कविता
शांति
मेरे नजरों के सामने
फसलों घेरे में
उसके आगे थोड़े
थोड़े से पीछे भी
मशीनों की ा रही बेसुर आवाज़
जिससे चली गयी कोसो दूर
मेरे नज़रो में जो शांति थी
गाड़ी थोड़े अलग शोर से
जोर-जोर खींचे जा रही मेरे कान
पेंच हथोड़ी चीनी करते तब तब आवाज़
मेरे दाहिने पटीने और ठहरी जो शांति थी
पीछे लड़ते कुत्तों के झुण्ड
है बड़ी बेरहम
जिसके भोकने के मारे
मर गयी शन्ति
जो मौजूद थी पीठ के पीछे
फसलों घेरे में
उसके आगे थोड़े
थोड़े से पीछे भी
मशीनों की ा रही बेसुर आवाज़
जिससे चली गयी कोसो दूर
मेरे नज़रो में जो शांति थी
गाड़ी थोड़े अलग शोर से
जोर-जोर खींचे जा रही मेरे कान
पेंच हथोड़ी चीनी करते तब तब आवाज़
मेरे दाहिने पटीने और ठहरी जो शांति थी
पीछे लड़ते कुत्तों के झुण्ड
है बड़ी बेरहम
जिसके भोकने के मारे
मर गयी शन्ति
जो मौजूद थी पीठ के पीछे
कवि -पिंटू
कक्षा -10
(अपना घर)
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