कविता
अब हो गया ठंडी ख़त्म
अब बस गर्मी ही गर्मी
रज़ाई हो गयी अब अंदर
अब कोहरा का नाम नहीं
सब हर तरफ खुला आसमा
अब ठंडी हो गया ख़त्म
अब बस गर्मी ही गर्मी
अब रोज़ रोज़ गरम कपडे
पहनने का काम ख़त्म
अब बस एक ही टी- शर्ट से काम जायेगा
अब ठंडी हो बजाय है ख़त्म
अब बस गर्मी ही गर्मी
कवि - अमित कुमार
(अपना घर )
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