गुरुवार, 22 जनवरी 2026

कविता: "बरसात की राह "

"बरसात की राह " 
सोच रहा था क्या करू मैं। 
दिनभर यही आस में बैठा हूँ।।
 कब होगी बरसात इस धरती पर 
पियासे है पेड़ - पौधे, सुखे पड़े है खेत - खलियान।।
महक उठेगी ये धरती 
न जाने कब छाएंगे बादल आसमान में ।।
एक बार फिर चाँद चमकेगा अँधेरी रातो में 
न जाने कब  दिखेगी सब की चेहरे पर खुशी ।।
सोच रहा था क्या करू मैं 
दिनभर यही आस में बैठा 
कवि: अजय II, कक्षा: 6th,
आशा ट्रस्ट, कानपुर केंद्र. "अपना घर"

 

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