षा -६ अपना घर ,कानपुर

बुधवार, 11 मई 2011

कविता - भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार 
अपना देश , प्यारा देश ,
राजा ,कलमाड़ी पर नहीं चलता कोई केश ,
मंत्री ,नेता नहीं करते इस पर विचार.....
अन्ना ,जैसे अच्छे लोग देश को अच्छा बनाते हैं,
देश में ऐसे कुछ लोग भी हैं ....
जो देश को बर्बाद करते हैं ,
देश में दिन दहाड़े होता हैं ,घोटाला.....
नेता ,मंत्री नहीं कोई bolane vala  ....
lekhak -mukesh kumar 
kaksha  -9 apna ghar, kanapur

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

कविता - मंजिल अब दूर नहीं

 मंजिल अब दूर नहीं 
कदम से कदम बढ़ाओ डरो नहीं ,
जो सही था वही हैं सही ....
आज के गौरव हो तुम्ही ,
आगे बढ़ो" मंजिल अब दूर नहीं" .....
मंजिल तक पहुँचना हैं अगर ,
तो तय करनी पड़ेगी कठिन से कठिन डगर.....
रूकावटे डालेगे भ्रष्टाचार करने वाले ही ,
आगे बढ़ो "मंजिल अब दूर नहीं" .....
चाहे लाख करे कोई प्रयास ,
सिर पर पड़े भले ही ईंट या बाँस.....
ईंट का जवाब पत्थर  से देना नहीं ,
आगे बढ़ो "मंजिल अब दूर नहीं" ....
हाथ से हाथ मिलाते रहना ,
अपने कदमों को डगमगाने न देना.....
अब जो डरा समझा वह बचा नहीं ,
आगे बढ़ो "मंजिल अब दूर नहीं" ....
लेखक - आशीष कुमार 
कक्षा - ८ अपना घर , कानपुर