रविवार, 8 मार्च 2026

अब हो गया ठंडी ख़त्म

कविता 
अब हो  गया ठंडी  ख़त्म 
अब बस गर्मी ही गर्मी 
रज़ाई हो गयी अब अंदर 
अब कोहरा का नाम नहीं 
सब हर तरफ खुला आसमा 
अब ठंडी हो गया ख़त्म 
अब बस गर्मी ही गर्मी 
अब रोज़ रोज़ गरम कपडे 
पहनने का काम ख़त्म 
अब बस एक ही टी- शर्ट से काम जायेगा 
अब ठंडी हो बजाय है ख़त्म 
अब बस गर्मी ही गर्मी 
कवि - अमित कुमार
(अपना घर  )
 

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