सोमवार, 2 मार्च 2026

कविता: "क्या आपने जिंदगी देखी है"

"क्या आपने जिंदगी देखी है"
थक कर चूर हो गए। 
शरीर  भी झुलस गए अब ।। 
आँखों में समुन्दर था । 
वो भी बह गए सब ।। 
आशा तो बहुत थी उनसे पर बर्सी नहीं है । 
झुलस गए सारे फसल ।।  
जो पेट में घसती नहीं है । 
एक टुकड़ा भी नहीं बचा निवाले का ।। 
जो संतुस्ट कर दे । 
क्यों नहीं बचाया मेरे लिए ।। 
जगह इस जग में । 
बस इतना कह के ।। 
 नालियों के किनारे बसा दिया। 
अब किया इसी में मर ले ।। 
क्या नफरत है हमसे बस इतना कह दे । 
कवि; सुल्तान कुमार, कक्षा: 12th,
आशा ट्रस्ट कांनपुर केंद्र. "अपना घर"

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