शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

जाड़ा

कविता - जाड़ा
सायंकाल में गिरि हैं ओस ,
जिसके कारण सब हो गए ठोस.....
आया हैं मौसम जाड़े का,
मोटा कपड़ा पहनो भाड़े का......
जाड़े में सभी हो जाओ शार्तक,
वरना लेट जाओगे विस्तर पकड़कर.....
सायंकाल में गिरि हैं ओस,
जिसके कारण सब हो गए ठोस.....
लेखक - ज्ञान कुमार
कक्षा - अपना घर ,कानपुर

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर की जाएगी!
सूचनार्थ!