कविता
हर गली में हर डगर में
कहीं किसी रह के कोने में
मिलती नई ज़िंदगी पड़ी यूँ उलझे चौराहों में
जल गयीं क्या सारी कीताबें
या खो गयी किसी शहर में
बिखरे हुए लगते है सारे मदरसे
समुन्द्रों कि गहराई में छुपे लगते है स्कूल सारे
गलियां भी अब रूठ गयी है
बेसहारा को देख कर टूट गयी है
बेज़ुबान है इंसान यहाँ
हारा हुआ है ये जहाँ
कतरा कतरा बस जल उठता है
हश्र ये देखकर जी रो उठता है
कबतक यूँ ही बिखरा रहेगा
ये जहाँ कब तक शांत रहेगा
गलियां कहाँ तक शांत रहेगी
गीली मिटटी में क्या सब गल जायेगा
गलतिया न होते हुए भी उनकी क्या उनका स्कूल छिन जायेगा
क्यों भिखरी हुई है ज़िंदगी यूँ राहों में
क्या खो गयी है किताब कहीं दूर शहरों में
कवि - सहिल
कक्षा -9
(अपना घर )
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें