कविता
ज़िंदगी तो पलभर का है
कभी ख़ुशी का तो कभी दुखी का है
कब बीत जाये पता ही नहीं
क्या हो जाये खबर ही नहीं
खो जये कब क्या ये पता ही नहीं
ज़िंदगी तो पलभर का है
कभी खुशी तो कभी कभी दुखी का है
कभी गिरन तो कभी उठना है
यही तो ज़िंदगी का सफर है
कभी ख़ुशी तो कभी दुखी का है
ज़िंदगी तो पलभर का है
कभी ख़ुशी तो कभी दुखी का है
कवि -शिवा कुमार
( अपना घर )
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें