"बरसात की राह "
सोच रहा था क्या करू मैं।
दिनभर यही आस में बैठा हूँ।।
कब होगी बरसात इस धरती पर ।
पियासे है पेड़ - पौधे, सुखे पड़े है खेत - खलियान।।
महक उठेगी ये धरती ।
न जाने कब छाएंगे बादल आसमान में ।।
एक बार फिर चाँद चमकेगा अँधेरी रातो में ।
न जाने कब दिखेगी सब की चेहरे पर खुशी ।।
सोच रहा था क्या करू मैं ।
दिनभर यही आस में बैठा हूँ।।
कब होगी बरसात इस धरती पर ।
पियासे है पेड़ - पौधे, सुखे पड़े है खेत - खलियान।।
महक उठेगी ये धरती ।
न जाने कब छाएंगे बादल आसमान में ।।
एक बार फिर चाँद चमकेगा अँधेरी रातो में ।
न जाने कब दिखेगी सब की चेहरे पर खुशी ।।
सोच रहा था क्या करू मैं ।
दिनभर यही आस में बैठा ।।
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"
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