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गुरुवार, 2 जून 2011

कविता -बढ़ता ही गया

बढ़ता ही गया 
रात को किसी के घर से निकला ,
वो था शायद अन्दर से पगला .....
शायद वो नयी राह चला था ,
किसी के पैसे के झंझट में पड़ा था......
रास्ते में उसको एक राही मिला ,
जैसे उसको लगा कोई पहाड़ खड़ा....
लेकिन वो पहाड़ से टकरा कर आगे बढ़ा,
और आगे जीवन में बढ़ता ही गया .....
रात को किसी के घर निकला ,
वो था शायद अन्दर से पगला .....
लेखक -ज्ञान कुमार 
कक्षा -८ अपना घर ,कानपुर

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

कविता - मंजिल अब दूर नहीं

 मंजिल अब दूर नहीं 
कदम से कदम बढ़ाओ डरो नहीं ,
जो सही था वही हैं सही ....
आज के गौरव हो तुम्ही ,
आगे बढ़ो" मंजिल अब दूर नहीं" .....
मंजिल तक पहुँचना हैं अगर ,
तो तय करनी पड़ेगी कठिन से कठिन डगर.....
रूकावटे डालेगे भ्रष्टाचार करने वाले ही ,
आगे बढ़ो "मंजिल अब दूर नहीं" .....
चाहे लाख करे कोई प्रयास ,
सिर पर पड़े भले ही ईंट या बाँस.....
ईंट का जवाब पत्थर  से देना नहीं ,
आगे बढ़ो "मंजिल अब दूर नहीं" ....
हाथ से हाथ मिलाते रहना ,
अपने कदमों को डगमगाने न देना.....
अब जो डरा समझा वह बचा नहीं ,
आगे बढ़ो "मंजिल अब दूर नहीं" ....
लेखक - आशीष कुमार 
कक्षा - ८ अपना घर , कानपुर

गुरुवार, 24 मार्च 2011

कविता - भारत में कोई नहीं बोलने वाला

 भारत में कोई  नहीं बोलने वाला  
देश में अपने होता घोटाला ,
नेता -मंत्री न कोई बोलने वाला ....
नेता मंत्री क्यों बोले ,
अपना मुँह वह क्यों खोले ....
नेता मंत्री खुद करते है घोटाला,
लगाके गोदामों में ताला ....
राजा हो या कलमाड़ी ,
सब के सब करते हैं घोटाला...
भारत में कोई नहीं बोलने वाला,
ये हैं देश के भ्रष्ट नेता ....
गरीबों की रोजी मारे,
पैसों से भरते अपने झोले....                                                                                                  देश में अपने होता  घोटाला, 
नेता -मंत्री न कोई  बोलने वाला ....
लेखक - मुकेश कुमार 
कक्षा - ९ अपना घर , कानपुर