मंगलवार, 10 मार्च 2026

कविता: "इंतजार"

"इंतजार"
 न जाने मेरी इन नजरो को,
कैसी किशोरी लुभा गई
जो पलकों को झपका भर मानो 
इसारे से मुझे हका गई 
पगली मुझे ये क्यों इस तरह तुम 
पागल मुझे बनानी हो 
नहीं अपनाती हो मुझे 
न तुम खुद मेरी बन जाती हो 
अरे ! निदर्य - कुटील सी मेरी सनम 
ऐसे बिच समुन्द्र में क्यों 
अकेले तड़पने छोड़ गई हो 
गुलमोहर की दुनिया इस हल में पाना 
तेरे बिना आसान नहीं 
बिहार हुआ हूँ तेरी कभी से 
बंजारा बन हाँ कभी कभी रे 
जाता हूँ में जोगिया सा 
खो मैं खुद को चाहता की तेरी दुनिया में 
हार कर फिर जीत मैं पाउँगा 
सब सच मैं कर दिखलाऊंगा 
हाँ सब आसान हो जाएगा
होगा जब मिलान का इंतजार खत्म। 
कवि: पिंटू कुमार कक्षा: 10th, 
अपना घर।  
 

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