शुक्रवार, 6 मार्च 2026

शांति

कविता 

शांति 
मेरे नजरों के सामने 
फसलों  घेरे में 
उसके आगे थोड़े 
थोड़े से पीछे भी 
मशीनों की ा रही बेसुर आवाज़ 
जिससे चली गयी कोसो दूर 
मेरे नज़रो  में जो शांति थी 
गाड़ी थोड़े अलग शोर से 
जोर-जोर खींचे जा रही मेरे कान 
पेंच हथोड़ी चीनी करते तब तब आवाज़ 
मेरे दाहिने पटीने और ठहरी जो शांति थी 
पीछे लड़ते कुत्तों के झुण्ड 
है बड़ी  बेरहम 
जिसके भोकने के मारे 
मर गयी शन्ति 
जो मौजूद थी पीठ  के पीछे  
कवि -पिंटू 
कक्षा -10 
(अपना घर) 

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