"क्या आपने जिंदगी देखी है"
थक कर चूर हो गए।
शरीर भी झुलस गए अब ।।
आँखों में समुन्दर था ।
वो भी बह गए सब ।।
आशा तो बहुत थी उनसे पर बर्सी नहीं है ।
झुलस गए सारे फसल ।।
जो पेट में घसती नहीं है ।
एक टुकड़ा भी नहीं बचा निवाले का ।।
जो संतुस्ट कर दे ।
क्यों नहीं बचाया मेरे लिए ।।
जगह इस जग में ।
बस इतना कह के ।।
नालियों के किनारे बसा दिया।
अब किया इसी में मर ले ।।
क्या नफरत है हमसे बस इतना कह दे ।
कवि; सुल्तान कुमार, कक्षा: 12th,
आशा ट्रस्ट कांनपुर केंद्र. "अपना घर"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें