कविता
बचपन में बहूत ख्वाइशें थीं
पर बढ़ती उम्र में घटती चली गयी
डॉक्ट,पुलिस और इंजीनियर में जाना था
पर ज़िंदगी कुछ ही चीजों में अटकी रह गयी
सपनों के बारे में ख्याल ही आना बंद हो गया
मंज़िल से भटककर दिल ने मुस्कुराना छोड़ दिया
बीच में आवाज़ तो आई थी
की करले एक बार और कोशिश
पर समय थी नहीं कोई आस
सांसो ने भी साथ था छोड़ दिया
और मुँह था खुद से मोड़ लिया
यही कुछ उम्मीद थी
बचपन में बहुत ख्वाइशे थी
कवि- रोहित कुमार
कक्षा -8
(अपना घर )
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